गन्ने का उत्पादन बढ़ाने के कुछ मूलमंत्र      Publish Date : 13/12/2025

                   गन्ने का उत्पादन बढ़ाने के कुछ मूलमंत्र

                                                                                                                                                                       प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं अन्य

गन्ने की फसल की उचित देखभाल, कीट एवं बीमारियों की रोकथाम और सस्य क्रियाओं का सही समय और सही तरीके से उपयोग करने पर गन्ने की उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए किसान भाईयों को लेख में आगे दी जा रही कुछ प्रमुख बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए ताकि गन्ने की वांछित उपज प्राप्त की जा सके।

खेत का चयन एवं उसकी तैयारीः गन्ने की बुवाई करने के लिए खेत का समतल होना, खेत में जल भराव की स्थिति न हो, और यदि ऐसी स्थिति है तो जल निकास की समुचित व्यवस्था का होना भी बहुत आवश्यक है। खेत की पहली जुताई डिस्क हैरो से कने के बाद इसकी दूसरी जुताई कल्टीवेटर करने के बाद खेत में सुहागा/पाटा चलाकर समतल करने के बाद परिष्कृत विधि से गन्ने की बुवाई करनी चाहिए।

क्षेत्रानुसार उत्तम किस्म का चयनः क्षेत्र विशेष की जलवायु के अनुसार ही गन्ने की किस्म का चुनाव करना चाहिए। इसके लिए अधिक उपज एवं पेड़ी की क्षमता से युक्त प्रजाति को चयन करने में वरीयता देनी चाहिए। गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र करनाल के द्वारा गन्ने की नवविकसित अगेती प्रजातियों में को.-98014, को.-0118, को.-0237, को.-0238, को.-0239, को.-05009 एवं मध्यम देर से पकने वाली किस्म को.-05011 आदि को हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड़ आदि राज्यों के लिए अनुकूल घोषित किया गया है। इसके अतिरिक्त गन्ने की किस्म को.-0238 लवणीय भूमि के लिए भी अनुकूल है। जल-भरव तथा जंगली-सुअर प्रभावित क्षेत्रों के लिए गन्ने की किस्म को.-98014 एक अच्छा विकल्प है, जबकि को.-05011 एक न गिरने वाली किस्म है।

                                                           

बीज की मात्राः गन्ने की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए प्रति एकड़ 14,500-15,000 आँखें अंकुरित होनी चाहिए। इसके लिए प्रति एकड़ लगभग 30-40 क्विंटल गन्ने का बीज पर्याप्त होता है, जिसमें एक आँख वाले 31,000-31,500 टुकड़े, दो आँख के 36,500-27,000 और तीन आँख वाले 16,000-17,000 टुकड़ों का प्रयोग किया जाता है। गन्ने की अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए सदैव स्वस्थ बीज का ही उपयोग करना चाहिए। 10-12 माह पुरानी बीज फसल का ऊपरी 2-3 हिस्सों को ही बीज के लिए प्रयोग करना उत्तम रहता है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि बीज सामग्री आनुवांशिक शुद्वता के साथ-साथ अच्छी देखरेख वाली त्रि-स्तरीय नर्सरी प्रणाली के द्वारा विकसित की गई हो।

बीजोपचारः अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए रोग रहित स्वस्थ बीज का ही प्रयोग करना चाहिए। गन्ने की बुवाई करने से पूर्व गन्ने के टुकड़ों को कॉर्बेन्डाजिम के एक प्रतिशत (100 ग्राम कॉर्बेन्डाजिम को 100 लीटर) पानी में घोलकर 35 क्विंटल बीज का 15 मिनट तक उपचार कर गन्ने की बुवाई करनी चाहिए। बीज गन्ना (नर्सरी) खेत की बुवाई के लिए गन्ने के बीज को नम उष्ण हवा उपचार संयंत्र में 540 सें. तापमान पर दो घंटे तक उपचार करने के बाद गन्ने की बुवाई करनी चाहिए।

बुवाई करने की विधिः गन्ने की बुवाई निम्नलिखित परिष्कृत विधियों के द्वारा करने से परम्पागत सपाट विधि से बुवाई करने की तुलना में प्रति सूक्ष्म इकाई फसल की देखरेख करने का अच्छा अवसर मिलता है और सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली भी स्थापित की जा सकती है। अन्तः सस्य क्रियाएं भी सुगतमा से की जा सकती हैं। इससे गन्ने का अधिक फुटाव होता है और अन्तः फसली खेती करना भी आसान हो जाता है तथा अंततोगत्वा प्रति इकाई अधिक उत्पादन प्राप्त होने से किसान की आय भी बढ़ती है।    

एक आँख सेट (गंडीरी) की बुवाई विधिः एक आँख सेट (गंडीरी) की बुवाई करने की विधि के अन्तर्गत 40-50 प्रतिशत तक बीज की बचत होती है, जलछी एवं तीव्र अंकुरण होता है, फसल कह बढ़वार एवं पकना समरूपता के साथ होता है। इस विधि से बुवाई करने पर खेत में रिक्त स्थान भी कम रहते हैं और उपज भी अधिक प्राप्त होती है।

स्थानोचित रोपण विधिः स्थानोचित रोपण विधि में पहले उभरी हुई भू-शैया पर एक आँख सेट से पौध नर्सरी तैयार की जाती है। एक एकड़ की पौध सामग्री के लिए 35 वर्ग मीटर नर्सरी क्षेत्र की आवश्यकता होती है।छह-सात सप्ताह की आयु वाली 14,000-15,0000 पौध/एकड़ के लिए आवश्यक होती है, जिसको तैयार खेत में 90 से.मी. पर बनाई गई पंक्तियों में एक फुट की दूरी पर लगाया जाता है।

पॉली बैग नर्सरी से पौध तैयार करनाः पॉली बैग नर्सरी से पौध तैयार करने के लिए एक आँख वाले सेट प्लास्टिक की थैली में पौध मिश्रण (रेत एक भाग, मृदा एक भाग तथा कम्पपोस्ट खाद एक भाग) में लगाए जाते हैं। एक से डेढ़ महीने में यह पौध रोपाई करने के लिए तैयार हो जाती है, इसके बाद तैयार पौध को एक-एक फुट की दूरी पर रोप दिया जाता है।

बड चिप तकनीकः बड चिप तकनीक के अन्तर्गत गन्ने की गाँठ से केवल आँख वाला भाग बड चिप मशीन के माध्यम से निकाल लिया जाता है और इमिडाक्लोप्रिड 20 मिली. कार्बेन्डाजिम 10 ग्राम दवाओं को 10 लीटर पानी में घोलकर पाँच मिनट तक उपचारित करने के बाद दो घंटे धूप में सुखा लेते हैं। इसके बाद प्लास्टिक की थैलियों या खाँचों वाली ट्रे को काली पॉलीथिन चादर से 6-7 दिनों के लिए ढककर, सभी ट्रे को सूर्य के प्रकाश में रख दिया जाता है। प्रति एकड 13,500 से 16,000 बड चिप (50 खाँचों वाली 320 ट्रे) से प्राप्त पौध की आवश्यकता होती है। एक महीने के बाद पौध रोपाई करने के के लिए तैयार हो जाती है।

ट्रैंच विधिः ट्रैक्टर चालित रिजर की सहायता से 30-120-30 से.मह. की दूरी पर 25 से.मी. गहरी ट्रैंच बनाई जाती हैं, जिनमें सिरे से सिर मिलाकर एक या दो आँख वाली गंडीरी की बुवाई की जाती है।

रिंग पिट विधिः ट्रैक्टर चालित रिंग पिट डिगर की सहायता से 60 से.मी. व्यास के 30 से.मी. हरे गड्ढे 60 से.मी. की दूरी पर प्रति एकड़ लगभग 2,700 गड्ढे बनाए जाते हैं। रिंग पिट विधि के अन्तर्गत एक आँख वाले 35-40 तथा दो आँख वाले 22 गन्ने के टुकड़ों को लगाया जाता है। प्रति गड्ढ़ा 7-8 किलोग्राम गोबर की गली-सड़ी खाद और 800 ग्राम डी.ए.पी. तथा 125 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश बुवाई से पहले डाल दी जाती है। ड्रिप सिचाई प्रणाली के साथ रिंग पिट विधि सर्वाधिक लाभकारी सिद्व होती है।

गन्ने की बुवाई का समय (अक्टूबर से दिसम्बर माह)

बसन्तकालीन (फरवरी-मार्च) एवं ग्रीयमकालीन गेहूँ की कटाई करने के बाद गन्ने की बुवाई की जाती है, इनमें शरदकालीन बुवाइ्र से सर्वाधिक और ग्रीष्मकालीन गन्ने की बुवाई करने पर सबसे कम उपज प्राप्त होती है।

उपयुक्त पौध संख्याः गन्ने के खेत में प्रति एकड़ क्षेत्र में औसतन 40,000-50,000 पेराई योग्य गन्ने की उपज प्राप्त होनी चाहिए। गन्ने की इस संख्या को सुनिश्चित् करने के लिए खेत के अंदर जहाँ कहीं भी कम अंकुरण के चलते खाली स्थान दिखाई दे, ऐसे स्थानों पर मुख्य फसल की बुवाई करने के एक महीने बाद तक पहले से तैयार करके रखी गई पौध को लगा देना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक का प्रबन्धनः 40-50 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से अच्छी तरह से सड़ी-गली गोबर की खाद खेत की बुवाई करने से पहले ही लगा देनी चाहिए अथवा हरित खाद वाली फसलें जैसे कि ढैंचा या मूँग आदि की बुवाई गन्ने की बुवाई करने से तीन महीने पूर्व कर 30-45 दिन की हरी खाद वाली फसल को डिस्क हैरो की सहयता से खेत की मिट्टी में  मिला देना चाहिए। एर्वरक की मात्रा का निर्धारण मृदा की जाँच कराने के बाद ही करना उचित रहता है। देश के हरियाणा राज्य पौधा फसल के लिए प्रति एकड़ 60:20:20 कि.ग्रा. नाईट्रोजनःफॉस्फोरसः पोटाश की मात्रा की तथा पेड़ी फसल के लिए प्रति एकड़ 90:20:20 कि.ग्रा. नाईट्रोजनःफॉस्फोरसः की मात्रा की सिफारिश की गई है। आधी मात्रा नाइट्रोजन और फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा, 50 कि.ग्रा. डी.ए.पी. और 30 कि.ग्रा. म्यरूट ऑफ पोटाश गन्ने की बुवाई करने से पहले खूडों में डाल देनी चाहिए और नाइट्रोजन की शेष मात्रा को 50 कि.ग्रा. गन्ने की बुवाई करने के बाद और बाकी बची मात्रा को बुवाई के 50 दिन बाद डालकर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रणः अधिक बार जुताई और धान के साथ फसल चक्र के अपनाने से खरपतवार को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। अधिक समस्या वाले खेतों में जुताई करने के बाद सिंचाई करके जो भी खरपतवार उग आतग हैं उन पर पैराक्वाट 5 मि.ली. की दर से छिड़काव करने से खरपातवार का प्रभावी नियंत्रण होता हैं। यदि बहुवर्षीय खरपतवार जैसे दूब घास या मौथा आदि की कोई समस्या हो तो पैराक्वाट के स्थान पर ग्लायफोसेट का 15-25 मि.ली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए। गन्ने की बुवाई करने के 2-3 दिन बाद एट्रॉजिन 2 कि.ग्रा. प्रति एकड़ की दर से 350-400 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।

यदि गन्ने के साथ सब्जी, दलहन या तिलहन की अन्तः फसल ली गई हैं तो एट्राम्जिन का छिड़काव नहीं करना चाहिए। गन्ने की बुवाई करने के 45 दिन बाद खुरपी अथवा कस्सी की सहायता से गुड़ाई करें और 60 व 90 दिन के बाद ट्रैक्टर-कल्टीवेटर से गुड़ाई करनी चाहिए। यदि चौड़ी पत्ती के खरपतवार अधिक हैं तो 2,4डी अमाइन सॉल्ट 58 प्रतिशत का एक लीटर प्रति एकड़ की दर से 250-300 पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

सिंचाईः गर्मियों के दिनों में 7 दिन और सर्दी के दिनों में 15-20 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करनी चाहिए।

मिट्टी चढ़ानाः सामान्यतः 90 दिन के बाद हल्की मिट्टी व 120 दिन के बाद पूरी मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। जून के महीने अन्तिम सप्ताह या मानसून से पूर्व मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लिया जाना चाहिए।

                                                                     

गन्ने की बंधाईः फसल की अवस्था के अनुसार जुलाई के महीने के अन्तिम सप्ताह या अगस्त के महीने में गन्ने की पहली बंधाई करनी चाहिए, जिसमें एक ही पंक्त के मूड़ों को आपस में बांध देना चाहिए। इसी प्रकार से गन्ने की दूसरी बंधाई अगस्त के अंत से लेकर सितम्बर के मध्य तक कर देनी चाहिए। आवश्यकता के अनुसार फसल की तीसरी बंधाई जा सकती है। हालांकि गन्ने की बंधाई करते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बंधाई के दौरान गन्ने की गोभ न तो टूटने पाए और न ही दबने पाएं।

कीट प्रबन्धनः गन्ने की बुवाई करते समय 2.5 लीटर क्लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. को 400 लीटर पानी में मिलाकर नाली में बोए गए बीज के टुकड़ों पर गिराना चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह में कार्बोफ्यूरान दानेदार की 13 कि.ग्रा. मात्रा/एकड़ की दर से अथवा क्लोरेन्ट्रेनीलीप्रोल 150 मि.ली. प्रति एकड़ जून के प्रथम सप्ताह में सिंचाई के तीसरे दिन जड़ों के पास 400 लीटर पानी में घोल बनाकर इसका प्रयोग करना चाहिए।

पैदावारः गन्ने की औसत पैदावार 350-450 क्विंटल प्रति एकड़ किस्म एवं प्रबन्ध के अनुसार सुनिश्चित् की जानी चाहिए।

पेड़ी प्रबन्धनः अच्छी पेड़ी उपज क्ष्मता वाली किस्मों यथा को.-98014, को.-0239 या को.-05011 आदि के चयन को प्राथमिकता देनी चाहिए। पौधा फसल की अच्छे तरीके से देखभाल करनी चाहिए, क्योंकि अच्छी पौधा फसल के द्वारा ही अच्छी पेड़ी फसल प्राप्त की जा सकती है। पौधा फसल की कटाई ऐसे समय की जानी चाहिए जो फुटाव के लिए अधिक अनुकूल हो। गन्ने की कटाई भूमि की सतह से ही करनी चाहिए तथा भूमि के ऊपर के ठूंठों को भूमि की सतह से मिलाकर काट देना चाहिए जिससे कि भूमि के नीचे की आँख जल्द ही अंकुरित हो सके तथा गन्ने की जड़ें भी अधिक गहरी हो। गन्ने के ठूंठों पर कार्बेन्डाजिम (एक कि.ग्रा. प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए। इसके साथ ही गन्ने की लाइनों के बीच जुताई करें जिससे भूमि में हवा और पानी का संचार बढ़ सके। फुटाव हो जाने के बाद खाली स्थानों को पहले से अंकुरित टुकड़ों को लगाकर भर देना चाहिए। 90:20:20 कि.ग्रा. नाइट्रोजनः फॉस्फोरसः पोटाश की मात्रा को प्रति एकड़ की दर से देनी चाहिए। इसके फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा तथा नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा जुताई के समय ही देना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी-आधी मात्रा 45 दिन और 90 दिन के बाद डालकर ऊपर से मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

खेत में यदि आयरन अथवा जिंक की कमी के लक्षण दिखाई दे तो फैरस सल्फेट (0.25 प्रतिशत) यूरिया (1.0 प्रतिशत), जिंक सल्फेट का दो बार पर्णीय छिड़काव करना चाहिए। बाकी की सस्य क्रियाएं पौधा फसल की तरह ही ऊपर वर्णित की गई विधि से ही कीट नियंत्रण की प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।