कृषि विश्वविद्यालय परिसर को प्लास्टिक मुक्त बनाने की घोषणा      Publish Date : 27/05/2026

कृषि विश्वविद्यालय परिसर को प्लास्टिक मुक्त बनाने की घोषणा

सरदार वल्लभभाई पटेल के कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में आज कुलपति ने प्लास्टिक मुक्त शिक्षण संस्थान बनाने की घोषणा की और एक पोस्टर रिलीज करने के उपरांत सभी शिक्षकों, निदेशकों, कर्मचारियों, छात्र-छात्राओं से अपील की कि वह विश्वविद्यालय को प्लास्टिक मुक्त शिक्षण संस्थान बनाने में अपना अधिक से अधिक सहयोग प्रदान करें। बैठक में निर्णय लेने के बाद केम्पस और कैंटीन में प्लास्टिक का सामान या पॉलीथिन कहीं पर पाई जाती है तो उसके खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।

इसकी निगरानी के लिए एक टीम गठित की गई है, जो समय समय पर रिपोर्ट कुलपति को देगी। नई शिक्षा नीति के तहत यह कदम उठाया गया है।

सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ त्रिवेणी दत्त ने बैठक की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के शिक्षकों, छात्रों और कर्मचारियों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए कि वह अब प्लास्टिक का उपयोग करना पूर्णतया बंद कर दें, क्योंकि अब हमारा विश्वविद्यालय भी प्लास्टिक फ्री विश्वविद्यालय बनेगा।

कुलपति डॉ त्रिवेणी दत्त ने बताया कि प्लास्टिक आपूर्ति श्रृंखलाओं में उत्पाद की सुरक्षा सुनिश्चित करना खाद्य पदार्थों की सेल्फ लाइफ बढ़ाने तथा हल्का और किफायती परिवहन प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि, आपूर्ति श्रृंखलाओं में इसका बढ़ता उपयोग पर्यावरण संरक्षण और मानव समेत अन्य जीवों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। क्योंकि 98 प्रतिशत प्लास्टिक जीवाश्म ईंधनों से बनाए जाते हैं, जिससे उत्सर्जन और पर्यावरण क्षति बढ़ती है।

वैश्विक स्तर पर, प्लास्टिक उत्पादन वर्ष 2023 में 436 मिलियन मैट्रिक टन पहुंच गया था जो अब बढ़कर बहुत अधिक हो गया है। भारत लगभग 14.17 मिलियन मैट्रिक टन वार्षिक उत्पादन के साथ प्लास्टिक पॉलिमर्स का विश्व में दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। देश हर वर्ष लगभग 9.46 मिलियन मैट्रिक टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न करता है, जो वैश्विक प्लास्टिक उत्सर्जन का लगभग 5वां भाग है।

कृषि विश्वविद्यालय में अब कोई भी शिक्षक, कर्मचारी एवं छात्र छात्राएं प्लास्टिक का उपयोग नहीं करेंगे तथा साथ ही किसानों और गाँव में जाकर लोगों को प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के बारे में समझाएंगे कि इसके उपयोग से मानव स्वास्थ्य और फसल उत्पादन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और उनको प्लास्टिक के दुष्प्रभावों से सचेत करके समघाने का प्रयास करेंगे और इसके उपयोग पर पूर्णतः पाबंदी लगाने का अनुरोध भी करेंगे।

             

इस दौरान प्रोफेसर आर. एस. सेंगर ने बताया कि वर्ष 2020 में 2.7 मैट्रिक टन माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में मौजूद था, जो वर्ष 2040 में दुगुना होने की संभावना है। माइक्रोप्लास्टिक मानव धमनियों, फेफड़ों, मस्तिष्क और यहां तक कि माँ के स्तन वाले दूध में भी पाए गए हैं, पशु और पशुओं के लिए भी, ये बहुत ही हानिकारक हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का सबसे गंभीर प्रभाव मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है क्योंकि ये कण चीनी, चाय, ऊर्जा पेय, शीतल पेय, शहद, पोल्ट्री, मास पौधों, फलों और सब्जियों सहित विभिन्न खाद्य पदार्थों में पाए गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम एक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि माइक्रोप्लास्टिक में मौजूद रसायन, विशेष रूप से महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालते हैं। जिनमें आनुवांशिक परिवर्तन, मस्तिष्क विकास में बाधा और स्वसन संबंधी समस्याएं शामिल आदि हैं।

प्लास्टिक मुक्त विश्वविद्यालय का पोस्टर रिलीज करते समय कुलसचिव डॉ वी. पी. सिंह, वित्त नियंत्रक पंकज चतुर्वेदी, निदेशक शोध डॉ॰ कमल खिलाड़ी, निदेशक प्रसार डॉ सतेंद्र खारी, निदेशक ट्रेनिंग प्लेसमेंट डॉ आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता डॉ॰ विवके, डॉ॰ रवींद्र कुमार, डॉ बिजेन्द्र सिंह, डॉ जयवीर यादव, डॉ पुष्पेंद्र ढाका, डॉ पुष्पेन्द्र कुमार, डॉ रश्मि, डॉ अर्चना मलिक, डॉ॰ डी. के. सिंह, डॉ विजय कुमार, डॉ0 प्रमिला उमराव, डॉक्टर हर्ष पवार और डॉ जिनीथा मैनुअल आदि सभी लोग उपस्थित रहे।