मक्का तथा लोबिया की अंतर्सस्य से कमाएँ अधिक लाभ      Publish Date : 04/12/2025

         मक्का तथा लोबिया की अंतर्सस्य से कमाएँ अधिक लाभ

                                                                                                                                                           प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

भारत की जलवायु परिस्थितियों में प्रति वर्ष दो या दो से अधिक फसलें आसानी से उगाई जा सकती हैं। वर्षा आधारित क्षेत्रों में फसल जोखिम को कम करने के लिए अंतःफसल एक उत्तम विकल्प है। एक ही खेत में दो या दो से अधिक फसलें एक साथ उगाने को अंतःफसल कहा जाता है। दोनों फसलों की बुआई या तो एक साथ या अलग-अलग चरणों में की जाती है। अंतःफसल खेती भारत में मुख्य रूप से भारत के अर्ध-शुष्क और शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है। अंतःफसल से प्राप्त लाभके मूल्यांकन हेतु भूमि समतुल्य अनुपात का प्रयोग किया जाता है। यह दोनों फसलों की संयुक्त पैदावार पर अंतःफसली प्रणालियों के उपयोग के लाभों को मापता है।

अनाज तथा दलहनी वर्ग की फसलों को अंतःफसल के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है। मक्का उर्वरता क्षरण के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील है, जिसमें सबसे अधिक मात्रा में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की हानि होती है जिससे किसानों को काफी नुकसान होता है। इस समस्या के निदान के लिए मक्का के साथ लोबिया की खेती की जा सकती है क्योंकि लोबिया अपनी नाइट्रोजन आवश्यकताओं के अलावा, वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भी स्थिर करता है। यह अंततः अनाज की नाइट्रोजन की आवश्यकताओं को आंशिक रूप से पूरा करने में मदद करता है, जो कि फसल विविधीकरण के द्वारा सब्जियों की उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

                                                                 

लोबिया एक गहरी जड़ वाली, प्रारंभिक विकास के दौरान धीमी गति से बढ़ने वाली फसल है, इसके विपरीत मक्का उथली जड वाली तथा अधिक तेजी से बढ़ने वाली फसल है। जब मक्का को लोबिया के साथ मिश्रण में उगाया जाता है तब प्रति पौधा अधिकतम उपज, शुष्क पदार्थ प्रतिशत और प्रोटीन प्रतिशत का उत्पादन होता है।

खेती की तैयारी

ऐसी भूमि जहाँ सिंचाई की उपयुक्त सुविधा हो तथा जल जमाव एवं ऊसर से मुक्त हो, मक्का और लोबिया के अंतःफसल के लिए उपयुक्त होती है। खेत की तैयारी करते समय मिट्टी पलटने वाले हल से 10-12 सें.मी. गहरी एक जुताई तथा उसके बाद कल्टीवेटर या देशी हल से दो-तीन जुताइयाँ करके पाटा लगा देना चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद होंगा तथा खरपतवार निकालने की व्यवस्था की जाती है। ऐसा करने से खेत की नमी बनी रहेगी तथा खेत खरपतवार से मुक्त हो जाएगा।

किस्मों का चुनाव

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव अति आवश्यक है। किस्मों का चुनाव करते समय ध्यान रखना चाहिए कि किस्म रोग प्रतिरोधी हो तथा क्षेत्र विशेष के लिए अनुकूल हो। मक्का की उन्नत किस्में जैसे कंचन तथा नवजोत आदि का चयन करें तथा लोबिया की उन्नत किस्मों में पूसा कोमल व पंत लोबिया-3 आदि प्रमुख है।

बीजोपचार

बीज सदैव प्रमाणित व फंफूदीनाशक से उपचारित करके बोना चाहिए। लोबिया एक दलहनी फसल है। अतः इसे राइजोबियम कल्वर से भी उपचारित करके बोना चाहिए। राइजोबियम कल्वर से उपचारित करने से पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाली ग्रंथिया अधिक बनती हैं। इससे फसल की अच्छी पैदावार मिलती है।

बुवाई का समय

मक्का तथा लोबिया के अंतरसस्य खेती करने के लिए फसल की बुवाई अगेती करना लाभदायक रहता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो वहाँ पर 1 जून से 15 जून तक फसल की बुवाई कर देनी चाहिए। वर्षा पर निर्भर करने वाले क्षेत्रों में बुवाई जुलाई के प्रथम सप्ताह में ही करनी चाहिए। बुवाई के समय का प्रभाव उपज पर सीधा पड़ता है। देर से बुवाई करने पर उपज में कमी की संभवना रहती है।

बुवाई की विधि

बुवाई सदैव पंक्तियों में करना उत्तम होता है। बुवाई के समय सबसे पहले मक्का के बीजों की बुवाई पारम्परिक विधि से ही कर देनी चाहिए। मक्का की पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखते हुए मक्का की दो पंक्तियों के बीच एक पंक्ति में लोबिया की बुवाई करनी चाहिएतथा 15-20 दिन के बाद निराई के समय अतिरिक्त पौधे निकाल देने चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

अधिक उपज के लिए उर्वरक का उपयोग आवश्यक होता है। उर्वरक डालने से पहले मिट्टी की जाँच जरूर कर लेना चाहिए। लोबिया एक दलहनी वर्ग की फसल है अतः इसे नाइट्रोजन की आवश्यकता कम होती है। प्रारम्भ में राइजोबियम जीवाणु की कार्य-क्षमता बढ़ने तक पौधों को नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। बुवाई से पहले संस्तुत की गई नाइट्रोजन की आधी मात्रा 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर व फॉस्फोरस 60 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर और पोटाश 40 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की पूरी मात्रा मृदा में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। शेष 50 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन बुवाई के 30-35 दिन बाद पंक्तियों के बीच छिड़कें।

सिंचाई

पौधों की उचित बढ़वार के लिए समय पर सिंचाई अति आवश्यक है। वर्षा ऋतु में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता कम होती है किन्तु वर्षा न होने पर सिंचाई करना आवश्यक होता है। पहली सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन बाद मृदा की नमी को ध्यान में रखते हुए हल्की करनी चाहिए। दूसरी तथा तीसरी सिंचाई 15 दिन के अंतराल पर कर देनी चाहिए। वर्षा के अधिक जल को खेत से बाहर निकालने के लिए उचित जल निकास की व्यवस्था भी अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि जल जमाव के कारण पौधों का विकास नहीं होता है तथा उपज में कमी आ जाती है।

निष्कर्ष

इंटरक्रॉपिंग अनिवार्य रूप से एक बहुफसलीय प्रथा है जिसमें एक ही खेत में दो से अधिक फसलें उगाना शामिल हैं। आज किसानों के लिए प्राथमिक चुनौतियों में से एक स्थायी तरीके से प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाना है, जिसे इंटरक्रॉपिंग मॉडल अपनाकर आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान समय में किसान इंटरक्रॉपिंग अपनाकर सीमित संसाधनों के साथ भी कम लागत से अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त, एक ही समय में दो फसलें उगाकर पूरे वर्ष दो फसलें प्राप्त कर सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।