मूली की खेती की वैज्ञानिक विधि और उन्नत किस्में      Publish Date : 04/08/2026

मूली की खेती की वैज्ञानिक विधि और उन्नत किस्में

                                                                       प्रो0 आर. एस. सेंगर, डॉ0 रेशु चौधरी एवं गरिमा शर्मा

मूली की फ़सल कम समय में अधिक लाभ प्रदान करने वाली फ़सल है। वैसे तो ये जैविक कृषि की खेती की जाती है लेकिन इसकी खेती मुख्य रूप से रबी के मौसम में की जाती है। मूली का उपयोग कच्चे खीरे के रूप में, सब्जी के अलावा अचार बनाने में भी किया जाता है। इसके सेवन से पेट में कब्ज और गैस आदि की समस्या नहीं होती है। पथरी की बीमारी में भी इसका सेवन अच्छा माना जाता है। भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार, पंजाब, असम, हरियाणा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। इसके अलावा कई राज्यों में भी इसकी खेती की जाती है। अगर इसकी खेती सही तरीके से की जाए तो इससे बेहतर निर्माण के साथ लाभ कमाया जा सकता है। वैसे भी कि बड़े-बड़े सामान और ढाबों पर केक के रूप में इस्तेमाल होने के कारण बाजार में मुली की मांग बनी रहती है।

मूली की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

                             

मूली की खेती के लिए ठंड़ का मौसम अच्छा रहता है। इसके लिए 10 से 15 डिग्री सेल्सियस की आवश्यकता होती है। लेकिन इसकी खेती पूरे साल चलने वाली है। वैसे ही अधिक तापक्रम इसका फसल के लिए अच्छा नहीं होता है। इससे जड़ते एपिसोड और कड़वी हो जाती है। अब बात करें इसकी खेती के लिए मिट्टी या भूमि की तो इसकी खेती के लिए जीवांश दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है। मूली की खेती के लिए मिट्टी का पी.एच. मान 6.5 के आसपास होना चाहिए।

बुवाई करने का समय

मूली की खेती मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र में होती है। देश के मैदानी भागों में इसकी खेती का समय सितंबर से जनवरी तक माना जाता है। पर्वतीय क्षेत्र में इसकी संरचना अगस्त माह तक जाती है।

बाजार के अनुसार रेटिंग

मूली की कुछ किस्में अलग-अलग समय की होती हैं। जिसमें पूसा हिमानी की बुवाई दिसंबर से फरवरी तक जारी है और पूसा चेतकी की बुवाई मार्च से मध्य अगस्त महीने तक की जा सकती है।

मूली की खेती के लिए खेत की तैयारी

मूली की रोपाई से पहले खेत को भलीभंती तैयार कर लेनी चाहिए। इसमें खेत की पांच से छह बार जुताई कर लेनी चाहिए। बता दें कि मूली की फसल के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ों की भूमि में गहराई तक जाने वाली मिट्टी की खेती के लिए गहरी जुताई की आवश्यकता होती है। इसके बाद दो बार कल्टीवेटर से जुताई करनी चाहिए और इसके बाद खेत को समतल करने के लिए पाटा लगाना चाहिए।

मूली की खेती में खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

मूली की अच्छी उपज के लिए 200 से 250 टन अच्छी तरह से सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी समय पर करना आवश्यक है। इसी के साथ 80 क्विंटल, 50 क्विंटल और 50 पोटाश तत्व के रूप में प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। कुल मात्रा से पहले तथा कुल मात्रा में दो बार कुल मात्रा दी जानी चाहिए। जिसमें 1/4 मात्राओं की मात्रा निर्धारित की जाती है और 1/4 मात्राओं की मात्रा निर्धारित की जाती है।

मूली की उन्नत किस्में

मूली की खेती के लिए उन्नत किस्मों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्नत के मॉडल से बेहतर और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद प्राप्त किया जा सकता है। मूली की कुछ उन्नत भव्यता काफी विशिष्ट है जिसमें जापानी सफेद, पूसा देशी, पूसा चेतकी, अरका निशांत, जंबली, बॉम्बे रेड, पूसा रेशमी, पंजाब अगेती, पंजाब सफेद, आई.एच. आर1-1 एवं कल्याणपुर सफेद अच्छा मोती है। वहीं शीतोष्ण एंटीबायोटिक के लिए रैपिड रेड, ह्वाइट टिप्स, स्कारलेट ग्लोब और पूसा हिमानी आदि किस्में उपलब्ध है।

मूली की बुवाई करने का तरीका

मूली के बीजों की बुवाई मेड़ों तथा समतल क्यारियों में भी की जाती है। बेसहारा का समय पंक्ति से पंक्ति या मेडो की दूरी 45 से 50 से 20 से 25 तक होनी चाहिए। अन्य उपचारों की दूरी 5 से 8 तक होती है। मूली के शिलालेखों की गहराई 3 से 4 पर की जानी चाहिए।

बीज उपचार

मूली के टुकड़ों से पहले मूली के टुकड़ों का उपचार करना अत्यंत आवश्यक है ताकि मूली के टुकड़ों से इसे तैयार किया जा सके। इसके लिए 10 से 12 रिज प्रति हेक्टेयर बीज बोने की आवश्यकता होती है। मूली के बीज का शोधन 2.5 ग्राम थाईरम से एक किग्रा बीज की कीमत का उपचार करना चाहिए। या फिर 5 किलो गौमूत्र प्रति किलो बीज के खाते से बीजोपचार का उपयोग किया जा सकता है।

मूली की खेती में विपणन व्यवस्था

मूली फ़सल में पहली सीलान तीन चार पत्ती आने की अवस्था पर कर-व्यवसाय करना चाहिए। मूली की व्यवस्था व्यवस्था भूमि का हिसाब-किताब करना चाहिए। ये कम मात्रा में हो सकता है, समय सीमारू समुद्र में 10 से 15 दिन तक इसकी बहाली हो सकती है। वहीं, गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।