गन्ने की नई किस्म जो देगी ज्यादा पैदावार      Publish Date : 22/12/2025

                  गन्ने की नई किस्म जो देगी ज्यादा पैदावार

                                                                                                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है। बीते कई सालों से किसानों की सबसे भरोसेमंद गन्ना किस्म रही Co-0238 अब लाल सड़न रोग (Red Rot) के बढ़ते प्रकोप के कारण संकट में आ गई थी। इस बीमारी की वजह से खेतों में खड़ी फसलें सड़ने लगी थीं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। किसानों की इसी गंभीर समस्या को देखते हुए वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत के बाद एक नई और दमदार गन्ना किस्म ‘कोलख 16202’ (COLK 16202) विकसित की है, जो न केवल लाल सड़न रोग से पूरी तरह लड़ने में सक्षम है, बल्कि पैदावार के मामले में भी पुरानी किस्म से बेहतर साबित हो रही है।

कई सालों के शोध के बाद मिली सफलता

कोलख 16202 को किसी जल्दबाजी में बाजार में नहीं उतारा गया है। साल 2016 से लगातार कई सालों तक इस किस्म का विभिन्न परिस्थितियों में परीक्षण किया गया। अलग-अलग जिलों, मिट्टियों और यहां तक कि चीनी मिलों के खेतों में इसके ट्रायल किए गए। जब यह किस्म हर कसौटी पर खरी उतरी, तभी इसे किसानों के लिए मंजूरी दी गई। इन सफल परीक्षणों के आधार पर भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024 में इसे राज्य में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृति दी। अब किसान बिना किसी डर के इस प्रमाणित बीज का उत्पादन कर सकते हैं।

प्रदेश की जलवायु के अनुसार विकसित

इस नई किस्म को भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ द्वारा खास तौर पर उत्तर प्रदेश की मिट्टी और मौसम को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। इसे ‘इक्षु 16’ के नाम से भी जाना जाता है। कोलख 16202 को ‘एलजी 95053’ और ‘कोलख 94184’ के मेल क्रॉस से तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म अब पूरी तरह से Co 0238 की जगह लेने के लिए तैयार है।

शीघ्र पकने वाली और ज्यादा लाभकारी

कोलख 16202 की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह शीघ्र पकने वाली गन्ना किस्म है। जहां आमतौर पर गन्ना पकने में ज्यादा समय लेता है, वहीं यह किस्म केवल 8 से 10 महीनों में तैयार हो जाती है। कम समय में ही इसमें 18 प्रतिशत से अधिक चीनी की मात्रा विकसित हो जाती है। इससे चीनी मिलों को सीजन की शुरुआत में ही बेहतर क्वालिटी का गन्ना मिलता है। जल्दी पकने के कारण खेत समय से खाली हो जाता है, जिससे किसानों को रबी सीजन की फसलों, जैसे गेहूं की बुवाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। यह किसानों के लिए दोहरी कमाई का रास्ता खोलती है।

गन्ने की Co 0238 किस्म से बेहतर पैदावार

सरकारी ट्रायल्स में यह साबित हुआ है कि कोलख 16202 की औसत पैदावार लगभग 93.22 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि Co 0238 की औसत पैदावार करीब 90.76 टन प्रति हेक्टेयर थी। यानी किसान को उसी खेत और मेहनत में अधिक उत्पादन मिलेगा। इसकी पेड़ी फसल भी काफी बेहतर है, जिससे कुल उत्पादन और बढ़ जाता है। जहां तक शर्करा प्रतिशत की बात है, इसमें 17.74% चीनी पाई गई है। भले ही यह Co 0238 से थोड़ा कम दिखे लेकिन कुल गन्ना वजन अधिक होने के कारण प्रति हेक्टेयर चीनी उत्पादन 11.43 टन तक पहुंच जाता है, जो मिल और किसान दोनों के लिए फायदेमंद है।

लाल सड़न रोग से पूरी सुरक्षा

                                                           

गन्ना किसानों के लिए लाल सड़न रोग किसी बड़ी आपदा से कम नहीं रहा है। लेकिन कोलख 16202 इस रोग के खिलाफ पूरी तरह प्रतिरोधी साबित हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार लाल सड़न के सबसे खतरनाक स्ट्रेन CF-08 और CF-13 का भी इस किस्म पर कोई असर नहीं होता। इसके अलावा इसमें कीट-रोगों का प्रकोप भी कम देखने को मिलता है, जिससे किसानों को कीटनाशकों पर कम खर्च करना पड़ेगा। कुल मिलाकर कम लागत, ज्यादा पैदावार और रोग-मुक्त फसल के कारण कोलख 16202 आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ाने और चीनी उद्योग को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगी। यह किस्म उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में टिशु कल्चर लैब में गन्ने की इस नई प्रजाति का मल्टीप्लिकेशन किया जा रहा है क्योंकि विगत वर्षों में गन्ने की कोशा 0238 प्रजाति लाल रोग के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई है। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर एस सेंगर ने बताया कि भविष्य में यह प्रजाति किसानों के लिए अच्छी साबित हो सकेगी।

डॉ सेंगर ने बताया कि लखनऊ स्थित गन्ना अनुसंधान संस्थान से इसको प्राप्त किया जा सकता है। टिशु कल्चर से विकसित पौधों को एक वर्ष ट्रायल होने के उपरांत किसानो को दिया जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।