
धन की शुचिता Publish Date : 17/11/2025
धन की शुचिता
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
अपने जीवन यापन के लिए मानव को जिन पदार्थों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उनमें धन का स्थान सबसे ऊपर आता है, क्योंकि धन के बिना न तो आवश्यक जरूरतों की पूर्ति सम्भव हो सकती है और न ही गंतव्य की प्राप्ति सम्भव है।
परन्तु येन केन प्रकारेण प्राप्ति करन लेने मात्र से मानव के जीवन में वास्तविक सुख-शांति लि पाती है। वास्तव में शांति तो केवल वांछित की प्राप्ति और प्रयोग पर निर्भर करती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए धन का अर्जन एवं उसके प्रयोग में कुशल होना अनिवार्य है, जो कि सभी व्यक्तियों में नहीं होता है।
अन्यायोपार्जित धन और उसका अविवेकपूर्ण प्रयोग मानव को अभीष्ट की सिद्वियों से वंचित कर उसके अद्वोपतन का कारण भी बन सकता है, जबकि परीश्रम से अर्जित किया हुआ धन मानव के चिंतन को पवित्र बनाकर उसे सन्मार्ग पर लेकर जाता है, जिससे वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में सुख-शांति का आगमन होता है। इसी के चलते हमारे शास्त्रों ने समस्त शुचिताओं में धन की शुचिता को सर्वोपरि माना गया है।
धन पुरूषार्थ की सिद्वि में भी सहायक होता है। हालांकि, धर्म के पथ चलकर अर्जित किया गया ध नही चारों पुरूषार्थों की सिद्वियों में सहायक हो सकता है। अधर्म के पथ पर मानव की समस्त चित्तवृत्तियों को विकृत कर धन संग्रह की कुत्सित प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है, जो आर्थिक वैषम्य को जन्म देकर सामाजिक असंतोष का कारण बनता है और इससे अन्ततः राष्ट्रीय विकास बाधित होता है। इसके विपरीत जीवन में अर्थ की शुचिता आ जाने से मानव की समस्म कामनाएं पवित्र हो जाती हैं, जिससे धन का दुरूप्योग नहीं, सदुपयोग होता है।

अतः अर्थ की शुचिता मानसिक सुचिता का आधार होने से सामाजिक शुचिता का आधार बनती है। इसके लिए कर्मयोगी राजर्षि पुरूषोत्तम दास टंडन द्वारा लिखित यह पंक्तियां हम सभी के जीवन का आदर्श होनी चाहिए। ‘‘मेरी हार्दिक इच्छा है, मेरे पास जो भी धन है, वह सार्वजनिक कार्यों में व्यय हो, यदि मेरे अंति समय में मेरे पास एक पाई भी न बचे तो भी मुझे सबसे अधिक संतोष होगा और सुख भी मिलेगा। अतः सभी लोग आएं और इस दीपावली पर अपने और समाज के मंगल के लिए धन शुचिता का एक साथ संकल्प ग्रहण करें।’’

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
