केवल किताबी ज्ञान का होना ही काफी नहीं होता      Publish Date : 01/11/2025

             केवल किताबी ज्ञान का होना ही काफी नहीं होता

                                                                                                                                                                                   प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

सफलता का वास्तविक रहस्य डिग्री से अधिक हमारे सोचने एवं सीखने के तरीकों में छिपा हुआ होता है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए विभिन्न शोध बताते हैं कि जब किसी व्यक्ति को कोई बड़ी जिम्मेदारी या चुनौति मिलती है, तो उसका दिमाग रीवायर होकर नए न्यूरल कनेक्शन्स स्थापित करता है। इसका अर्थ यह है कि नेतृत्व अथवा कठिन निर्णय लेने की स्थिति में सोचने, रणनीति बनाने और जोखिम लेने की क्षमता हमारे न्यूरोलॉजिक स्तर पर ही विकसित होती है।

मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट के हालिया अनुसंधान के अनुसार जिम्मेदारियों का बोझ दिमाग के विकसित होने का एक अवसर होता है। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के डॉ0 स्टीफन फ्लेमिंग का मानना है कि नेतृत्व सदैव ही दिमाग को एक नया आकार प्रदान करता है। वहीं ऑक्सफोर्ड की डॉ0 नताली शैडर के अनुसार, शिक्षा निश्चित् रूप से आपके मस्तिष्क को पुष्ट बनाती है, परन्तु उसे तराशता तो आपका अनुभव ही है। हॉर्वर्ड के रॉबर्ट स्टर्नबर्ग की थ्योरी स्पष्ट करती है कि बुद्विमतता केवल आईक्यू ही नहीं, अपितु यह विश्लेषणात्मक, रचनात्मक और व्यवहारिक पक्षों से मिलकर बनती है।

यही कारण है कि कभी-कभी सीमित और औपचारिक शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी इतिहास रच देते हैं और इसके विपरीत उच्च शिक्षित लोग भी कई बार एक सीमित दायरे में ही सिमट कर रह जाते हैं।

“चुनौतियों का सामना करने, जिम्मेदारियों को उठाने, असफलताओं से सीखने और सीमाओं के बाहर जाकर सोचने वाले ही इतिहास लिखते हैं।“

                                                                                                                                                                                      - डॉ0 राकेश सिंह सेंगर

ईक्यू और एक्यू की अहमियत आईक्यू से अधिकः वर्ल्ड इकानॉमिक फोरम की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भविष्य के नेतृत्वकर्ताओं की सबसे बड़ी शक्ति कॉग्निटिव फ्लेक्सिबिलिटी, अर्थात मस्तिष्क का लचीलेपन में समाहित होती है। वहीं यूसीएलए के शोध के अनुसार, जीवन में असफलता, गरीबी या संघर्ष का सामना करने वाले लोगों के हिप्पोकैम्पस में भावनात्मक प्रसंस्करण बेहतर तरीके से होता है, जिससे उनमें जोखिम प्रबन्धन और सहनशीलता में वृद्वि होती है।

                                                             

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार जीवन में सफलता प्राप्त करने एकमात्र सूत्र है कि आप आगे बढ़कर जिम्मेदारी लें, क्योंकि यह थिति आपके दिमाग को एक नया आकार प्रदान करती है। इसके साथ ही आप अपने प्रत्येक अनुभव को स्वीकार करें, क्योंकि यह अच्छा हो या बुरा, जीवन का हर अनुभव हमारे न्यूरल ग्रोथ ईंधन होता है, अपनी सीखने की प्रवृत्ति को बनाए रखें यानी कि ‘‘मै जान सकता हूँ’’ की सोच को अपनाएं और तुलना करना आज से ही छोड़ें, क्योंकि सफलता का निर्धारण आपका आईक्यू नहीं, अपितु इमोशनल कोशंट (ईक्यू) एवं एडवर्सिटी कोशंट (एक्यू) करते हैं।

सीमाओं के बारे सोचें:

डॉ0 फ्लेमिंग के अनुसार, हमारे आसपास विभिन्न लोग ऐसे भी होते हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा के बिना केवल अपनी कल्पना, जोखिम उठाने की क्षमता और अनुभव के आधार पर ही इतिहास लिखा है। स्टीव जॉब्स ने रीड कॉलेज छोड़कर एप्पल, बिल गेट्स ने हॉर्वर्ड छोड़कर माइक्रोसॉफ्ट की नींव रखी, रिचर्ड ब्रैनसन ने स्कूल को पूरा किए बिना ही वर्जिन ग्रप को वैश्विक पहचान दी। भारत के धीररूभाई अंबानी ने बिना किसी उच्च डिग्री के ही रिलांयंस इंडस्ट्रीज को स्थापित किया। वहीं विश्व प्रसिद्व सुर साम्राज्ञी लता मंगेशकर बिना किसी विशेष संगीत शिक्षा को प्राप्त किए ही केवल और केवल अपनी प्रतिभा और कठिन अभ्यास के बल पर ही गायन के क्षेत्र में अविस्मरणीय सफलता प्राप्त की।

केवल किताबी ज्ञान के पीछे ही न भागें-

व्यवहारिक अर्थशास्त्र (बिहेवियरल इकोनॉमिक्स) एवं लीडरशिप साइकोलॉजी आदि पर किए गए विभिन्न शोध बताते हैं कि औपारिक शिक्षा के माध्यम से केवल ज्ञान ही प्राप्त होता है, जबकि वास्तविक निर्णय क्षमता, व्यवहारिक सोच एवं भावनात्मक नियंत्रण अनुभव के द्वारा ही विकसित किए जा सकते हैं।

यही कारण है कि जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, एलेन ग्रीनस्पैन, अब्इुल कय्यूम जाकी और एलिजाबेथ होम्स जैसे मशहूर उच्च शिक्षित लोग भी अपने वास्तविक जीवन और नेतृत्व के क्षेत्र में असफल ही रहे। उपरोक्त समस्त जानकारी बताती है कि डिग्री केवल शुरूआत भर है, जबकि अनुभव, आत्मचेतना और जिम्मेदारी निभाने की अनुकूलता जीवन की सफलता का निर्धारण करती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।