
गन्ने में अब नहीं होगा लाल सड़न रोग, वैज्ञानिकों ने विकसित की एक नई किस्म Publish Date : 20/12/2025
गन्ने में अब नहीं होगा लाल सड़न रोग, वैज्ञानिकों ने विकसित की एक नई किस्म
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
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“गन्ने की यह नई किस्म जो देगी अधिक पैदावार”
गन्ना किसानों के लिए एक बड़ी राहत की बात सामने आ रही है। बीते कई सालों से किसानों की सबसे भरोसेमंद गन्ना किस्म रही CO-0238 अब लाल सड़न रोग (Red Rot) के बढ़ते प्रकोप के कारण संकट में आ गई थी। इस बीमारी के कारण खेतों में खड़ी फसलें सड़ने लगी थीं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। किसानों की इसी गंभीर समस्या को देखते हुए वैज्ञानिकों ने कड़ी मेहनत के बाद एक नई और प्रभसावशाली गन्ना किस्म ‘कोलख-16202’ (COLK 16202) का विकास किया है, जो न केवल लाल सड़न रोग से पूरी तरह लड़ने में सक्षम है, बल्कि पैदावार के मामले में भी पुरानी किस्म से बेहतर साबित हो रही है।
कई वर्षों के शोध के बाद मिली सफलता
कोलख 16202 को किसी जल्दबाजी में बाजार में नहीं उतारा गया है। इस किस्म का वर्ष 2016 से लगातार कई वषों तक इस किस्म का विभिन्न परिस्थितियों में परीक्षण किया गया। अलग-अलग जिलों, मिट्टियों और यहां तक कि चीनी मिलों के खेतों में इस किस्म के ट्रायल किए गए। अभी तक यह किस्म हर कसौटी पर खरी उतरी, तभी इसके बाद ही किसानों के लिए मंजूरी दी गई। इन सफल परीक्षणों के आधार पर भारत सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2024 में इसे राज्य में व्यावसायिक खेती के लिए स्वीकृति दी। अब किसान बिना किसी डर के इसका प्रमाणित बीज का उत्पादन कर सकते हैं।
प्रदेश की जलवायु के अनुसार विकसित
इस नई किस्म को भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (IISR), लखनऊ के द्वारा विशेषतौर पर उत्तर प्रदेश की मिट्टी और मौसम को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। इस किस्म को ‘इक्षु 16’ के नाम से भी जाना जाता है। कोलख 16202 को ‘एलजी 95053’ और ‘कोलख 94184’ के मेल क्रॉस से तैयार किया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म अब पूरी तरह से CO-0238 की जगह लेने के लिए तैयार है।
शीघ्र पकने वाली और ज्यादा लाभकारी
कोलख 16202 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह एक शीघ्र पकने वाले गन्ने की किस्म है। जहां आमतौर पर गन्ना पकने में अधिक समय लेता है, वहीं यह किस्म केवल 8 से 10 महीनों में ही पककर तैयार हो जाती है। कम समय में ही इसमें 18 प्रतिशत से अधिक चीनी की मात्रा विकसित हो जाती है। इससे चीनी मिलों को सीजन की शुरुआत में ही बेहतर क्वालिटी का गन्ना मिलता है। जल्दी पकने के कारण खेत समय से खाली हो जाता है, जिससे किसानों को रबी सीजन की फसलों, जैसे गेहूं आदि की बुवाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। यह किसानों के लिए दोहरी कमाई का रास्ता खोलती है।
गन्ने की CO-0238 किस्म से बेहतर पैदावार
सरकारी ट्रायल्स में यह साबित हुआ है कि कोलख 16202 की औसत पैदावार लगभग 93.22 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि CO-0238 की औसत पैदावार करीब 90.76 टन प्रति हेक्टेयर थी। यानी किसान को उसी खेत और मेहनत में अधिक उत्पादन मिल सकेगा। इस किस्म की पेड़ी फसल भी काफी बेहतर होती है, जिससे कुल उत्पादन और अधिक बढ़ जाता है। जहां तक शर्करा प्रतिशत की बात है, इसमें 17.74 प्रतिशत चीनी पाई गई है। भले ही यह CO-0238 से थोड़ा कम दिखे लेकिन कुल गन्ना वजन अधिक होने के कारण प्रति हेक्टेयर चीनी उत्पादन 11.43 टन तक पहुंच जाता है, जो मिल और किसान दोनों के लिए लाभकारी है।
लाल सड़न रोग से पूरी तरह से सुरक्षित

देखा जाए तो गन्ना किसानों के लिए लाल सड़न रोग किसी बड़ी आपदा से कम नहीं रहा है। लेकिन कोलख 16202 इस रोग के खिलाफ पूरी तरह प्रतिरोधी साबित हुई है। वैज्ञानिकों के अनुसार लाल सड़न के सबसे खतरनाक स्ट्रेन CF-08 और CF-13 का भी इस किस्म पर कोई असर नहीं होता। इसके अलावा इसमें कीट-रोगों का प्रकोप भी कम देखने को मिलता है, जिससे किसानों को कीटनाशकों पर कम खर्च करना पड़ेगा। कुल मिलाकर कम लागत, ज्यादा पैदावार और रोग-मुक्त फसल के कारण कोलख 16202 आने वाले समय में किसानों की आय बढ़ाने और चीनी उद्योग को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाएगी। यह किस्म उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
