
सिंघाड़ा की खेती से होने वाले लाभ Publish Date : 08/08/2026
सिंघाड़ा की खेती से होने वाले लाभ
प्रो0 आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
सिंघाड़ा तालाबों में पैदा होने वाली एक फसल है, और देश में बड़े पैमाने पर सिंघाड़े की खेती की जाती है। सिंघाड़े के कच्चे और समुद्री पत्तों का ही उपयोग मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है। इसके बचे हुए फलों को सुखाकर उसके गोटी से आटा बनाया जाता है, जिससे आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का उपयोग किया जाता है। सिंघाड़े में मुख्य पोषक तत्व प्रोटीन 4.7 प्रतिशत एवं ग्लूकोज 23.3 प्रतिशत पाए जाते हैं इसके अलावा इसमें कैल्शियम, सोलोमन, आयरन, सल्फर, तांबा, मैगनीज, रेजिन एवं विटामिन सी भी सूक्ष्म मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
सामान्यतयाः तालाबों में होने वाले सिंघाड़े की खेती की उन्नत कृषि तकनीक अपनाकर इकाई पानी का भराव जुलाई से-दिसंबर के माह तक लगभग एक से दो फीट तक आसानी से जा सकती है। इस तकनीक को अपनाकर विशेष रूप से धान के क्षेत्र में किसान अपनी उपज में प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्र में समुचित वृद्धि कर सकते हैं।
भूमि एवं जलवायुः
सिंघाड़े की खेती उष्ण कटिबन्धीय जलवायु वाले क्षेत्र में होती है। इसकी खेती के लिए खेत में एक से दो फीट पानी की आवश्यकता होती है। इसकी खेती स्थिर जल वाले क्षेत्र में की जाती है साथ ही साथ विवेक में ह्युमस की मात्रा अच्छी है। सिंघाड़ा के उत्पादन के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी जिसका पी. एच. 6.0 से 7.5 तक होता है सबसे अधिक उपयुक्त मानी जाती है।
सिंघाड़ा की उन्नत प्रजातियाँ
हालांकि, अभी तक सिंघाड़े में कोई उन्नत जाति विकसित नहीं की गई है, लेकिन जो मिसाल कायम की गई है, उनमें से सबसे पहले ये मसाले वाली जातियां हरीरा गठुआ, लाल गठुआ, कटीला, लाल जड़ा गुलरी, इंदौर की पहली तुई 120-130 दिन में होती है। इसी प्रकार की पहली चॉकलेट से बनी मस्जिद - करिया हरीरा, गुलरा हरीरा, गपाचा में तुड़ाई 150 से 160 दिन में होती है।
नर्सरीः
सिंघाड़े की सामूहिक तैयारी करने के लिए दूसरी तुड़ाई के स्वस्थ्य फलों का बीज चयन करके जनवरी माह तक पानी में डुबाकर रखा जाता है। इसके फलों की तुड़ाई के पहले फरवरी के दूसरे सप्ताह में इन पेड़ों को सुरक्षित स्थान पर घने पानी में तालाब या टाँके में डाल दिया जाता है। मार्च माह में फलों से बेल की तलाश लगभग एक माह में 1.5 से 2 मीटर तक हो जाती है। इन बेलों से एक मीटर लंबी बेलों को अप्रैल से जून तक सोलोमन द्वीप के अनमोल तालाब में रखा जाता है। पोर्टफोलियो में शामिल है प्रति हेक्टेयर 300 किलोग्राम, 60 किलोग्राम कार्गा पोटाश और 20 किलोग्राम, 60 किलोग्राम पैकेज और 20 रिजॉर्ट पैकेज में उपयोग के साथ-साथ सुरक्षित रूप से रखना जरूरी है। कीट एवं कीटनाशी का उपयोग रोकने के लिए कीट एवं कीटनाशी की आवश्यकता होती है।
फ़सल परिणामः
फलों की तुड़ाईः जल्द से जल्द सीमेंट वाली दुकान की पहली तुड़ाई अक्टूबर के पहले सप्ताह में और अंतिम तुड़ाई 20 से 30 दिसंबर को आती है। इसी प्रकार के नवीनतम तुड़ाई स्टॉक की प्रथम तुड़ाई जनवरी के अंतिम सप्ताह में और अंतिम तुड़ाई जनवरी के अंतिम सप्ताह तक की होती है। सिंघाड़ा फसल में कुल 4 तुड़ाई की जाती है।
तुड़ाई पूर्ण रूप से विकसित जीवाश्मों की तुड़ाई करना चाहिए, कच्चे पेड़ों की तुड़ाई करने पर छोटी छोटी परतें होती हैं और उपजी भी कम प्राप्त होती है।
फलों की कटाईः
- जिस खेत में अनोखा प्रदर्शन हो, उसमें जुलाई के पहले सप्ताह में ग्रैंड डचेस शामिल है।
- कटाई करने से पूर्व या एक सप्ताह के भीतर 300 किलोग्राम सुपर फास्फेट 60 किलोग्र्राम पोटाश और 20 किलोग्राम प्रति होल्ड स्टॉक के साथ ही गोबर की सडी खाद का उपयोग किया जाना चाहिए।
- इसके बाद स्कोलिनी को इमीडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस. एल. के घोल में 15 मिनट तक डुबाकर इसका इलाज किया जाता है।
- उपचारित बेल एक मीटर लंबी 2-3 बेलों की गठान लगी 131 मीटर के अंतराल पर की सहायता से जंगल में लगा दिया जाता है।
- बुवाई का कार्य जुलाई के पहले सप्ताह से 15 अगस्त से पहले तक किया जा सकता है।
- अनाज पर नियंत्रण पूर्व व मुख्य फसल में समय - समय पर करते हुए।
- कीट एवं रोग नाशियों का उपयोग न करना पड़े, इसके लिए कीट एवं रोग नाशियों का उपयोग न करना पड़े। यदि आवश्यकता हो तो औषधि का उपयोग करें।
सिंघाड़ा फल जो अच्छी तरह से चिप्स हो जाता है सरोते या सिंघाड़ा की चटनी मशीन द्वारा छीला जाता है। इसके बाद एक से दो दिन तक सूर्य की रोशनी में सुखाकर मोती पॉलीथीन बैग में बैकपैक रखा जाता है।
सिंघाड़े की उपजः
- हरे फल 80 से 100 औसत/हेक्टेयर।
- सूखी गोटी - 17 से 20 रूपये/हे।
- कुल लागत - लगभग 45000 रु./हे.।
- कुल लागत लगभग - 150000 रु./हे।
- शुद्ध लाभ - 105000 रु./ हेक्टेयर।
फलों को सुखानाः
पूर्ण रूप से बिक्री के लिए फलों की गोटी बनाना सुखाया जाता है। फलों को पक्के खलिहान या पॉलीथिन में सुखाना चाहिए। फलों को लगभग 15 दिनों तक सुखाया जाता है और 2 से 4 दिनों तक फलों को उल्टा घुमाया जाता है ताकि फल पूर्ण रूप से सूखे हुए हो। बिना कांटा वाली सिंघाड़े की जगह बिना काटे वाली सिंघाड़े की खेती के लिए, ये सऊदी अरब के अतिरिक्त उत्पाद के साथ ही अन्य गोटियों का आकार भी बड़ा होता है। दस्तावेज़ में इसकी तुड़ाई आसानी से की जा सकती है।
सिंघाड़े के कीटः
सिंघाड़े में मुख्यतः सिंघाड़ा भृंग एवं लाल खजूरा नामक कीट का प्रकोप होता है जिससे फसल में 25-40 प्रतिशत तक उत्पादन कम हो जाता है। इसके अलावा नीला भृंग, माहू एवं घुन किट का भी प्रकोप पाया गया है।
सिंघाड़े के रोगः
सिंघाड़ा फसल में मुख्यतः दहिया रोग का प्रकोप होता है। इन दरारों के कारण फल ख़राब होते हैं साथ ही साथ छोटे फल और काम भी आते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
