
गन्ना किसानों की आय दोगुनी करने में गन्ने के साथ आलू की सहफसली खेती की महत्ता Publish Date : 15/12/2025
गन्ना किसानों की आय दोगुनी करने में गन्ने के साथ आलू की सहफसली खेती की महत्ता
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य
भारत में गन्ना का उत्पादन प्राचीन काल से होता आ रहा है, जिसका मुख्य उपयोग शर्करा बनाने में में किया जाता था, किंतु आधुनिक काल में गन्ने से विभिन्न उत्पाद बनाए जाते है जैसे गन्ने के रस से राब, चीनी, गुड, सिरका, शराब एवं खोई को कागज उद्योग में प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। गन्ना मिलो से निकले प्रेसमड का उपयोग भूमि शोधन में किया जा रहा हैं। साथ ही साथ गन्ने से इथेनॉल का उत्पादन किया जाता है जिसे ऑटोमोबाइल सेक्टर में प्रयोग किया जा रहा है।
गन्ना हमारे देश के 7.5 प्रतिशत लोगो को रोजगार देता हैं। गन्ना उत्तर भारत में 11 से 12 महीने में तैयार होती हैं, जिससे गन्ना किसानों को आय की प्राप्ति एक वर्ष बाद होती हैं, जिससे किसानों को आय के आने का इंतजार करना पड़ता है। इसलिए गन्ना किसान गन्ना के मध्य पड़ी जमीन को उपयोग करके अपनी आय मे वृद्धि कर सकते हैं।
लखीमपुर के पलिया ब्लाक के किसान गन्ने के साथ सहफसली खेती में आलू और मसूर उगा कर प्रति एकड़ की दर से ₹ 1.70 लाख रुपए की आमदनी अर्जित कर रहे हैं जो अपने क्षेत्र में किसानों के लिए प्रेरणा के स्रोत बन गए हैं। शरदकालीन गन्ने की अगेती किस्म की बुवाई 15 सितंबर से अक्टूबर तक करते हैं, जो गन्ने के मध्य आलू की लाइन उगाते हैं। गन्ना की फसल का सही समय पर भुगतान नहीं होने पर खेत की जरूरतें पूरी नहीं कर पाते थे। इसलिए इस समस्या से निपटने के लिए नई तकनीक से आलू की सहफसली खेती के माध्यम से कम समय में अपनी आवश्यकताएं पूरी कर सकते हैं।
गन्ने के साथ आलू की सहफसली खेती

गन्ना किसानों की आय में वृद्धि के लिए आलू की अन्तः फसल वरदान साबित हो सकती हैं जिसके निम्न कारण हैं:
- गन्ना की फसल बुवाई से 120 दिन तक वानस्पतिक वृद्धि बहुत कम होती है, जिससे गन्ने के मध्य पड़ी जमीन पर खरपतवार उगते हैं जिससे गन्ने की फसल से प्रतियोगिता, प्रकाश एवं पोषक तत्वों को ग्रहण करते हैं जिससे खरपतवार के लिए अन्तः सस्यन करना पड़ता है। अगर आलू की फसल को अन्तः फसल के रूप में उगाते हैं तो आलू के पौधे की वानस्पतिक वृद्धि तीव्र गति से होती है जिससे खरपतवार नही उगते हैं।
- आलू और गन्ने की बुवाई का समय एक समान होने पर इनकी बुवाई में किसी प्रकार की असुविधा नही होती हैं।
- अन्तः फसल के रूप में आलू को बोने से गन्ने के लिए निराई, गुड़ाई नहीं करनी पड़ती है।
- तापमान 26-32 डिग्री सेल्सियस होने से दोनो फसलों का जमाव सुचारू रूप से होता है।
- गन्ने के साथ आलू की अंतः फसल लेने पर आलू में मिट्टी चढ़ाने और आलू की खुदाई से अन्तः सस्यन की क्रिया हो जाती है जिससे गन्ने की जड़ों को उचित वायु का संचार बना रहता है जिससे हमारी मुख्य फसल की पैदावार में वृद्धि होती है।
- गन्ने में आलू की खुदाई के बाद आलू के फसल अवशेषों को मिट्टी में दबा देने से मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती है।
- आलू नकदी फसल होने के करण किसानो को अच्छे दाम प्राप्त होते हैं और किसानों के आय का स्रोत बना रहता है जिससे किसानो को गन्ने की फसल पर आश्रित नहीं रहना पड़ता है।
भूमि: गन्ने के साथ सह फसली खेती बलुई दोमट या दोमट भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है, जिसमें उपयुक्त जल निकास का होना अति आवश्यक होता है।
खेत की तैयारी: खेत की तैयारी के लिए एक जुताई मिट्टी पलट हल से एवं तीन से चार जुताई कल्टीवेटर से करनी चाहिए और साथ ही साथ पाटा लगा कर खेत को समतल कर देना चाहिए। खेत की तैयारी से पूर्व 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कंपोस्ट (सड़ी गोबर की खाद) का प्रयोग करना चाहिए।
शरदकालीन गन्ने की बुवाई 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक की जाती है। इस समय तापमान 26 से 32 डिग्री सेल्सियस के मध्य होता है जो अंकुरण के लिए उपयुक्त होता है।
बीज: बीज के लिए गन्ने को लेते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- 1/3 भाग ऊपर के गन्ने को बीज के रूप में प्रयोग करना चाहिए।
- आँखें स्वस्थ होनी चाहिए एवं किसी प्रकार से क्षतिग्रस्त नहीं होनी चाहिए।
- बीज के लिए पेड़ी के गन्ने का उपयोग नहीं करना चाहिए।
- गन्ना बीज रोग एवं कीट रहित होना चाहिए।
बीज दरः गन्ने की बुवाई में 60-70 कुंतल बीज या 35,000-40,000 सेट प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है।
बीज उपचार: गन्ने में बीज से प्रसारित होने वाली बीमारियों की रोकथाम के लिए बीज का उपचार करना अति आवश्यक है। बीज को उपचारित करने के लिए तीन आँखों वाले टुकड़े काटकर एगलोल (3 प्रतिशत) के 0.5 प्रतिशत घोल या एरिटान 6 प्रतिशत घोल में या कार्बेन्डाजिम (100 ग्राम) को 100 लीटर पानी में 35 कुंतल गन्ने का उपचार 5 मिनट तक उपचारित करना चाहिए। गन्ने के टुकड़ों को 54 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्म हवा से 4 घंटे तक उपचारित करने से करने से लाल सड़न रोग, पेड़ी का बौना पन, उकठा आदि रोगों का प्रकोप नहीं होता है।
खाद एवं उर्वरक: गन्ने के लिए 150:60:60 एनपीके की आवश्यकता होती है एवं खेत की तैयारी के समय 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद या कंपोस्ट का प्रयोग करना चाहिए।
आलू की प्रमुख अन्तः फसल वाली किस्में: कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी अशोका, कुफरी बहार, कुफरी अलंकार, कुफरी मोती, कुफरी पुखराज, कुफरी जवाहर आदि का जीवन चक्र 80 से 85 दिन (अगेती किस्म) में पूरा कर लेती है। 1 पौधे में अधिकतम छोटे बड़े आलुओं की फलत संख्या 23 प्राप्त हुई, जो अच्छे उत्पादन को प्रदर्शित करती है।
निम्न सारणी से हमें ज्ञात होता है कि आलू की फसल गन्ने में सहफसल के रूप में उगाने से सर्वाधिक लाभ प्राप्त होता है।
|
फसल |
शुद्ध लाभ (₹) |
लागत (₹) |
लाभ लागत अनुपात |
|
शरदकालीन गन्ना |
1,33,395 |
1,21,715 |
1.10 |
|
गन्ना + फूल गोभी |
2,26,547 |
1,43,623 |
1.58 |
|
गन्ना + बन्द गोभी |
2,37,525 |
1,43,715 |
1.65 |
|
गन्ना + गाठ गोभी |
2,32,941 |
1,43,709 |
1.62 |
|
गन्ना + शलजम |
2,04,826 |
1,45,634 |
1.41 |
|
गन्ना + गाजर |
1,88,681 |
1,45,579 |
1.30 |
|
गन्ना + मूली |
1,61,560 |
1,43,810 |
1.12 |
|
गन्ना + आलू |
3,21,282 |
1,63,098 |
1.97 |
गन्ना-आलू अंतः फसल की उपयोगिता
गन्ना में आलू की अंतः फसल उगाने से आलू की फसल मुख्य रूप से अपना जीवन चक्र (80 से 85) (अगेती किस्म) दिन मैं पूरा कर लेती है जिससे किसानों को गन्ना की फसल का कटने का इंतजार नहीं करना पड़ता और किसानों को आय का स्रोत प्राप्त होता रहता है। आलू की फसल मुख्य रूप से शीतोष्ण जलवायु का पौधा है जिसके लिए नम एवं कम तापमान की आवश्यकता होती है जो शरदकालीन गन्ने के मध्य बोने पर यह अपना विकास सुचारू रूप से करती है। आलू की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता अन्य सब्जियों की फसलों से अधिक होने के साथ-साथ इससे बनने वाले विभिन्न उत्पादों का उच्च मूल्य प्राप्त होता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
