
तरामीरा की उन्नत खेती Publish Date : 04/04/2026
तरामीरा की उन्नत खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
तारामीरा फसलों के समूह में तोरिया, भूरी सरसों, पीली सरसों तथा राया आते है। तारामीरा को उपजाऊ एवं बंजर भूमि में सिमित सिंचाई व बारानी दोनों क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। इसकी खेती अधिकांशतः बारानी क्षेत्रों में ऐसे स्थानों में की जाती है जहाँ अन्य फसल सफलतापूर्वक पैदा नहीं की जा सकती है। इसमें तेल की मात्रा लगभग 35 से 37 प्रतिशत पायी जाती है।
जलवायु:-
तारामीरा की खेती खेती के लिये ठन्डे शुष्क मौसम और चमकीली धूप की आवश्यकता होती है। अधिक वर्षा वाले स्थान इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं है, अधिक तेल उत्पादन के लिए इसको ठंडा तापक्रम साफ खुला मौसम और पर्याप्त मृदा नमी की आवश्यकता पड़ती है। फूल आने और बीज पड़ने के समय बादल और कोहरे भरे मौसम से तारामीरा की फसल पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इस मौसम में कीटों और बीमारियों का प्रकोप अधिक होता है।
भूमि का चुनाव-
तारामीरा की खेती के लिये हल्की दोमट मिट्टी अधिक उपयुक्त रहती है। अम्लीय व अधिक क्षारीय मृदा इसके लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती है।
खेत की तैयारी-
खरीफ की फसल लेने के बाद नमी हों, तो एक हल्की जुताई करके इसे सफलतापूर्वक बोया जा सकता है। जहाँ तक संभव हो वर्षा ऋतु में तारामीरा की बुवाई हेतु खेत खाली नहीं छोड़ना चाहिये। खेत के ढेले तोड़कर पाटा लगाना भूमि की नमी को बचना लाभकारी रहता है।
दीमक और जमीन के अन्य कीड़ो की रोकथाम हेतु बुवाई से पूर्व जुताई के समय क्लूनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में बिखेर कर जुताई करनी चाहिये।
उपयुक्त किस्म

टार.एम.टी 1351: यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 13-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसकी पकाव अवधि 137-142 दिन है।
टार.एम.टी 1355: यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 13-14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसकी पकाव अवधि 133-145 दिन है।
टार.एम.टी 2002: यह किस्म सामान्य एवं पछेती बुआई के लिए उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 12-14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसमें तेल की मात्रा अधिक होती है। यह किस्म सफेद रोली, छाछया व तुलासिता के प्रति रोग रोधक है।
टार.एम.टी 314: यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त है। 90 से 100 सेन्टीमीटर ऊँची इस किस्म की शाखाऐं फैली हुई होती है। इसकी औसत उपज 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसकी पकाव अवधि 130-140 दिन है। इसमें 36.9 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है।
टी-27: सूखे के प्रति सहनशील यह किस्म बारानी क्षेत्रों में बुवाई के लिये उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 6.8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा इसकी पकाव अवधि 150 दिन है। इसमें 35-36 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है।
आई.टी.एस.एः सूखा सहनशील बारानी क्षेत्रों के लिये उपयुक्त इस किस्म की पकाव अवधि 150 दिन एवं औसत उपज 6.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। इसमें तेल की मात्रा 35 से 36 प्रतिशत होती है।
बुवाई का समय-
बारानी क्षेत्र में तारामीरा की बुवाई का समय मिट्टी की नमी व तापमान पर निर्भर करता है। नमी की उपलब्धता के आधार पर इसकी बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक कर देनी चाहिए। यदि फसल को देरी से बोया जाता है तो पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही चेपा एवं सफेद रोली आदि के अधिक प्रकोप की संभावनाए रहती है।
बीज की मात्रा-
- एक हैक्टेयर भूमि हेतु 5 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है।
बीज उपचार-
- बुवाई से पहले बीज को 1.5 ग्राम मैंकोजेब द्वारा प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीज को उपचारित करें।
- मोयला से बचाव हेतु इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यू. जी. 8 ग्राम प्रति बीज की दर से उपचारित करें।
- पी.एस.बी. एवं एजोटोबैक्टर (15-20 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज) से बीजोपचार भी लाभदायक रहता है, इससे नत्रजन एवं फास्फोरस की उपलब्ध्ता बढ़ती है व उपज में वृद्धि होती है।
बुवाई की विधि-
बीज कतारों में बोये एवं कतार से कतार की दूरी 40-45 सेंटीमीटर रखें। कतारों में 5 सेंटीमीटर गहरा बीज बोयें। कतारों में बुवाई ट्रैक्टर द्वारा सीडड्रिल से की जा सकती है जिससे निराई-गुड़ाई करने में आसानी रहती है।
उर्वरक प्रबंधन-
फसल में बुवाई के समय 30 किलोग्राम नत्रजन, 15 किलोग्राम फास्फोरस एवं 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय देवे। जिंक की पूर्ति हेतु भूमि में बुआई से पहले 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग किया जा सकता है।
सिंचाई प्रबंधन-
सिंचाई के साधन उपलब्ध होने पर तारामीरा फसल में प्रथम सिंचाई 40 से 50 दिन में, फूल आने से पहले करें। तत्पश्चात आवश्यकता पड़ने पर दूसरी सिंचाई दाना बनते समय करें।
फसल में खरपतवार प्रबंधन-

फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई के 20 से 25 दिन बाद निराई करें। पौधों की संख्या अधिक हो तो बुवाई के 8 से 10 दिन बाद अनावश्यक पौधों को निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 8 से 10 सेन्टीमीटर कर दें।
खरपतवार के रासायनिक नियंत्रण के लिए पेन्डीमिथेलीन (30 ई.सी) की 1 लीटर सक्रिय तत्व (3.3 लीटर मात्रा) को 500 लीटर पानी में मिलाकर बुआई के 1-2 दिन के अन्दर छिड़काव करना चाहिए।
कीट प्रबंधन
मोयला-
इस कीट का प्रकोप फसल में अधिकतर फूल आने के पश्चात मौसम में नमी व बादल होने पर होता है। माहू हल्के स्लेटी या हरे रंग के चुभने एवं चूसने मुखांग वाले छोटे कीट होते है जो कि पौधों के कोमल तनों, पत्तियों, फूलो एवम नई फलियों से रस चूसकर उसे कमजोर एवम छतिग्रस्त तो करते ही है साथ-साथ रस चूसते समय पत्तियो पर मधुस्राव भी करते है।
इस कीट के नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई सी की 1 लीटर मात्रा को या इपीडाक्लोरप्रिड की 300 मिली मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर में छिड़काव करना चाहिए। यदि दुबारा से कीट का प्रकोप हो तो 15 दिन के अंतराल से पुनः छिड़काव करना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
