अरहर की वैज्ञानिक विधि से खेती से मिलता है अधिक लाभ      Publish Date : 24/10/2026

अरहर की वैज्ञानिक विधि से खेती से मिलता है अधिक लाभ

                                                                                          प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

अरहर हमारे देश की प्रमुख दलहनी फसलों में से एक है जो मुख्यतः ख़रीफ़ मौसम में उगाई जाती है। खरीफ की दलहनी फसलों में अरहर (तुअर) प्रमुख है। यह एक महत्वपूर्ण फसल है और प्रोटीन का स्त्रोत है। यह फसल ऊष्ण और उप ऊष्ण क्षेत्रों में उगाई जाती है। अरहर की फसल दालों के उत्पादन के साथ-साथ वातावरण से नाइट्रोजन को मिट्टी के अंदर एकत्रित करती रहती है, जिससे भूमि की उर्वरता में भी सुधार होता है। अरहर की लंबे समय तक जीवित रहने वाली किस्में मिट्टी में 150-200 किलोग्राम वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करती हैं और मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता बढ़ाती हैं।

अरहर की बुआई शुष्क क्षेत्रों में किसानों द्वारा प्राथमिकता से की जाती है। अरहर की खेती देश के असिंचित क्षेत्रों में फायदेमंद साबित हो सकती है क्योंकि इसकी गहरी जड़ों और उच्च तापमान की स्थिति में पत्तियों को मोड़ने की क्षमता के कारण यह शुष्क क्षेत्रों में सबसे उपयुक्त फसल मानी जाती है।

                                  

भारत विश्व में दलहनी फसलों के क्षेत्रफल एवं उत्पादन में प्रथम स्थान पर है। भारत देश में अरहर को अरहर, तुर, तुअर, रेड ग्राम, व पिजन पी के नाम से जाना जाता है। अरहर का जन्म स्थान वैज्ञानिक भारत व दक्षिण अफ्रीका को माना जाता हैं। हम भारतवासियों के लिए यह बड़े गर्व की बात है। घर घर में प्रोटीन का मुख्य स्रोत के लिए मशहूर अरहर हमारे देश का पौधा है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक एवं आन्ध्र प्रदेश देश के प्रमुख अरहर उत्पादक राज्य हैं।

अरहर की दाल (तुअर की दाल) में लगभग 20-21 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है और इस प्रोटीन की पाचनशक्ति भी अन्य प्रोटीन की तुलना में बेहतर होती है। चूँकि दालें प्रोटीन का एक मजबूत स्रोत हैं, इसलिए इन्हें भारतीयों के आहार में शामिल किया जाता है।

अरहर की दाल में पाएं जाने वाले पोषक तत्व

प्रति 100 ग्राम अरहर की दाल में ऊर्जा - 343 किलो कैलोरी, कार्बाेहाइड्रेट - 62.78 ग्राम, फाइबर - 15 ग्राम, प्रोटीन - 21.7 ग्राम, विटामिन जैसे; थियामिन (बी1) 0.643 मिलीग्राम, राइबोफ्लेविन (बी2) (16ः) 0.187 मिलीग्राम, नियासिन (बी3) 2.965 मिलीग्राम और खनिज जैसे; इसमें कैल्शियम 130 मिलीग्राम, आयरन 5.23 मिलीग्राम, मैग्नीशियम 183 मिलीग्राम, मैंगनीज 1.791 मिलीग्राम, फास्फोरस 367 मिलीग्राम, पोटेशियम 1392 मिलीग्राम, सोडियम 17 मिलीग्राम, जिंक 2.76 मिलीग्राम आदि पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होते हैं।

अरहर की प्रमुख किस्में

ऋचा 2000:- अरहर की सदाबहार किस्म, उपास-120 (1976), आई.सी.पी.एल.-87 (प्रगति,1986), ट्राम्बे जवाहर तुवर-501 (2008), जे.के.एम.-7 (1996), जे.के.एम.189 (2006), आई.सी.पी.-8863 (मारुती, 1986), जवाहर अरहर-4 (1990), आई.सी.पी.एल.-87119 (आषा 1993),आई.सी.पी.एल.-87119 (आषा 1993), बी.एस.एम.आर.-853 (वैषाली, 2001), बी.एस.एम.आर.-736 (1999), विजया आई.सी.पी.एच.-2671 (2010), एम.ए-3 (मालवीय, 1999), ग्वालियर-3 (1980) आदि।

अरहर की बुवाई का उचित समय

अरहर की बुवाई वर्षा प्रारम्भ होने के साथ ही कर देना चाहिए। सामान्यतः जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बुवाई कर देनी चाहिए। बिजाई के लिए 50 से.मी. कतारों में और 25 से.मी. पौधों में दूरी का फासला रखना चाहिए।

अरहर की खेती के लिए बीज की मात्रा

अगेती किस्म के लिए 6 से 8 किलो ग्राम तथा पिछेती क़िस्मों के लिए भी 8 -10 किलो ग्राम बीज की मात्रा प्रति एकड़ उपयुक्त होता है।

अरहर की खेती में बीज उपचार

बुवाई के पूर्व फफूदनाशक दवा 2 ग्राम थायरम या 1 ग्राम कार्बेन्डेजिम या वीटावेक्स 2 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। जैविक उपचार में ट्राइकोडर्मा 4 ग्राम /किलो बीज और रायजोबियम कल्चर 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर फिर बुवाई करनी चाहिए।

अरहर की खेती में खाद एवं रासायनिक उर्वरक प्रबंधन

अरहर की खेती में बुवाई से पूर्व खेत तैयार करते समय अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद 15-20 टन /एकड़ के हिसाब से मिट्टी में अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए ताकि उत्पादन में वृद्धि हो। रासायनिक उर्वरक में नाइट्रोजन 6 किलो (13 किलो यूरिया), फॉस्फोरस 16 किलो (100 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट) और पोटाश 12 किलो (20 किलो एम ओ पी) की मात्रा प्रति एकड़ में प्रयोग करें। ध्यान रहे रासायनिक उर्वरक मिट्टी परिक्षण के आधार से ही प्रयोग में लाया जाने चाहिए।

हानिकारक कीट एवं रोग और उनके नियंत्रण के उपाय

अरहर के हानिकारक कीटः

मक्खी और फली का मत्कुण - इन कीटो की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. या प्रोपेनोफास-50 के 1000 मिली. मात्रा 500 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करना उचित रहता है।

छेदक इल्ली और प्लू माथ और ब्लिस्टर बीटल - इन कीटो की रोकथाम के लिए इण्डोक्सीकार्ब 14.5 ई.सी. 500 एम.एल. या क्वीनॉलफास 25 ई.सी. 1000 एम.एल. या ऐसीफेट 75 डब्लू.पी. 500 ग्राम को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हैक्टेयर छिडकाव करना चाहिए।

अरहर के हानिकारक रोगः

पत्तों पर धब्बे - पत्तों के ऊपर हल्के और गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। बहुत ज्यादा बिमारी होने पर यह पेटीओल और तने पर हमला करती है। इसको रोकने के लिए बीज बिमारी मुक्त हो और बीज को थीरम 3 ग्राम या मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति किलो के साथ उपचार करना चाहिए।

उकटा रोग - यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणतया फसल में फूल लगने की अवस्था पर दिखाई पडते है। सितंबर से जनवरी महिनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें जडें सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उचाई तक काले रंग की धारिया पाई जाती है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए गर्मी के समय खेत की अच्छी गहरी जुताई करना आवश्यक होती है। गर्मी में गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम रहता है अतः बीज उपचारित करके बुवाई करें। 

बांझपन विषाणु रोग - यह बिमारी इरीओफाईड कीट के साथ होती है। इसके हमले से फूल नहीं बनते और पत्ते हल्के रंग के हो जाते हैं, इसको रोकने के लिए फेनाज़ाकुईन 10: ई सी 300 मि.ली. प्रति एकड़ 200 लि. पानी में मिला कर छिड़काव करने से लाभ प्राप्त होता है।

फायटोपथोरा झुलसा रोग - रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें तने पर जमीन के उपर गठान नुमा असीमित वृद्धि दिखाई देती है व पौधा हवा आदि चलने पर यहीं से टूट जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्सील फफूँदनाशक दवा प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करना चाहिए।

फसल स्प्रे और उर्वरक प्रबन्धन

अरहर हमारे देश की प्रमुख दलहनी फसल है जो मुख्यतः ख़रीफ़ मौसम में उगाई जाती है। खरीफ की दलहनी फसलों में अरहर (तुअर) प्रमुख है। यह एक महत्वपूर्ण फसल है और प्रोटीन का स्त्रोत है। यह फसल ऊष्ण और उप ऊष्ण क्षेत्रों में उगाई जाती है। अरहर की फसल दालों के उत्पादन के साथ-साथ वातावरण से नाइट्रोजन को मिट्टी के अंदर एकत्रित करती रहती है, जिससे भूमि की उर्वरता में भी सुधार होता है। अरहर की लंबे समय तक जीवित रहने वाली किस्में मिट्टी में 150-200 किलोग्राम वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करती हैं और मिट्टी की उर्वरता और उत्पादकता बढ़ाती हैं।

अरहर की खेती में खरपतवार नियंत्रण

अरहर के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 20-25 दिन में पहली निंदाई तथा फूल आने के पूर्व दूसरी निंदाई करें। खरपतवारनाशक पैंडीमैथालीन 2 ली. प्रति एकड. 150-200 ली. पानी में बुवाई से 2 दिन बाद डालें । खरपतवारनाशक प्रयोग के बाद एक नींदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्था पर करना लाभदायक होता है। सकरी पत्ती या घास कुल खरपतवार के नियंत्रण लिए क्विजैलोफाप 5 ई.सी. टर्गासुपर 800-1000 मिली बुवाई के 15-20 दिन बाद प्रयोग करें।

अरहर की फसल में सिंचाई प्रबंधन

जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियां बनने की अवस्था पर करने से पैदावार अच्छी होती है।

अरहर की फसल की कटाई, मड़ाई एवं भण्डारण

फसल की कटाई तब करनी चाहिए जब पौधे की पत्तियाँ झड़ने लगें तथा फलियाँ सूखकर भूरी हो जायें। इसे खलिहान में 8-10 दिनों तक धूप में सुखाया जाता है और ट्रैक्टर या बैलों द्वारा मड़ाई की जाती है। बीजों को तब तक सुखाकर भण्डारित करना चाहिए जब तक नमी की मात्रा 8-9 प्रतिशत न हो जाये।

अरहर की पैदावार प्रति हेक्टेयर

उन्नत उत्पादन तकनीक अपनाकर अरहर की खेती करने से असिंचित अवस्था में 12-16 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित अवस्था में 22-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।