बसन्तकालीन गन्ने में मोथे से पाएं छुटकारा      Publish Date : 21/02/2026

बसन्तकालीन गन्ने में मोथे से पाएं छुटकारा

                                                                                             प्रोफेसर आर. एस. सेगर एवं अन्य

भारतीय दशाओं में 10 महीने से लेकर 18 महीने तक की अवधि के दौरान पेराई के योग्य होती है। स्पष्ट है कि इस दौरान गन्ने से खरीफ, रबी और जायद तीनों ही मौसम में उगने वाले खरपतवार गन्ने की फसल से स्पर्धा करते हैं, परन्तु इसमें गन्ने की बुवाई के समय अर्थात फरवरी-मार्च के महीने में पाए जाने वाले खरपतवार, जिनमें मोथा सबसे अधिक प्रमुख है, फसल को सबसे अधिक हानि पहुँचाजा है।

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ, में किए गए शोध परिणामों से ज्ञात होता है कि गन्ने की मुख्य फसल अर्थात गन्ने की बसन्तकालीन (फरवरी-मार्च) की गन्ने की फसल में सबसे अधिक हानि मोथा के द्वारा ही पहुँचाई जाती है। इसकी तुलनात्मक सधंनता अन्य सभी प्रकार के खरपतवारों से कहीं अधिक यानी 60 से 90 प्रतिशत तक होती है।

                                

जहाँ तक भौगोलिक स्तर पर मोथा की उपस्थिति का प्रश्न है तो यह भारत के समस्त गन्ना उगाने वाले क्षेत्रों में मोथे के द्वारा गन्ने की फसल में काफी अधिक हानि पहुँचायी जाती है। बुवाई के तुरंत बाद से लेकर गन्ने के अंकुरण होने तक (30-45 दिन) पर्याप्त नमीं और पोषक तत्वों की उपलब्धता तथा स्पर्धा रहित दशाओं में मोथा तीव्र गति से विकास करता है और 3-4 सप्ताह की अवधि में इसकी मात्र एक गाँठ से 25-30 गाँठें विकसित हो जाती हैं, जिसके चलते मृदा से नमीं का ह्रास बहतु तेजी से होता है और इससे गन्ने का अंकुरण बुरी तरह (लगभग 50 प्रतिशत तक) प्रभावित होता है।

इस अवधि में मोथा से स्पर्धा के कारण अंकुरण के पश्चात् कल्ले फूटने और फसल की ओज में भी उल्लेखनीय रूप सें कमी आती है। विभिन्न शोध परिणामों से ज्ञात होता है कि गन्ने की फसल में अंकुरण और कल्ले फूटने की अवस्था पर खरपतवारों के साथ होने वाली स्पर्धा सबसे अधिक हानिकारक होती है अर्थात इस अवधि के दौरान खरपतवार विशेष रूप से मोथा को नियंत्रित कर गन्ने की उपज में होने वाली हानि को इसके न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है।

मोथे से छुटकारा पाने के तरीके

लगभग सभी फसलों की तरह से ही गन्ने की फसल में भी मानवीय श्रम के अतिरिक्त यांत्रिक एवं रासायनिक विधियों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न शोध संस्थानों के द्वारा किए गए प्रयोगों के माध्यम से ज्ञात होता है कि गन्ने की बुवाई करने के 30 से 45 दिन की अवस्था पर कुदाल से गुड़ाई करने पर मोथा खरपतवार की वृद्वि को प्रभावी तरीके से नियंत्रित किया जा सकता है।

इसी प्रकार बैलों के द्वारा चालित त्रिफाली से गन्ने की पंक्तियों के मध्य निराई-गुड़ाई करना भी लाभकारी सिद्व होता है। खरपतवार नियंत्रित करने की यह विधियाँ जहाँ एक ओर अत्यंत श्रम, साहस और दुरूह होती हैं, वहीं दूसरी ओर इनका प्रभाव भी तात्कालिक ही होता है और अगली सिंचाई करने के तुरंत बाद मोथा की भूमिगत गाँठों से नए प्ररेाह विकसित हो जाते हैं एवं अनुकूल तापमान व पर्याप्त नमी का लाभ लेकर पुनः पोषक तत्वों के प्रति तीव्र स्पर्धा करते हैं।

                              

मानव श्रम की अनुपलब्धता अधिक लागत तथा गन्ने की पंक्तियों में उगे खरपतवार का अप्रभावी नियंत्रण भी इन विधियों को अलोकप्रिय बनाता है। ऐसी दशा में खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक विधि, जिसमें गन्ने गन्ने के अंकुरण से पूर्व अथवा उसके बाद शाकनाशी रसायनों का छिड़काव किया जाता है, जो कि अधिक लाभकारी सिद्व होता है। गन्ने के खरपतवार नियंत्रण के लिए विगत पचास वर्षों में लगभग 30 से अधिक शाकनाशी रसायों की नियंत्रण करने की क्षमता का अध्ययन किया गया है।

इनमें एक्ट्रिल-डी, एसुलाम, डाइयुरान से लेकर सिमाजीन, एट्राजीन और 2-4डी तक की संस्तुति की गई। यह समस्त शाकनाशी संकरी एवं चौड़ी पत्ती वाले एकवर्षीय एवं बहुवर्षीय खरपतवारों को प्रभावी रूप से नियंत्रित करते हैं। इसी कारण गन्ने में रासायनिक विधि के द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई करने के तुरंत बाद एट्रजीन 2 कि.ग्रा. सक्रिय अवयव/हैक्टर तथा बुवाई के 60 दिन बादउ 2-4डी 1 कि.ग्रा. सक्रिय अवयव/हैक्टर का प्रयोग करना गन्ने में वृहत स्तर पर संस्तुत किया गया है, परन्तु इन रसायनों का प्रयोग करना मोथा के नियंत्रण में प्रभावी नहीं पाया गया, क्योंकि मोथे की भूमिगत गाँठों से पुनः नए प्ररोह विकसित होने लगते हैं।

सारणीः बसन्तकालीन गन्ने में उगने वाले खरपतवारों पर विभिन्न उपचारों का प्रभाव (वर्ष 2004-2008 तक का औसत)

उपचार मात्रा (कि.ग्रा./हेक्टेयर)उपचार का समय (बुवाई के बाद दिनों में) आपेक्षिक सघंनता () संकरी पत्ती चौड़ी पत्ती मोथा शुष्क पदार्थ (ग्रा0/मी2) गन्ने की उपज (टन प्रति हेक्टेयर)

सल्फेन्ट्राजोन + एट्राजीन एमेट्रिन बास्ता

सल्फेन्ट्राजोन + पेन्डिमिथलीन

गलायफीसेट-गुड़ाई

भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, में वर्ष 2004-2008 तक नए शाकनाशियों के परक्षण के दौरान सल्फेट्रजोन नामक शाकनाशी पृथक रूप से तथा एट्राजीन के साथ मोथे के नियंत्रण के लिए अत्यंत ही प्रभावी पाया गया है। उपरोक्त सारणी में प्रस्तुत किए गए आंकड़ों से स्पष्ट है कि विभिन्न शाकनाशियों के प्रयोग से खरपतवारों के शुष्क वजन में अनुपचारित दशा (42 ग्रा0/वर्गमीटर) की तुलना में स्पष्ट रूप से कमी दर्ज की गई। विशेष रूप से तीन बार गुड़ाई करने पर खरपतवारों के द्वारा मात्र 102 ग्राम/वर्ग मीटर शुष्क पदार्थ का उत्पादन किया गया।

शाकनाशियों के उपचारों में सल्फेन्टोजोन और एट्राजीन का क्रम 0.5 और 2.0 कि.ग्रा. सक्रिय अवयव प्रति हैक्टेया का मिश्रित प्रयोग करने से खरपतवारों की वृद्वि में काफी कमी दर्ज की गई तथा उनका शुष्क पदार्थ उत्पादन मात्र 15.1 ग्राम प्रति वर्गमीटर तक रह गया था।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।