
सौंफ की खेती करें वैज्ञानिक तरीके से Publish Date : 17/10/2026
सौंफ की खेती करें वैज्ञानिक तरीके से
प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा
सौंफ (Foeniculum Vulgare) एक सुगंधित औषधीय पौधा है, जिसका भारत में विशेष उपयोग मसाले के रूप में किया जाता है। यह न केवल भोजन में स्वाद बढ़ाने में मदद करता है बल्कि इसके औषधीय गुण भी पाचन में सहायक होते हैं। भारत के कई राज्यों जैसे राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब में इसकी खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी उत्तम जल निकास की व्यवस्था वाली सबसे उपयुक्त होती है। इसके अलावा मिट्टी का चभ् मान 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए ताकि पौधों की जड़ें पोषक तत्वों को सही तरीके से अवशोषित कर सकें। भारत में सौंफ की बुवाई का समय क्षेत्र विशेष पर निर्भर करता है। सामान्यतः मैदानी क्षेत्रों में अक्टूबर से नवंबर के मध्य तक इसकी बुवाई की जाती है जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में अप्रैल से जून तक इसकी बुवाई की जा सकती है। सौंफ की कई उन्नत किस्में उपलब्ध हैं जिनमें गुजरात फेन्नल-1, गुजरात फेन्नल-2, एचएफ-143, पुसा उज्जा, पुसा बरूणी और आईएफ-125 प्रमुख हैं। ये किस्में अधिक उपज देने वाली, रोग प्रतिरोधक और जलवायु के अनुकूल होती हैं।
सौंफ की अच्छी पैदावार के लिए बुवाई से पहले बीजों का उपचार
सामान्यतः एक हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई के लिए 10 से 12 किलोग्राम बीज पर्याप्त होते हैं। बुवाई से पहले बीजों का उपचार किसी फफूंदनाशक जैसे कार्बेन्डाजिम (2 ग्राम प्रति किलोग्राम) से करना आवश्यक होता है ताकि बीज जनित रोगों से बचाया जा सके और अंकुरण बेहतर हो सके।
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सौंफ के खेत की तैयारी के लिए सबसे पहले एक गहरी जुताई की जाती है ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाए।
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इसके बाद 2-3 बार हैरो या कल्टीवेटर चलाकर मिट्टी को समतल और भुरभुरी बनाया जाता है।
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अंत में पाटा चलाकर मिट्टी को अच्छी तरह समतल किया जाता है।
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अंतिम जुताई के समय 20 से 25 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में मिला देनी चाहिए जिससे मिट्टी में जैविक तत्वों की पूर्ति हो सके।
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सौंफ की बुवाई कतारों में की जाती है, क्योंकि यह विधि पौधों के अच्छे विकास के लिए उपयुक्त मानी जाती है। कतार से कतार की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखी जाती है।
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बीजों को सामान्यतः 2 से 3 सेंटीमीटर गहराई में बोया जाता है। बुवाई के बाद सिंचाई करना आवश्यक होता है ताकि अंकुरण सही ढंग से हो सके।
इसके बाद सिंचाई आवश्यकता अनुसार 12 से 15 दिनों के अंतराल पर की जाती है। फूल आने और दाना बनने की अवस्था में विशेष रूप से सिंचाई का ध्यान रखना चाहिए। अत्यधिक पानी देने से फसल में सड़न आ सकती है, इसलिए जल निकासी की व्यवस्था उत्तम होनी चाहिए
खरपतवार नियंत्रण भी सौंफ की खेती में अत्यंत आवश्यक है

पहली निराई-गुड़ाई बुवाई के 25 से 30 दिन बाद की जाती है जबकि दूसरी 50 से 60 दिन बाद। इससे न केवल खरपतवार हटते हैं बल्कि मिट्टी भी ढीली होती है जिससे पौधों की जड़ों को ऑक्सीजन मिलने में सुविधा होती है। सौंफ की अच्छी पैदावार के लिए पोषक तत्वों की पूर्ति भी जरूरी है। खेत की तैयारी करते समय 20-25 टन गोबर की खाद डाली जाती है। इसके अलावा रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन 90 किलोग्राम, फास्फोरस 40 किलोग्राम और पोटाश 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए।
फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की एक-तिहाई मात्रा बुवाई के समय दी जाती है। बची हुई नाइट्रोजन दो किस्तों में दृ पहली फूल आने और दूसरी दाना बनने की अवस्था में देनी चाहिए। सौंफ की फसल में पत्ती झुलसा, पाउडरी मिल्ड्यू और जड़ सड़न जैसे रोगों का हमला हो सकता है। इन रोगों से बचाव के लिए कार्बेन्डाजिम या मैंकोजेब का छिड़काव करना लाभकारी होता है। कीटों में थ्रिप्स, एफिड्स और कटवर्म प्रमुख हैं। इनसे बचाव के लिए जैविक कीटनाशकों या नीम आधारित कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है।
सौंफ की फसल सामान्यतः 5 से 6 महीनों में पककर तैयार हो जाती है। जब पुष्प गुच्छ पीले होकर सूखने लगते हैं तब फसल की कटाई करनी चाहिए। कटाई के बाद फसल को खुले में अच्छी तरह सुखाना चाहिए ताकि नमी पूरी तरह निकल जाए। इसके बाद मड़ाई करके बीज निकाले जाते हैं। अच्छे प्रबंधन से एक हेक्टेयर में 18 से 22 क्विंटल तक उपज प्राप्त की जा सकती है।
बीजों का भंडारण करते समय यह ध्यान देना जरूरी है कि वे पूरी तरह सूखे हों। इन्हें नमी रहित और साफ-सुथरी जगह पर ही संग्रहित करना चाहिए ताकि फफूंद या कीटों का प्रकोप न हो। सौंफ की खेती किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से काफी लाभदायक सिद्ध हो सकती है। इसकी बाजार में स्थायी मांग बनी रहती है और मसाले तथा औषधीय उपयोग के कारण इसकी कीमत स्थिर रहती है जिससे किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।

लेखकः प्रोफेसर आर. एस. सेंगर, अधिष्ठाता जैव प्रौद्योगिकी महाविद्यालय एवं निदेशक ट्रेनिंग एंड प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मेरठ।