
सरसों की खेती में लाभ: बीज से लेकर फसल कटाई तक की पूरी प्रक्रिया Publish Date : 06/01/2026
सरसों की खेती में लाभ: बीज से लेकर फसल कटाई तक की पूरी प्रक्रिया
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
सरसों की खेती भारत की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। यह फसल भारत के विभिन्न राज्यों में उगाई जाती है, जिनमें राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, और पश्चिम बंगाल आदि प्रमुख हैं। सरसों के तेल का उपयोग रसोई में बुनियादी सामग्री के रूप में किया जाता है, और इसकी खेती से किसानों को अच्छा लाभ प्राप्त होता है।
सरसों की फसल का संक्षेप में परिचय

सरसों एक तिलहन वर्गीय फसल है, जो मुख्यतः बुआई के बाद लगभग 3-4 महीने में पककर तैयार हो जाती है। यह फसल ठंडी जलवायु में अच्छी तरह से उगती है और इसकी पैदावार में कई प्रकार के जैविक और रासायनिक कारक शामिल होते हैं।
मिट्टी की आवश्यकताएँ
सरसों की खेती के लिए मिट्टी का उचित होना बहुत आवश्यक है। यह फसल अच्छी जल निकासी वाली हल्की से मध्यम भूमि में अच्छा पैदावार देती है। मिट्टी का पीएच मान 6 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
जलवायु की आवश्यकताएँ
सरसों को ठंडी और शुष्क जलवायु पसंद है। तापमान 15 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच होने पर सरसों की फसल अच्छी तरह से विकसित होती है।
भूमि तैयारी
सरसों की बुआई से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई करनी चाहिए। खेत को समतल करने के लिए एक या दो बार हल से जुताई करें, ताकि मिट्टी में ऑक्सीजन की मात्रा बनी रहे और पानी का रिसाव अच्छे से हो।
सरसों की खेती का समय
सरसों की बुआई का समय अक्टूबर से नवंबर के बीच होता है, जो जलवायु के आधार पर थोड़ा बदल सकता है।
बीज दर और दूरी
सरसों के बीज की दर लगभग 1.5 से 2 किलोग्राम प्रति एकड़ होती है। बीजों की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर के बीच रखनी चाहिए।
बीज उपचार
बीजों को बुआई से पहले कात्यायनी समर्था फफूंदीनाशक को 3 ग्राम/कीलों बीज के हिसाब से उपचारित करना चाहिए ताकि बीजों से होने वाली बीमारियाँ नियंत्रित की जा सकें।
सिंचाई
सरसों में सिंचाई का ध्यान रखना महत्वपूर्ण है। बुआई के समय एक हल्की सिंचाई दें और उसके बाद मौसम के हिसाब से 15 से 20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें।
रासायनिक उर्वरक और खाद
खेत में 20-25 टन गोबर की खाद डालें। रासायनिक उर्वरक के रूप में 60 किलो नाइट्रोजन, 30 किलो फास्फोरस और 30 किलो पोटाश प्रति एकड़ उपयोग करें।
फसल सुरक्षा (कीट और रोग)
माहू (लिपाफ़िस एरिस्मी)
लक्षण: पत्तियों की ऊपरी सतह से रस चूसते है और हमेशा झुण्ड में हमला करते है।
नियंत्रण : कात्यायनी डीमैट को 300 मिली प्रति एकड़ छिड़काव के माध्यम से प्रयोग करे।
पेंटेड बग (बारग्रादा हिलारिस क्रूसिफेरारम)
लक्षण: पत्तियों के किनारे सफेद धब्बे और अनियमित छेद बन जाते हैं।
उपाय: कात्यायनी क्लोडा का 80- 100 मिली/एकड़ का छिड़काव करें।
सफेद रोली / वाइट रस्ट
लक्षण: पत्तियों, तनो और फलियों पर सफेद धब्बे और पत्तियों का मुरझाना।
उपाय: कात्यायनी टेबुसुल का उपयोग 500 ग्राम प्रति एकड़ छिड़काव करें।
पाउडरी मिल्ड्यू / छाछया रोग
लक्षण: पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसी परत बनना।
उपाय: कात्यायनी मेटा - सल्वेट को 400 मिली प्रति एकड़ प्रयोग करें।
अधिक यूरिया एवं नमी की वजह से सरसो की फसल हो रही है खराब

इस बार सरसो के खेतों में दिख रही है अजीब बिमारी क्या है वजह और कैसे होगी कंट्रोल किसान इसे लेकर है चिंतित।
इस बीमारी का नाम collar rot है यह Sclerotium rolfsi फफूँद की वजह से होती है
1. जिसको रोकने के लिये कार्बेंनडिज्म 12% + मैंकोजेब 63% WP कवकनाशी का 2 ग्राम एक लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर इतना स्प्रे करें कि पौधा और तना पूरी तरह से भीग जाए और पानी टपक कर जमीन पर आने लगे इसे ड्रेंचिंग कहते है।
2. सल्फर + हेक्जाकोनाजोल 5% + वेलिडामाइसीन 2.5% मिलाकर छिड़काव करें।
निष्कर्ष
सरसों की खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं यदि सही समय पर खेती की जाए और उचित पैकेज ऑफ प्रैक्टिसेस का पालन किया जाए। इससे ना सिर्फ फसल की गुणवत्ता बढ़ेगी बल्कि पैदावार में भी वृद्धि होगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
