
सकारात्मक विचारों की ही आवश्यकता Publish Date : 15/11/2025
सकारात्मक विचारों की ही आवश्यकता
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
सब कुछ खराब है ऐसा कहने वाला युवाओं का एक वर्ग दिखाई दे रहा है। ऐसा लगता है कि युवा मस्तिष्क को दूषित करने का कोई विशेष प्रयास किया जा रहा है। इस विकार से प्रभावित व्यक्ति में अपने परिवार, समाज और राष्ट्र की सभी व्यवस्थाओं से असंतुष्टि ही नहीं बल्कि सभी का तिरस्कार करने का व्यवहार दिखाई देता है। एक तरफ भारत खेल से विज्ञान तक प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर नए कीर्तिमान लिख रहा है तो वहीं इनके मन में एक जादुई दुनिया की कल्पना बनी दिखाई देती है।
एक ऐसी दुनिया जिसमें उन्हें कुछ करना नहीं होगा इनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, इनकी भूमिका केवल आलोचना और विध्वंस की होगी। ऐसे लोगों की एक विशेषता यह भी है अपने स्वयं के शान शौकत से ये कोई समझौता नहीं करते लेकिन अपने अतिरिक्त अन्य लोगों से यह मशीन की तरह व्यवहार करने की अपेक्षा करते हैं जिसकी कमांड इन्होंने स्वयं दी हुई हो। विनाशकारी शक्तियों के लिए ऐसे युवा एक हथियार की तरह काम करते हैं, हालांकि यह स्वयं नहीं जानते कि यह आत्मघाती हथियार है।

इनके कारण इनके पूरे परिवार और समाज को संकटों का सामना करना पड़ता है। एक बार व्यक्ति नकारात्मकता और विश्वास के मार्ग पर चल जाय तो फिर उसे वापस रचनात्मकता के मार्ग पर लाना असंभव जैसा होता है। विचार यह करना है कि क्या विश्व में विध्वंस या नकारात्मकता से किसी भी समस्या का समाधान आज तक संभव हुआ है? भारत के दर्शन में भारत के चिंतन में और भारत के इतिहास में ऐसे अनेकों प्रसंग है जब सब कुछ बुरा होता हुआ देख भी व्यक्ति के मन में आशा की किरण बनी रही और उसने प्रयास करना भी नहीं छोड़ा।
रामायण और महाभारत से लेकर आज के समय तक भी हमें ऐसी अनेकों घटनाएं दिखाई देती रहती है। सामान्य परिवारों में संवादहीनता, इतिहास की सही जानकारी का अभाव और मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक चिंतन के अभाव ने इस प्रकार की नकारात्मकता को स्थान दिया है। हमें भी विचार करना है कि हमारे आसपास का युवा किस प्रकार की दिशा में बढ़ रहा है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
