
पराली दहन (स्टबल बर्निंग) की समस्या Publish Date : 20/10/2025
पराली दहन (स्टबल बर्निंग) की समस्या
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
चर्चा में क्यों?
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में बढ़ते वायु प्रदूषण से निपटने के लिये, सर्वोच्च न्यायालय ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को तीन महीने के भीतर राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के रिक्त पदों को भरने का निर्देश दिया और केंद्र सरकार से पराली जलाने के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने का आग्रह किया।
पराली दहन क्या है?
यह धान और गेहूँ जैसी फसलों की कटाई के बाद बचे हुए पुआल को आग लगाने को संदर्भित करता है।

इसका उपयोग आमतौर पर सितंबर के अंत और नवंबर की शुरुआत के बीच गेहूँ की बुवाई से पहले खेतों से धान की फसल के अवशेषों को साफ करने के लिये किया जाता है। यह इस अवधि के दौरान पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में सबसे अधिक प्रचलित है।
पराली जलाने का कारणः
एकल फसल पैटर्नः न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली मुख्य रूप से गेहूँ और धान के समर्थन में है, जिससे एकल फसल पैटर्न को बढ़ावा मिलता है।
इसके परिणामस्वरूप किसान अक्सर अगली बुवाई के मौसम के लिये अपने खेतों को जल्दी तैयार करने हेतु फसल अवशेषों को जलाने का सहारा लेते हैं।
लागत प्रभावशीलताः यह अन्य अवशेष निपटान विधियों की तुलना में काफी सस्ता है, जैसे फसल के अवशेषों को मिट्टी में मिलाना या बेलर एवं श्रेडर जैसी मशीनरी का उपयोग करना, जिनमें भारी निवेश और श्रम की आवश्यकता होती है।
खरपतवार प्रबंधनः आग लगाने से फसल अवशेषों में मौजूद खरपतवार और उनके बीज नष्ट हो जाते हैं, जिससे अतिरिक्त शाकनाशकों की आवश्यकता कम हो जाती है। अगली फसल की बुवाई से पहले खरपतवार नियंत्रण का यह एक सरल तरीका है।
सीमित अवशेष प्रबंधन विकल्पः वैकल्पिक अवशेष प्रबंधन के प्रति जागरूकता नहीं है। यही कारण है कि पराली दहन एक सामान्य प्रथा बन गई है।
जलवायु परिवर्तनशीलता का प्रभावः असामान्य मानसून और बढ़ते तापमान से फसल कटाई में देरी होती है, जिसके कारण किसान समय पर बुवाई पूरी करने के लिये पराली जलाने पर मजबूर हो जाते हैं।
प्रभावः
वायु प्रदूषणः पराली दहन से प्रमुख वायु प्रदूषक निकलते हैं जैसे PM-10, PM2.5, NOx, मीथेन (NH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) और वाष्पशील कार्बनिक यौगिक।
ये प्रदूषक वायु में धुंध (स्मॉग) उत्पन्न करते हैं और दमा, COPD, ब्रोंकाइटिस तथा फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनः यह प्रथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान देती है, जिससे ग्लोबल वार्मिंग की गति तेज़ होती है।
मृदा उर्वरता में ह्रासः अत्यधिक गर्मी मृदा की गहराई तक पहुँचकर उसकी आर्द्रता को कम कर देती है और लाभकारी सूक्ष्मजीवों को नष्ट कर देती है, जिसके परिणामस्वरूप मृदा का स्वास्थ्य और भी प्रभावित होता है।
पराली दहन पर नियंत्रण में क्या चुनौतियाँ हैं?
प्रौद्योगिकी और अवसंरचना की कमियाँ: मानक कंबाइन हार्वेस्टर 10-15 सेमी तक पराली छोड़ देते हैं, जिसे विशेष उपकरणों के बिना प्रबंधित करना कठिन होता है।
कस्टम हायरिंग सेंटर्स (CHC) में प्रायः पर्याप्त मशीनरी की कमी होती है और कई किसानों को इन संसाधनों तक पहुँचने में तार्किक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
धान की पराली में उच्च सिलिका की मात्रा मशीनरी को नुकसान पहुँचा सकती है, जब इसे फीडस्टॉक के रूप में उपयोग किया जाता है और बायोमास के संग्रह एवं प्रसंस्करण के लिये प्रभावी आपूर्ति शृंखला की अनुपस्थिति समस्या को और गंभीर बना देती है।
नीतिगत बाधाएँ: पराली दहन और पर्यावरणीय मुआवज़े की अस्पष्ट परिभाषाएँ, साथ ही जटिल रेड एंट्री अनुपालन चिह्नांकन, ऐसी चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं जो किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं।
वर्तमान नीतियाँ प्रायः प्रोत्साहन की बजाय दंड पर अधिक ज़ोर देती हैं, जिससे किसान पर्यावरण-अनुकूल तरीके अपनाने से हतोत्साहित होते हैं।
आर्थिक एवं वित्तपोषण सीमाएँ: मशीनरी अपनाने हेतु सीमित सब्सिडी और पर्यावरण क्षतिपूर्ति कोष के उपयोग के लिये क्षीण रूपरेखा, प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा डालती है।
अन्य बाधाएँ: पराली दहन के स्थायी विकल्पों पर प्रशिक्षण कार्यक्रमों में महत्त्वपूर्ण अंतराल है, जिसके कारण पारंपरिक प्रथाओं पर निर्भरता बढ़ रही है।
पराली दहन की समस्या से निपटने के लिये भारत की पहल

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा तैयार किया गया फ्रेमवर्कः
इन-सीटू फसल अवशेष प्रबंधनः कृषि मशीनरी, कस्टम हायरिंग सेंटर (CHC), तेज़ी से बढ़ने वाली धान की किस्मों, क्रमिक कटाई और जैव-अपघटकों का उपयोग करके खेत में फसल अवशेषों के प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करता है।
एक्स-सीटू फसल अवशेष उपयोगः धान की पराली के वैकल्पिक उपयोगों को बढ़ावा देता है, जैसे बायोमास ऊर्जा, ताप विद्युत संयंत्रों में सह-दहन, 2ळ इथेनॉल और संपीड़ित बायोगैस उत्पादन तथा पैकेजिंग सामग्री तैयार करना।
प्रतिबंध और प्रवर्तनः फसल अवशेषों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिये निगरानी, प्रवर्तन और पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के माध्यम से पराली दहन पर प्रतिबंध लगाता है।
वित्तीय सहायताः कृषि मशीनीकरण पर उप-मिशन (SMAM) के अंतर्गत, किसानों, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों को कृषि मशीनरी तथा उपकरण खरीदने के लिये वित्तीय सहायता मिलती है।
तकनीकी हस्तक्षेपः
हैप्पी सीडरः ट्रैक्टर पर लगा उपकरण, गेहूँ और धान की बुवाई करता है, पराली काटता है, जलाने से बचाता है, समय बचाता है और मृदा स्वास्थ्य में सुधार करता है।
पूसा डीकंपोजरः सूक्ष्मजीवी सूत्रीकरण, पराली को खाद में परिवर्तित करता है, जिससे मृदा उर्वरता बढ़ती है।
पेलेटाइज़ेशनः फसल अवशेष, बायोमास पेलेट, ऊर्जा, जलाने में कमी, आय सृजन।
बायोचार उत्पादनः पराली को परिवर्तित करना, बायोचार, मृदा उर्वरता में सुधार, जल धारण, सूक्ष्मजीवी गतिविधि, कार्बन पृथक्करण।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
