कुट्टू की खेतीः किसानों के लिए महत्वपूर्ण      Publish Date : 18/10/2026

   कुट्टू की खेतीः किसानों के लिए महत्वपूर्ण

                                                                                         प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

  • कुट्टू की उन्नत खेती करने से किसान हो सकते हैं मालामाल

किसानों को अपनी आय बढ़ाने के लिए बाजार की डिमांड और भाव को ध्यान में रखते हुए ही किसी फसल का चुनाव करना चाहिए। इसके साथ ही किसानों को चाहिए कि वे कम लागत पर अधिक मुनाफा देने वाली फसलों के उत्पादन पर अधिक ध्यान दें, जिससे कि उनकी आय बढ़ सकें। आज कई किसान इस बात को समझ गए हैं और वे अब तरह-तरह की नई-नई फसलों की खेती की ओर अपना रूख कर भी रहे हैं। अधिक लाभ देने वाली ऐसी ही फसलों की खेती में कुट्टू की खेती (Buckwheat Farming) भी आती है।

कुट्टू की खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। आपको बता दें कि कुट्टू का आटा, गेहूं व चावल के आटे से भी अधिक महंगा बिकता है। बाजार में भी इसकी अच्छी डिमांड भी बनी रहती है। कुट्टू के आटे से कई व्यंजन बनाए जाते हैं। भारत में उपवास करने वाले लोग इसके आटे से बनी चीजें बनाकर खाते हैं और सिंघाडे़ के आटे से अधिक कुट्टू के आटे का उपयोग किया जाता है। ऐसे में कुट्टू की खेती किसानों के लिए एक लाभकारी का सौदा साबित हो सकती हैं।

आज की अपनी इस पोस्ट में हम आपको कुट्टू की खेती कैसे करें, कुट्टू की खेती करने का सही तरीका, कुट्टू से बनने वाले व्यंजन, कुट्टू के पोषक तत्व, इसकी खेती से प्राप्त होने वाले लाभ आदि बातों की जानकारी प्रदान करने जा रहे हैं।

क्या है कुट्टू

                                 

वास्तव में कुट्टू एक फूल वाला पौधा है, जिसे कई नामों से जाना जाता है। कुट्टू को टाऊ, ओगला, ब्रेश, फाफड, पदयात, बक व्हीट आदि कई नामों से भी जाना जाता है।  कुट्टू की उत्पत्ति का मूल स्थान उत्तरी चीन और साइबेरिया को माना जाता है। जबकि रूस में इसकी खेती व्यापक पैमाने पर की जाती है। कुट्टू, गेहूं व धान से अधिक पौष्टिक होता है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और वसा भूरपूर मात्रा में पाए जाते है। कुट्टू के पौधे का हर भाग उपयोगी होता है। इसके तने का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। जबकि फूल और हरी पत्तियों का उपयोग औषधि बनाने में काम में लिया जाता है। इसके फलों से आटा बनाया जाता है जिसका सेवन स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभकारी माना जाता है। भारत में कुट्टू की खेती उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम, सिक्किम, जम्मू और कश्मीर, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में की जाती है।

कुट्टू की खेती से प्राप्त लाभ

भारत में कुट्टू के आटे का उपयोग व्रत और उपवास में बहुत अधिक किया जाता है। यह शरीर की नसों को लचकता प्रदान करता है तथा गैंग्रीन के उपचार में भी प्रयोग किया जाता है। कुट्टू के बीज का उपयोग नूडल, सूप, चाय, ग्लूटिन फ्री-बीयर आदि बनने में भी किया जाता है। कुट्टू की फसल को हरी खाद के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। कुट्टू की देश में ही नहीं विदेश में भी काफी मांग है। जापान में कुट्टू से बने सोवा नूडल काफी पसंद किए जाते हैं। कुट्टू की पोष्टिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें लाइसिन की मात्रा दूध व अंडे के बराबर होती है।

ऐसे में जो लोग दूध या अंडे का सेवन नहीं करते हैं, वे कुट्टू के आटे का सेवन करके दूध और अंडे के बराबर ही पोषक तत्व प्राप्त कर सकते हैं। कुट्टू का बाजार में भाव भी गेहूं, धान जैसे अनाजों से कहीं अधिक मिलता हैं, इसलिए कुट्टू की खेती बहुत लाभकारी सिद्व होती है।

कैसे करें कुट्टू की खेती

कुट्टू की खेती करने से पहले किसानों को यह जान लेना चाहिए कि कुट्टू की खेती का सही तरीका क्या है। इसकी खेती कैसे की जानी चाहिए। इसकी खेती के लिए कैसी जलवायु व मिट्टी होनी चाहिए, इसकी खेती में किस मात्रा में बीज लेने चाहिए, सिंचाई कितनी करनी चाहिए आदि सभी बातों की पूरी जानकारी हो तो ही इसकी खेती से बेहतर लाभ किसान भाई उठा सकते हैं।

कुट्टू की खेती के लिए आवश्यक जलवायु और मिट्टी

                               

कुट्टू की खेती के लिए ठंडी और नम जलवायु अच्छी रहती है। इसकी बढ़वार के लिए ज्यादा गर्मी की आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए इसे अधिकांशतः पहाड़ी क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसकी खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। लेकिन लवणीय और क्षारीय भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है। इसकी खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से लेकर 7.5 तक होना चाहिए।

कुट्टू की खेती के लिए उचित समय

कुट्टू की खेती का सही समय सितंबर से अक्टूबर का महीना अच्छा रहता है, क्योंकि इस महिने में न तो इतनी गर्मी होती है और नहीं सर्दी, यह मौसम इसकी खेती के लिए अच्छा रहता है। भारत में इसकी खेती के लिए बुवाई रबी सीजन में 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के मध्य की जाती है।

कुट्टू की उन्नत किस्में

कुट्टू की खेती के लिए हिमप्रिया, हिमगिरी, संगला-1 आदि किस्में प्रमुख हैं। इन किस्मों को हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड में उपयोग किया जाता है। इन किस्मों से अधिकतम 13 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।

कुट्टू की खेती का तरीका

कुट्टू की खेती के लिए प्रति हैक्टेयर 75 से लेकर 80 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। कुट्टू के बीजों को छिड़काव विधि से बोया जाता है। बुवाई के समय पंक्ति से पंक्ति दूरी 30 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। वहीं पौधे से पौधे के बीच की दूरी 10 सेंटीमीटर रखी जाती हैं। बुवाई के बाद इसकी हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार हल्की सिंचाई करते रहना चाहिए।

कटाई व पैदावार

कुट्टू की फसल जब 70 से 80 प्रतिशत पक जाए तब उसे काट लिया जाता है। ऐसा इसलिए की इसकी फसल में बीजों के झड़ने की समस्या अधिक रहती है। कटाई के बाद फसल को सुखाया जाता है और फिर इसकी गहाई की जाती है। इसे पैकिंग करके बेचा जाता है। कुट्टू की प्रति हैक्टेयर औसत पैदावार 11 से लेकर 13 क्विंटल प्राप्त की जा सकती है।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।