जमीन किसान की, पेड़ किसान के, लेकिन काटने के लिए अनुमति सरकार की, ऐसा क्यों?      Publish Date : 06/11/2025

जमीन किसान की, पेड़ किसान के, लेकिन काटने के लिए अनुमति सरकार की, ऐसा क्यों?

                                                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता

पेड़ काटने के सम्बन्ध में कुछ तथ्यः

  • भारत में भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात चार विभाग, वन विभाग, राजस्व विभाग, पंचायत और कृषि विभाग पेड़ काटने के लिए अब एक संयुक्त मोर्चा बनाएंगे।
  • देश के आदिवासी आदिवासी क्षेत्रों के खेतों में वर्षों से खड़े पेड़ भी अब ग्राम सचिव, पटावारी, फॉरेस्ट गार्ड और रेंजर की कृपाओं से ही काटे जाएंगे।
  • भारत, 40,000 करोड़ से अधिक टिंबर और नॉन-टिंबंर उत्पादों का प्रतिवर्ष आयात करता है, बावजूद इसके किसान को अपने खेत पर लगे पेड़ काटने के लिए चार विभागों से अनुमति प्राप्त करनी होगी।
  • देश 85 प्रतिशत किसानों के पास चार एकड़ से भी कम कृषि योग्य भूमि है, ऐसे में क्या वह डिजिटल पोर्टल, MVN फार्मेट और वीडियोग्राफी के जैसी जटिलताओं के सथ जूझ पाने में सफल हो सकेंगे।

सरकार जब भी कोई नया कृषि कानून लेकर आती है और कहती है कि यह किसान के हित में हैं, तो किसान का मन किसी अघोषित आपातकाल की आशंका से घबरा जाता है। सरकार के द्वारा पहले ‘‘भूमि अधिग्रहण’’ कानून लाया गया था, जिसका अर्थ किसानों की जमीनों को हड़पकर उसे कॉपोर्रेट जगत की थाली में परोसना था। इसके बाद तीन नए कृषि कानून पेश किए गए, जिन्हें किसानों से सलाह किए बिना ही तथाकथित नीति-निर्माताओं की मेजों पर तैयार कर सांसदों के समाने रख दिया गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि पूरे देश के किसान इनके विरोध में सड़क पर उतर आए और अंततः सरकार को काफी हील हुज्जत के बाद इन तीनों ही कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा।

                                                                    

अब है सरकार का नया ड्रामाः यह मॉडल नियम कृषि भूमि से पेड़ कटान के लिए। हालांकि पहली नजर में तो यही लगेगा कि सरकार किसानों को वन-सम्पदा के साथ जोड़ रही है। परन्तु इसके अन्दर गहराई से देखने पर पता चलता है कि सरकार का यह नया नियम असल में पेड़ काटने का नहीं अपितु असल में किसानों की जड़ों को काटने का एक दस्तावेज है।

खेत पर पेड़ लगाओ, परन्तु पहले चार विभगों की एनओसी प्राप्त करो- वर्तमान स्थिति तो और भी अधिक जटिल एवं हतप्रद करने वाली है। आज देशभर के लाखों किसान स्वयं अपनी प्रेरणा से ही मुनाफे की आशा से, या इमारती पौधों को बेचने वाली कंपनियों के मोह जाल में फंसकर अपने खेतों पर सागौन, शीशम और गम्हार जैसे अनेक पेड़ लगा भी चुके हैं। इसके बाद जब किसान इन पेड़ को काटने की अनुमति लेने के लिए जाते हैं तो वन विभाग के कर्मचारी स्वयंभू न्यायाधीश बनकर किसान की गर्दन को पकड़ लेते हैं। किसान का वह ट्रैक्टर, जिस पर उनके अपने ही पेड़ लदे होते हैं, वह जब्त कर लिया जाता है, जिसे छुड़ाने के लिए किसान को महीनों कोर्ट-कचहरी की दौड़ लगानी पड़ती है।

वास्तविक स्थिति तो यह है कि किसानों के द्वारा अपने पेड़ काटने की अनुमति प्राप्त करने के लिए लाखों की संख्या में आवेदन राज्य विभागों में वर्षों से लंबित पड़े हुए हैं। इस सम्बन्ध में अकेले उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्यों में ही 4.5 लाख से अधिक आवेदन लंबित हैं, जिनकी अभी तक सुनवाई तक नहीं की गई है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह कानून किसान के हित के नाम पर किया गया एक भद्दा मजाक ही साबित हो रहा है।

ऐसे यदि किसी किसान ने अपने खेत में इमारती लकड़ी वाले पेड़ जैसे सागौन, शीशम, अर्जुन या गम्हार के पेड़ लगाए हैं तो उन्हें बधाई, क्योंकि अब उनके द्वारा लगाए गए इन वृक्षों पर इन चार विभागों का नैतिक अधिकार है।

वन विभागः इस विभाग की गिनती देश के सबसे अधिक भ्रष्टाचार वाले विभागों में होती है, जहां बिना किसी सुविधा शुल्क के कोई सीधा और सरल काम करवाना सम्भव नहीं होता है।

राजस्व विभागः यह विभाग जमीन और पेड़ नापने से पहले किसान की औकात को नाप लेता है।

ग्राम पंचायत विभागः ग्राम पंचायत की हवा में भी अब राजनीति का जहर घुल चुका है और अब यह भ्रष्टाचार विकेन्द्रीकरण का प्रथम सोपान के साथ ही उसका अंतिम पायदान भी बन चुका है।

कृषि विभागः यह विभाग झूंठे आकड़ों और फर्जी रिर्पोर्ट्स के आधार पर कम्प्यूटर के क्लिक से किसान की किस्मत को खोजता है।

अब किसान को करना होगाः एनटीएमएस पर अपना रजिस्ट्रेशन, खेत पर लगे हर पेड़ की फोटो, ऊँचाई, उम्र, स्थान, KML फार्मेट में लोकेशन अपलोड, 10 यदि पेड़ संख्या में दस से अधिक हैं तो वेरीफिकेशन एजेंसी आपके पास आएगी, इसके बाद ही पेड कट सकेंगे, इसके बाद पेड़ की जड़ों की फोटो भी लेनी होगी और इतना सबकुछ करने के बाद ही आप अपने पेड़ का बेचने की स्थिाति में आ पाएंगे।

कानून भले ही डिजिटल हो, परन्तु किसान के हाथ तो अब भी कीचड़ से मिट्टी से ही सने र्हैं:

सरकार कहती है कि यह सब डिजिटल और पारदर्शी प्रक्रिया है। पर जरा सोचिए कि देश के 85 प्रतिशत किसानों के पास चार एकड़ से भी कम भूमि है और उनमें से भी आधे किसान तो ऐसे हैं जिन्हें स्मार्टफोन चलाना भी नहीं आता है या उनके पास स्मार्ट फोन उपलब्ध नहीं है, तो ऐसे में वह KML फाइल नही, KYC फार्म से भी डरते हैं। बावजूद इसके, किसानों से अपेक्षा की जा रही है कि वह अपने पेड़ की तस्वीर लें, उसकी वीडियो बनाएं और उसे अपलोड कर वन विभाग, पंचायत, राजस्व और कृषि विभाग को संतुष्ट करें। कहा जा सकता है कि यह कोई नियम नहीं है, बल्कि यह तो किसान के धैर्य की डिजिटल परीक्षा है।

                                                               

साल दर साल देश की समृद्वि की जड़ें भी काटी जा रही हैं: देश में प्रति वर्ष 40,000 करोड़ रूपये से अधिक का टिंबर और नॉन-टिंबर उत्पादों का आयात करता है। ऐसे में क्या यह रकम किसानों को नहीं मिलनी चाहिए? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि किसान अपने खेतों में पेड़ लगाने, उन्हें काटने, बेचने और लाभ कमाने के लिए स्वतंत्र हो? लेकिन ऐसा नहीं है, क्योंकि, जो किसान 30 वर्ष तक पेड़ को पालता है, उसे काटने के लिए वह पटवारी साहब, कृषि विभाग के साहबों आदि के सहित वनपाल, सचिव, रेंजर, डीएफओ और कम्प्यूटर आदि साहबों से पेड काटने के लिए भीख मांगे?

देश तमाम आदिवासी अंचलों में लोगों के खेत में वर्षों से इमारती पेड़ खड़े हैं, जिनकी सुरक्षा लोगों ने बिना किसी सरकारी योजना के की है। 

अब इन वृक्षों को काटने के लिए भी वही भानुमति के कुनबे वाली कहानी ही लागू होगी। क्या अब एक आदिवासी को भी अपने ही खेत के पेड़ को काटने के लिए साइबर इंटरनेट कैफे पर जाकर फार्म भरवाना पड़ेगा और सरकार के विभिन्न विभागों चक्कर लगाने होंगे।

ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि अभी तक किसान के पेड़ काटने के लिए सरल नियम क्यों नहीं बनाए गए? और इसके ऊपर अब यह नया नियम क्यों लगाया गया है?

प्रश्न तो यह भी है कि इस नए नियम को लागू करने से पहले किसानों से बात क्यों नहीं की गई?

अंत में एक लाख टके का अन्तिम सवाल है कि यह नया नियम भी किसान विरोधी क्यों है?

सरकार के पास एक से एक काबिल अफसर मौजूद है। नीति आयोग में केवल वेतन पाने वाले विशेषज्ञों की ही जमात है। इस प्रकार का जब भी कोई नया नियम बनाया जाता है तो उसमें किसानों से सलाह के लिए तो कोई स्थान नहीं होता है, अपितु उनकी शंकाओं की भरपूर गुंजाइश होती है। वास्तव में ऐसा क्यों है? उत्तर है कि सरकार अभी भी किसान को ‘इंसान’ नहीं समझती है, बल्कि वह उसे एक ऐसा प्राणी मानकर चलती है जो कि कवेल सब्सिडी से ही चलता है और जिसे ‘गाइडलाईन’ पढ़ने का कोई अधिकार नहीं और जिसके नवाचार को स्वीकार करने में वैज्ञानिक समुदाय भी हठी ही मानता है।

समाधान

सरकार यदि वास्तव में क्लाइमेट चेंज की स्थिति को कुछ चुनौति देना चाहती है, देश के पर्यावरण को बेहतर करना चाहती है तथा किसानों की आय को वास्तव में दोगुना करना चाहती है तो इसके लिए आवश्यक है कि-

  • इस कानून को अविलम्ब स्थगित किया जाए।
  • देश के उन स्टॉकहोल्डर्स का किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया जाए, जिन्होने पेड़ लगाए और काटे हैं या उन्हें वह काटना चाहते हैं।
  • विभिन्न किसान संगठनों जैसे कि AIFA, चैम्फ, (www.chamf.org), CIFA तथा अन्य गैर राजनीतिक किसान संगठनों से खुले दिमाग से चर्च की जानी चाहिए? 

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।