
सरसों में सफेद रतुआ का सन्देह Publish Date : 25/02/2026
सरसों में सफेद रतुआ का सन्देह
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
कोहरे के चलते सरसों में सफेद रतुआ रोग के लगने का अंदेशा रहता है। इस बीच जिले में विभिन्न स्थानों पर फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर इसके लिए किसानों को अलर्ट भी कर दिया गया है। इस रोग से फसल को रोग से बचाने के लिए छिड़काव करने की सलाह दी गई है।
जिले में लगभग 6 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि पर सरसों की फसल है। विभिन्न स्थानों का भ्रमण कर रही कृषि वैज्ञानिकों की टीम को कई स्थानों पर सरसों की फसल में सफेद रतुआ रोग के लक्षण भी दिखाई दिए हैं। हालांकि अभी यह केवल शुरूआत भर ही है, लेकिन माना जाता है कि नमी के लगातार बने रहने से यह रोग बढ़ भी सकता है। यदि तापमान रोग के अनुकूल रहता है तो इस रोग से सरसों के किसानों को फसल बचाने के लिए प्रयास करने की सलाह दी जा रही है।

इसके सम्बन्ध में किसानों को सलाह दी जाती है कि यदि खेत में उन्हें पौधों की निचली सतह पर सफेद, मलाईदार पीले रंग के छलले बनते हुए दिखाई दें तो किसानों को अपनी फसल के ऊपर तुरंत ही छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के लिए 600 ग्राम मैन्कोजेब (डायथेन एम-45) 250 से 300 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ की दर 15 दिनों के अन्तराल पर दो छिड़काव करने चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य कई दवाईयाँ भी बाजार में उपलब्ध हैं।
सरदार वल्ल्भभाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक प्रोफेसर आ. एस. सेंगर बतातें हैं कि फसल पर इस रोग के लक्षण दिखाई देते ही बचाव के उपाय करने से फसल को रोग से होने वाली हानि से बचाया जा सकता है, परन्तु यदि यदि रोग बढ़ जाता है तो रोग के चलते गम्भीर हानि हो सकती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
