
बायोटेक्नोलॉजी के छात्रों को गुरुमंत्र: "प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाएं तकनीक" Publish Date : 28/09/2026
बायोटेक्नोलॉजी के छात्रों को गुरुमंत्र: "प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाएं तकनीक"
बायोटेक्नोलॉजी के छात्रों को गुरुमंत्र: "प्रयोगशाला से खेतों तक पहुंचाएं तकनीक" इस ऐतिहासिक शोध की सफलता के बाद ICAR-NBPGR के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. संदीप कुमार ने सरदार वल्लभभाई पटेल विश्वविद्यालय मेरठ के बायोटेक्नोलॉजी (जैव प्रौद्योगिकी) के युवा छात्रों और शोधकर्ताओं को संबोधित करते हुए प्रेरणादायी विशेष व्याख्यान दिया। कार्यक्रम का शुभारंभ अधिष्ठाता डॉक्टर आर एस सेंगर ने डॉक्टर संदीप कुमार का स्वागत करते हुए उनकी उपलब्धियां पर प्रकाश डाला एवं कहा की बदलती जलवायु, बढ़ती गर्मी और फसलों में लगने वाली जानलेवा बीमारियां आज वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी हैं। ICAR-NBPGR के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी ऐतिहासिक सफलता हासिल की है, जो भारत को गेहूं उत्पादन के मामले में न सिर्फ आत्मनिर्भर बनाए रखेगी, बल्कि भविष्य के संकटों से भी सुरक्षित करेगी।
डॉ संदीप कुमार ने अपने व्याख्यान में देश के उज्ज्वल भविष्य की कमान संभाल रहे इन छात्रों के साथ अपने वर्षों के शोध अनुभव साझा किए और उन्हें आधुनिक कृषि की चुनौतियों से लड़ने के लिए प्रेरित किया।छात्रों को संबोधित करते हुए डॉ. कुमार ने अपने अनुभवों से निम्नलिखित मुख्य बातें साझा कीं: लैब के ज्ञान को खेत से जोड़ें: उन्होंने कहा कि बायोटेक्नोलॉजी का असली उद्देश्य तब तक पूरा नहीं होता, जब तक कि प्रयोगशाला में की गई खोज का सीधा फायदा देश के किसानों को खेतों में न मिले। युवा वैज्ञानिकों को 'सॉल्यूशन-ओरिएंटेड' यानी समस्याओं का हल निकालने वाली रिसर्च पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने छात्रों को जीनोमिक्स, जीन एडिटिंग (CRISPR) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकों में महारत हासिल करने की सलाह दी, ताकि भविष्य में फसलों के विकास की गति को और तेज किया जा सके। डॉ. संदीप कुमार ने बताया की उनकी टीम ने देश के जीन बैंक में संरक्षित गेहूं की लगभग 22,000 पारंपरिक और विदेशी किस्मों (जर्मप्लाज्म) का दुनिया का सबसे बड़ा मूल्यांकन परीक्षण पूरा किया है। इस अभूतपूर्व खोज ने भारतीय कृषि अनुसंधान का नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में भी दर्ज करा दिया है। तीन बड़े रोगों से लड़ने वाले 137 'सुपर बीजों' की खोज गेहूं की फसल को सबसे बड़ा खतरा 'रस्ट' यानी गेरूई रोग (काला, भूरा और पीला रस्ट) और 'स्पॉट ब्लॉच' जैसी फंगल बीमारियों से होता है, जो रातों-रात पूरी फसल को तबाह कर सकती हैं। डॉ. कुमार ने युवाओं को प्रेरित करते हुए कहा कि 22,000 जर्मप्लाज्म का मूल्यांकन करना एक दिन का काम नहीं था, इसमें सालों का कड़ा परिश्रम और धैर्य लगा था। वैज्ञानिक अनुसंधान में सफलता के लिए निरंतरता सबसे जरूरी है। डॉ. संदीप कुमार ने बताया की उन्होंने अत्याधुनिक मॉलिक्यूलर मार्कर्स और KASP (Kompetitive Allele Specific PCR) तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके अलावा, हजारों बीजों में से एक जैसे (डुप्लीकेट) बीजों की पहचान करने के लिए उन्होंने 'G-DIRT' नामक एक विशेष डिजिटल वेब सर्वर भी तैयार किया है। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक अब बेहद कम समय में यह जान सकते हैं कि किस पौधे में बीमारी या गर्मी से लड़ने के सबसे अच्छे गुण हैं। उन्होंने गेहूं की ऐसी दुर्लभ पारंपरिक किस्मों (लैंडरेस) की पहचान की है, जो भीषण गर्मी, कम पानी (सूखा) और खारी मिट्टी में भी बेहतरीन पैदावार दे सकती हैं। बदलते मौसम और ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में यह खोज किसी वरदान से कम नहीं है। व्याख्यान के अंत में डॉ नीलेश कपूर ने डॉ संदीप कुमार का धन्यवाद दिया एवं छात्रों को संबोधित करते हुए कहा की कड़े परिश्रम और धैर्य का कोई विकल्प नहीं है एवं भविष्य में नवीनतम तकनीकियों जैसे जिनोम एडिटिंग, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स, एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की जानकारी एवं उन पर शोध कार्य किए जाने की अति आवश्यकता है. साथ ही कहा की डॉ. संदीप कुमार और उनकी टीम की यह कामयाबी केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों किसानों की खुशहाली और 140 करोड़ से अधिक भारतीयों की खाद्य सुरक्षा की मजबूत गारंटी है। जीन बैंक के इस 'अमृत' से देश में गेहूं की एक नई और अटूट रीढ़ तैयार हो रही है।
डॉ. संदीप कुमार के संबोधन ने वहां मौजूद बायोटेक्नोलॉजी के छात्रों में एक नया जोश भर दिया। छात्रों ने माना कि इस तरह के बड़े शोध और वरिष्ठ वैज्ञानिकों के अनुभव उनके लिए भविष्य के रिसर्च मॉडल तैयार करने में मार्गदर्शक का काम करेंगे। इस कार्यक्रम में डॉ आर एस सेंगर, डॉ निलेश कपूर, डॉ बुद्धेश गौतम, बृजेश अविनाश, अंकिता, तन्मय, गरिमा, तथागत, प्रिंस आदि का सहयोग रहा।