
तिल की खेती Publish Date : 27/10/2026
तिल की खेती
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
तिल के बीजों की खेती (तिल के बीज की खेती) एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। यह मौसमी मौसम के अलावा, गर्म और अर्ध-सर्दियों के मौसम में भी बोये जाते हैं। इस फल को गुजरात और विशेष रूप से सौराष्ट्र में गर्मियों के मौसम में बोया जा सकता है। ग्रीष्मकालीन तिल की खेती पर ध्यान देने के लिए महत्वपूर्ण वस्तुएं रखी गई हैं। गर्मी के मौसम के हिसाब से यह बहुत ही अनुकूल समय है और इस फसल को पकने में लगभग 3 महीने का समय लगता है और तिल के हिसाब से प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के पास बहुत ही अनुकूल समय पाया जाता है।
तिल की उन्नत किस्में-

तिल के प्रमुख उन्नत किस्में, जैसे- 4 टी- 12, टी- 13, टी- 78, राजस्थान तिल- 346, माधवी, शेखर, कणिक सफेद, प्रगति, प्रताप, गुजरात तिल- 3, हरियाणा तिल, तरूण, गुजरात तिल- 4, पंजाब तिल- 1, बृजेश्वरी (टी एल के- 4) आदि हैं।
बीज की मात्राः-
4 से 5 किलोमीटर प्रति एकड़ बीज की आवश्यकता होती है।
बीज उपचारः-
बीज जनित रोग जड़ गलन की रोकथाम के लिए बीज को 2.5 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से केप्टान या थाईराम रिवॉर्डएक्शन से उपचारित करना चाहिए। या 4 ग्राम ट्राइकोडर्मा विरिडी प्रति रिज बीज के खाते से उपचारित करने से लाभ प्राप्त होता है।
कटाई का उपयुक्त समयः-
तिल की बुवाई के बाद जुलाई के प्रथम सप्ताह में इसकी कटाई करनी चाहिए। कटाई में देरी करने से फसल के उत्पादन में कमी होती है। कटाई के समय यदि न्यूनतम तापमान 25 से 27 डिग्री सेंटीग्रेड हो तो वह फसल के लिए अच्छा माना जाता है। जायद सीज़न के लिए मार्च महीने में गहाई का समय सबसे सही होता है।
बुवाई करने की विधिः-
तिल के बुवाई करने की विधि का तिल के उपोत्पाद पर सीधा प्रभाव पड़ता है। तिल की बुवाई एलेक्ट्रोएटिव मशीन से करनी चाहिए। लाइन से लाइन की दूरी 30 से 45 एवं पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 से. मी. रखनी चाहिए। तिल का बीज आकार छोटा होता है, इसलिए इसकी बुवाई अधिक गहराई में नहीं करनी चाहिए।
भूमि की तैयारी और मृदा स्वास्थ्य
खाद एवं रसायनिक उर्वरक-
तिल की बुवाई करने से पूर्व खेत तैयार करने के लिए समय अच्छी तरह से तैयार करें, तथा रासायनिक मानक में 60 कि.ग्रा., 46 कि.ग्रा. बिजाई, और 15 कि.ग्रा. चार प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की पूरी मात्रा और फॉसफोरस और पोटाश की आधी मात्रा की मात्रा खेत में डाली जानी चाहिए तथा पेशेवरों और 45 दिनों की शेष मात्रा जब फ़सल 30-35 दिन की हो जाए तब फ़सल में सहयोगियों के रूप में शामिल होना चाहिए।
कीट एवं रोग और उनकी रोकथाम

तिल के प्रमुख कीटः-
सफेद मक्खी - इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्लू. पी. या कुनालफास 25 ई.सी. एक लीटर/हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए।
फली एवं पत्ती की पत्ती लपेटक- इसकी रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्लू. पी. या फिर अंशावली 50 प्रतिशत सहायक विशेषज्ञों से सलाह कर करने का बाद प्रयोग करें।
तिल के रोग:-
जड़ एवं तना गलन - इसके रोकथाम के लिए बीज की रोकथाम से पूर्व बीज का उपचार करना चाहिए। इस बीमारी से ग्रसित खेत में लगातार तिल की फसल नहीं लेनी चाहिए।
झुलसा एवं अंगमारी - इसकी रोकथाम के लिए मैनकोजेब या जिनेब फ़्लोरिडा या कैप्टान टू से मिर्ज़ा फ़्लोरिडा प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें। 15 दिन के अंतराल में इसका पुनः प्रयोग करें।
भभूतिया रोग - इसकी रोकथाम के लिए पेड़-पौधों का सेवन करें तथा मेंकोजेब 40 ग्राम या माइकोबुटानिल 10% डब्लू. पी., 10 ग्राम/15 लीटर पानी के साथ मिश्रण करें।
खरपतवार नियंत्रण और सिंचाई
खरपतवार नियंत्रणः-
पहले 45 दिन तक तिल की फसल को अधपके से मुक्त रखने से फसल की वृद्धि और विकास में मदद मिलती है। तिल के बीज की बुवाइ्र के तुरंत बाद, एलकोलर 1.5 एल/हेक्टेयर (10 लीटर पानी में 60 यूनिट) जमीन पर निशान लगाएं। आवश्यकता है क्रमशः हाथ की निराई और गुड़ाई करने की। यदि लेबर की कमी हो तो 3 दिन बाद स्टॉक फ़सल में क्विलेज़ोफ़ॉप इथाइल 0.05 लेबर की प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।
आवश्यक कृषि क्रियाएं-
फसल मौसम में फसल वर्षा आधारित होती है। अतः वर्षा की स्थिति, भूमि में समताएं का स्तर, भूमि का प्रकार एवं फसल की मांग अनुरूप सिंचाई की आवश्यकता भूमि में समताएं बनाए रखना के लिए होती है। सिद्धांत में सटीक प्रात:काल के समय मुरझाना, सुखना एवं लक्षण फूलों का न फूलना दिखाई देने पर फसल में रोजगार की आवश्यकता होती है। अच्छी उपज के लिए सिंचाई की क्रांतिक अवस्थाएँ हड्डी से पूर्व या हड्डी के बाद, फूल आने की अवस्था और फली आने की अवस्था, अत: इन त्रिस्तरों पर सिंचाई करें।
कटाई एवं भंडारण

तिल (तिल) की फसल जो कि महीने में पक्के तैयार हो जाएगी। फसल की सभी फलियाँ एक साथ नहीं पकती कलाकार अधिकांश फलियाँ का रंग भूरा पीला प्रस्तुति पर कटाई करना। फल के घाटे में बने रहना पैतृक। फ़लियों के मुँह चटक कर खुल जायें तब खलिहान में लाकर डंडों से पीटकर दाना अलग कर दिया जाता है। इसके मूल बीज को सुखाकर 9 प्रतिशत भाग शेष रहने पर भंडार करना चाहिए।
लगभग इसका उत्पादन 5 से 6 साल पहले होता है, जो बहुत अच्छा है और यह वैरायटी है जिसे बहुत ही कम समय में पैक कर तैयार किया जाता है, 3 महीने में यह किसान किसानों से लेकर वापस कट के घर लाया जा सकता है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।