मसूर की वैज्ञानिक खेती कर अधिक लाभ कमायें किसान      Publish Date : 30/10/2026

मसूर की वैज्ञानिक खेती कर अधिक लाभ कमायें किसान

                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट प्रोफेसर आर. एस. सेंगर ने बताया कि दलहनी फसलों में मसूर का अपना अलग एक महत्वपूर्ण स्थान है। मसूर दाल जिसे आम बोलचाल की भाषा में लाल दाल के नाम से भी जाना जाता है। डॉ0 सेंगर ने बताया कि मसूर उत्पादन में भारत का विश्व में दूसरा स्थान है। उन्होंने बताया कि मसूर के 100 ग्राम दाने में औसतन 25 ग्राम प्रोटीन, 1.3 ग्राम वसा, 7.8 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 3.2 ग्राम रेशा, 68 मिलीग्राम कैल्शियम, 7 मिलीग्राम लोहा, 0.21 मिलीग्राम राइबोफ्लेविन, 0.51 मिलीग्राम थायमीन और 4.8 मिलीग्राम नियासिन पाया जाता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

                                         

मसूर दाल के सेवन से अन्य दालों की अपेक्षा सर्वाधिक पौष्टिकता पाई जाती है। उन्होंने बताया कि रोगियों के लिए यह दाल अत्यंत लाभप्रद है। इसके सेवन से दस्त, बहुमूत्र, प्रदर, कब्ज व अनियमित पाचन क्रिया में लाभकारी है। इसका हरा व सूखा चारा पशुओं के लिए स्वादिष्ट व पौष्टिक होता है। शोध छात्रा गरिमा शर्मा ने किसानों को सलाह दी है कि इसके इससे अधिक पैदावार के लिए मध्य नवंबर तक इसकी  बुवाई कर सकते हैं।

उन्होंने बताया कि मसूर की उन्नतशील प्रजातियां जैसे- डीपीएल 15, डीपीएल 62, नूरी, के 75, आइ पी एल 81, एलएस 218 आदि प्रमुख हैं। उन्होंने बताया कि समय से बुवाई के लिए 30 से 35 किलोग्राम एवं देर से बुवाई के लिए 50 से 60 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यक होता है तथा उर्वरक 20 किलोग्राम नत्रजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश एवं 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है। जिंक की कमी वाले क्षेत्रों में 25 किलोग्राम जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से फसल को प्रदान किया जाना चाहिए। बुवाई के पूर्व बीज का शोधन अवश्य कर लेना चाहिए।

                                 

डॉक्टर सेंगर ने बताया कि किसान भाई आधुनिक तरीके से इस की उन्नत खेती करें तो दानों के उपज 20 से 25 कुंतल एवं भूसे की उपज 30 से 35 कु. प्रति हेक्टेयर ली जा सकती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।