ऑर्टिमिसिया एनुआ की वैज्ञानिक खेती      Publish Date : 20/03/2026

    ऑर्टिमिसिया एनुआ की वैज्ञानिक खेती

                                                                                    प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

मलेरिया रोधक पौधा

मलेरिया एक घातक बीमारी है, जिसके अन्तर्गत मरीज को बुखार के साथ कंपकपीं युक्त ठण्ड़ लगती है। इस बीमारी के चलते सम्पूर्ण विश्व में बहुत अधिक संख्या में लोग बीमार पड़ते हैं। मलेरिया रोग के बचाव के लिए जो दवा वर्षो से प्रयोग में लाई जा रही है, उसका नाम क्वीनीन है। अब इस दवा की मलेरिया के परजीवी को मारने की क्षमता भी कम हो गई है। ऐसे में विश्व के सामने मलेरिया रोग के रोकथाम करने की एक बहुत बड़ी चुनौति है।

इस समस्या के समाधान हेतु पिछले दो दशकों से ऑर्टिमिसिया एनुआ नामक एक पौधा उभर कर सामने आया है। इस पौधे में पाए जाने वाले ऑर्टिमिसिनिन नामक पदार्थ को मलेरिया की दवाई बनाने के लिए उत्तम पाया गया है। इस पौधे को सर्वप्रथम चीन में मलेरिया की दवा बनाने के लिए प्रयोग किया गया था, जिसके बाद विश्व के अन्य देशों में भी इस पौधे पर शोध कार्य किए जाने लगे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा मलेरिया रोधी पौधे के रूप में इस पौधे को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं का संचालन किया जा रहा है। इस पौधे के उत्पादन की मांग अफ्रीका जैसे देशों में बहुत अधिक है। ऑर्टिमिसिया एनुआ के पौधे को किंघाऊ के नाम से भी जाना जाता है। इस पौधे पर शोधकार्य वर्ष 1986-87 से लखनऊ स्थित सीमैप (केन्द्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान) के द्वारा किया जा रहा है।

इस संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध कार्य से इस पौधे की 4-5 उन्नतशील प्रजातियाँ विकसित की जा चुकी हैं। इन प्रजातियों में ‘सिम-आरोग्य’नामक प्रजाति में ऑर्टिमिसिनिन की मात्रा सर्वाधिक पाई गई है। भारत में ऑर्टिमिसिनिन की बढ़ती मांग को देखते हुए इस पौधें के उत्पादन की वैज्ञानिक एवं तकनीकी विधियों का ग्रामीण अंचलों में किसानों के बीच पिछले कुछ समय से बड़े स्तर पर किया जा रहा है।

निर्धारित लक्ष्य की पूर्ती हेतु सीमैप-टीम ऑर्टिमिसिया के पौधे की जानकारी एवं प्रदर्शन के लिए उत्तर प्रदेश के अनेक जिलों के गाँवों का भ्रमण कर प्रगतिशील एवं उत्साहित किसानों का चयन भी किया है। इसके लिए किए गए किसानों के यहाँ ऑर्टिमिसिया एनुआ की खेती वैज्ञानिक विधि से करने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने के लिए प्रशिक्षण भी दिया गया था। इस कार्य को करने के सम्बन्ध में किसानों ने वैज्ञानिकों के सामन अपने विभिन्न प्रकार के प्रश्नों को रखा, जिनका निराकरण ऑन द स्पॉट किया गया।

                           

हालांकि अभी भी बहुत से किसान इस प्रकार के प्रशिक्षण से वंचित हैं। ऐसे में एक ही स्थान पर पूरी जानकारी उपलब्ध कराने हेतु उक्त जानकारी को प्रत्येक किसान तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे कि किसान इस पौधें की खेती से अधिक से अधिक लाभान्वित हो सकें और जो किसान इसकी खेती के बारें में जानते हैं वह अपनी जानकारियों को अपडेट कर सकें।

ऑर्टिमिसिया की खेती करने के लिए बलुई दोमट अथवा दोमट मृदा, जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था उपलब्ध हो उपयुक्त रहती है। पौधों की नर्सरी को स्थापित करने के लिए उसमें पहले अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर मिट्टी को भुरभुर बना लेना चाहिए। इसके बाद नर्सरी की छोटी-छोटी क्यारियां बना लेनी चाहिए। इसकी नर्सरी दिसम्बर माह के अन्तिम सप्ताह में स्थापित करना उचित है।

चूँकि इसका बीज बहुत छोटे आकार का होता है, इसलिए इसके बीज को राख में मिलकार नर्सरी में छिड़कना चाहिए और प्रयास करें कि बीज समान दूरी पर ही गिरें। बीज का छिड़काव करने के बाद हल्की सिंचाई कर देने से बीज का अंकुरण अच्छा होता है। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए लगभग 20 ग्राम बीज पर्याप्त रहता है। इसकी पौध 50 से 60 दिनों में रोपण हेतु तैयार हो जाती है।

ऑर्टिमिसिया की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत की रोपाई से 20-25 पूर्व 2-3 गहरी जुताई कर उसे समतल बना लेना चाहिए। जब ऑर्टिमिसिया की पौध 50-60 दिन की हो जाए तो पंक्ति से पंक्ति की दूरी 50 से.मी. और पौध की पौध से दूरी को 30 से.मी. रखते हुए खुरपी की सहायता से गड्ढे खोदकर पौध की रोर्पा कर इसके तुरंत बाद ही हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए।

ऑर्टिमिसिया में खाद एवं उर्वरक

ऑर्टिमिसिया में खाद एवं उर्वरक की मात्रा भूमि की किस्म पर निर्भर करती है। इसकी अच्छी पैदावार लेने के लिए 150 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 किग्रा. फॉस्फोरस और 50 किग्रा. पोटाश की आवश्यकता होती है। फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा को खेत की तैयारी करते समय खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। नाईट्रोजन की शेष बची मात्रा को 2-3 बार छिड़काव करते समय देना उचित रहता है।

ऑर्टिमिसिया में सिंचाई

ऑर्टिमिसिया में पहली सिंचाई पौध रोपण के तुरंत बाद और इसके बाद आवश्यकता के अनुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। ऑर्टिमिसिया में लगभग 6-7 सिचाईयों की आवश्यकता पड़ती है। इस बीच यदि ऑर्टिमिसिया के पौधें खेत में कहीं सूखे हुए हैं तो सिंचाई करते समय उस स्थान पर नए पौधों को लगा देना चाहिए। पौध का रोपण करने के लगभग एक महीने के बाद खेत में घास उग आती है, जिसे खुरपी की सहायता से निकाल देना चाहिए। ऑर्टिमिसिया में लगभग 1-2 निराई करने की आवश्यकता होती है।

ऑर्टिमिसिया की उपज

ऑर्टिमिसिया के पौधों की कटाई दाँतेदार तेज हासिएं से जमीन के एक फिट ऊपर से की जाती है। उत्तर भारत में ऑर्टिमिसिया की पहली कटाई मई के अन्त में (पौध रोपाई के 95 से 100 दिन के बाद), दूसरी कटाई जुलाई माह के अन्त में या अगस्त के प्रथम सप्ताह मे 145 से 150 दिन बाद और तीसरी कटाई सितम्बा माह के मध्य में यानी कि 190 से 200 दिन के बाद करनी चाहिए।

ऑर्टिमिसिया की कटाई करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि कटाई के समय मौसम शुष्क एवं बादल रहित होना चाहिए। ऑर्टिमिसिया के पौधे से 3 कटाई में लगभग 450 से 475 क्विंटल तक ताजी पत्तियाँ प्राप्त और इन पत्तियों को छाया में सुखाने के पश्चात् लगभग 40 से 45 क्विंटल तक सूखी पत्तियाँ प्राप्त हो जाती है।

भण्ड़ारण

ऑर्टिमिसिया के पौधे को खेत से काट लेने के बाद किसी साफ एवं शुष्क स्थान पर छाया में सुखाकर इसकी पत्तियों को डंठल से अलग कर लेते हैं। इसके बाद पत्तियों को अच्छी तरह से सुखाकर जूट के बोरों में भरकी विपणन हेतु रखना चाहिए।

कीट एवं रोग का प्रकोप

ऑर्टिमिसिया में कभी-कभी दीमक का प्रकोप हो जाता है। इस कीट से बचाव के लिए क्लोरपाइरीफॉस दवा की 1 ग्राम मात्रा को 1.5 लीटर प्रति हेक्टेर की दर से सिंचाई के समय प्रयोग करना चाहिए।

विपणन एवं आमदनी

ऑर्टिमिसिया की खेती करने पर किसान को एक हेक्टेयर क्षेत्रफल से  लगभग 55,000 रूपये से 65,000 रूपये तक की आय प्राप्त हो जाती है। इसकी खेती करने से पूर्व पत्तियों की बिक्री के लिए दुकानदार से अनुबंध कर लेना श्रेयकर रहता है। इससे किसान को बाजार की कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।