पचौली की व्यवसायिक खेती करने की वैज्ञानिक विधि      Publish Date : 19/03/2026

पचौली की व्यवसायिक खेती करने की वैज्ञानिक विधि

                                                                                                          प्रोफेसर आर. एस. सेंगर

पचौली (पोगेस्टिमान कैब्लिन) लैमियेसी कुल का एक शाकीय पौधा है, जिसे पत्तियों को छाया में सुखाकर सगंध तेल प्राप्त किया जाता है। तीव्र सुगंध वाला पचौली का सगन्ध तेल प्रबल स्थायित्व के गुणों से युक्त होता है, परन्तु मुख्य सुगन्ध के स्रोत के रूप में इसका उपयोग दुर्लभ ही होता है।

पचौली के व्यवसायिक उत्पादन हेतु उपयुक्त क्षेत्र

 पचौली की खेती विभिन्न प्रकार की भूमियों एवं जलवायु में आसानी से की जा सकती है, परन्तु इसका उत्पादन व्यवसायिक रूप से करने के लिए नीचे वर्णित क्षेत्र आवश्यक हैः

1. आर्द और नर्म जलवायु वाले छायादार, जंगल, बागीचे जिनमें 50 प्रतिशत तक छाया उपलब्ध हो, हालांकि पचौली को एक खुले स्थान पर भी अच्छी तरह से उगाया जा सकता है।

2. यह खुले स्थानों पर उगाने से दो कटाईयों तक ही सीमित होती है।

3. सिंचाई की उत्तम व्यवस्था और जल निकास का उचित प्रबन्धन होना आवश्यक है।

4. पचौली की खेती के लिए पशु जन्य हानि से प्रभावित क्षेत्र अत्याधिक उपयुक्त हैं।

भूमि एवं जलवायु

                               

पचौली की सफल व्यवसायिक खेती हेतु औसत तापमान (25-350 सें0) और आर्द्रता युक्त दशाओं में पचौली की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है। वर्षा आधारित क्षेत्रों में 2000-3000 मिमी. वार्षिक वर्षा जो पूरे वष्र में समरूप से वितरित हो उपयुक्त रहती है।

पौद्यशाला हेतु पौध को तैयार करना एवं पौध-रोपण

पचौली में सामान्य दशाओं में बीज का निर्माण नहीं होता है। अतः इसका प्रवर्धान कायिक रूप से तने की कटिंग्स के द्वारा ही किया जाता है। पौध तैयार करने के लिए नर्सरी का चुनाव अति जलवायु वाली दशाओं से बचने के लिए छायादार स्थानों में करना अच्छा होता है। पचौली की कटिंग्स, सदैव स्वस्थ्य एवं उपयुक्त वृद्वि वाले पौधों से प्रातः या फिर सायकाल में प्राप्त करनी चाहिए। ऐसा करने से निर्जलीकरण के कारण होने वाली मृत्युदर कम की जा सकती है।

तीन से चार गाँठों वाली 10 से 12 से.मी. लम्बी कटिंग्स इसके प्रवर्धन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती हैं। प्राप्त की गई कटिंग्स की ऊपर की 3-4 पत्तियों को छोड़कर नीचे की सारी पत्तियाँ और टहनियों को हटाने के बाद ही पौधशाला में इन कटिंग्स का रोपण करना उचित रहता है। रोपित कटिंग्स में 30-35 दिनों में जड़ बनने लगती है। एक एकड़ क्षेत्र के लिए 40,000 जड़ युक्त पौधों की आवश्यकता होती है। पचौली की रोपाई पूरे वर्ष  भर, अत्याधिक ताप, सर्दी एवं वर्षा वाले दिनों को छोड़कर कभी भी की जा सकती है।

पोषण प्रबन्धनः

वास्तव में उर्वरक की मात्रा भूमि की उर्वरता पर निर्भर करती है, परन्तु फिर भी पचौली में नत्रजन और पोटाश की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है। सामान्य उर्वरता वाली दशाओं में दी जाने वाले उर्वरक की मात्रा को नीचे तालिका के माध्यम से दर्शाया गया हैः-

संस्तुत पोषण तत्व

मात्रा (कि.ग्रा./हे0)

स्रोत उर्वरक

उर्वरक की प्रदान की जाने की प्रकृति

फॉस्फोरस (P2O5)

50 कि.ग्रा. (313 कि.ग्रा.) एस एस पी या 108 कि.ग्रा. डीएपी

एस एस पी अथवा डीएपी   

प्रारम्भिक (अंतिम जुताई के समय)

पोटाश (K2O)

60 कि.ग्रा. (100 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ पोटाश)

म्यूरेट ऑफ पोटाश

प्रारम्भिक (अंतिम जुताई के समय)

नाइट्रोजन (N)

50 कि.ग्रा./हे0/कटाई (111 कि.ग्रा. यूरिया) अथवा 150 कि.ग्रा./हे0/वर्ष (333 कि.ग्रा. यूरिया)

यूरिया

तीन बराबर भागों (50 कि.ग्रा./हे0) में बांटकर प्रथम प्रारम्भिक (अंतिम जुताई के साथ) द्वितीय रोपाई करने के एक महीने बाद और तृतीय द्वितीय खुराक देने के एक महीने बाद देनी चाहिए।

कटाई

पचौली एक बहुवर्षीय पौधा होता है, इसलिए इसकी कई कटाई की जाती है। पहली कटाई के लिए तैयार होने में फसल को 5-6 महीने का समय लगता है। पचौली की कटाई तेज हासिएं के द्वारा पौधे के नीचे वाले भागों को छोड़कर प्रातः अथवा सायकाल के समय करनी चाहिए। तनों में अति भंगुरता के होने पर शाखाओं की सम्भावित क्षति से बचना चाहिए। अधिकतर पौधे के रि एवं शाकीय भाग की ही कटाई करनी चाहिए, जिसमें कम से कम 60 से 70 प्रतिशत पत्तियाँ हों और उसमें तने का भाग कम से कम रखना चाहिए। पहली कटाई के बाद की जाने वाली सभी कटाईयाँ 3 माह के अंतराल पर करनी चाहिए, परन्तु उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों की तीव्र सर्दियाँ कटाई के इस अंतराल के समय में वृद्वि करती हैं।

लगातार तीन कटाई करने के पश्चात् पचौली के उत्पादन एवं गुणवत्ता में कमी आने लगती है। अतः स्थिति के अनुसार पचौली की फसल की उत्पादकता और पौध संख्या के आधार पर 2 से 3 वर्ष तक सतत् बनाए रखा जा सकता है। दक्षिण भारत की उष्ण आर्द्र 

जलवायु में पचौली को दो वर्ष तक छाया अथवा खुले स्थानों पर रखा जा सकता है, परन्तु उपोष्णीय उत्तरी भारत में केवल 2 से 3 कटाई तक ही सीमित रखना उचित रहता है।

बागानों में पचौली का समन्वय मूल्य-वर्धक फसल के रूप में

पचौली एक छाया प्रिय फसल है, अतः बागानों में पंक्तियों के बीच वाले छायादार भागों में इसे उगाया जा सकता है। पॉपलर, पपीता, आम, आंवला, नारियल और सुपारी आदि के बागानों में पचौली को अंतः फसल के रूप में अच्छे प्रकार से समन्वित किया जा सकता है। पश्चिमी घाट के विभिन्न प्रकार के बागानों में प्रति इकाई भूमि पर अधिक लाभ प्राप्त करने हेतु पचौली को अन्तः फसल के रूप में लिया जा सकता है।

आसवन

पचौली की सूखी हुई पत्तियाँ और नर्म शाखाओं का वाष्प आसवन से इसका सगंध तेल प्राप्त होता है। वायु के द्वारा छाया में सूखी हुई इसकी पत्तियों को आसवन इकाई में भरकर 6 से 8 घंटे तक सतत् वाष्प आसवन के द्वारा ही पचौली का सम्पूर्ण आसव होता है।

ऊपज

                         

पचौली में शाक उत्पादन की क्षमता विभिन्न कारकों पर निर्भर करती है, परन्तु उनमें से पचौली को उगाए जाने वाली जलवायु सबसे अधिक प्रमुख होती है। उचित जलवायु की दशाओं में इसकी चार कटाईयों से 20-25 टन/हे0 तक शाक प्राप्त हो जाता है, जबकि उत्तर भारत की प्रबल जलवायु की दशाओं में 2-3 कटाईयों में 12-15 टन/हे0 तक शाक प्राप्त होता है। इसके अलावा तटीय और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में तेल का उत्पादन 80-100 कि.ग्रा./हे0, मध्य क्षेत्र में तेल का उत्पादन 60-80 कि.ग्रा. और उत्तरी भारतीय क्षेत्रों में इसके तेल का उत्पादन 60-80 कि.ग्रा. तक प्राप्त हो जाता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।