गेहूं में पोटाश की उपयोगिता      Publish Date : 16/11/2025

                         गेहूं में पोटाश की उपयोगिता

                                                                                                                                                     प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं गरिमा शर्मा

भारत में चावल के बाद सबसे अधिक उत्पादन गेहूं का होता है। विश्व के गेहूं उत्पादन और गेहूं के कुल फसल क्षेत्र का लगभग 11 प्रतिशत भारत में ही है जो खाद्यान्न के सकल उत्पादन का 35 प्रतिशत हैं। गेहूं के शानदार उत्पादन के पीछे उर्वरकों के प्रयोग का एक महत्वपूर्ण हाथ है। अनुमान है कि गेहूं की फसल में कुल 28 प्रतिशत नाईट्रोजन, 29 प्रतिशत फॉस्फोरस एवं 15 प्रतिशत पोटाश उर्वरकों का प्रयोग होता है।

गेहूं की अच्छी उपज का आवश्यक आधार- किसान के लिए धरती ही एक अनमोल खजाना है। धरती की उपजाऊ शक्ति ही उसकी शक्ति है। हरी-भरी लहलहाती फसलें पाने के लिए किसान कड़ी मेहनत और खेती के आधुनिक तरीके अपनाते तो हैं लेकिन आमतौर पर एक महत्वपूर्ण बात पर ध्यान नहीं देते, वह है पोटाश खाद का प्रयोग। कृषि विकास के परीक्षणों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पौधों की खुराक में नाइट्रोजन और फास्फेट के साथ पोटाश का होना भी बहुत जरूरी है। इसका महत्व न ही सिर्फ सिंचित खेतों में है, बल्कि असिंचित व सूखे क्षेत्रों में बारानी खेती के लिए भी है।

हालांकि धरती में पोटाशियम की मात्रा होती है, परन्तु वह पौधों को तुरंत और आसानी से नहीं मिल पाती। गेहूं की फसल के अच्छे विकास के लिए पौधों को अनेक मुख्य, सहायक तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इस बारे में रासायनिक खादों के संतुलित उपयोग का बहुत गहरा महत्व है। प्रत्येक फसल उगाने के बाद धरती से अन्य पोषक तत्वों के साथ पोटाश भी काफी मात्रा में कमी हो जाती है। खासतौर पर गेहूं की अधिक उपजाऊ किस्में (एच.वाय.वी.) जमीन से ज्यादा ही पोटाश लेती है। अपनी फसल की अच्छी उपज के लिए धरती की उर्वरा शक्तिबनाए रखने के लिए पोटाश का प्रयोग करना ही चाहिए।

                                                               

गेहूं की फसल प्रति टन अनाज उत्त्पादन के लिए औसतन 67 किलोग्राम नाइट्रोजन फॉस्फोरस पोटाश का शोषण करती है। प्रमाणित सूत्रों के अनुसार 4.6 टन अनाज और 6.9 टन भूसे वाली फसल में 128 किग्रा. नाइट्रोजन, 46 कि.ग्रा. फास्फोरस एवं 219 किग्रा. है। पोटाश की खपत होती है।

पोटाश की विशेषताएं

  • पोटाश के प्रयोग से गेहूं के हर पौधे में अधिक कल्ले निकलते हैं जिससे अधिक बालियां बनती हैं। बालियां व दाने बनने के समय, पोटाशकी सहायता से पूरी खुराक मिलने पर, अधिक दाने बनते हैं। नतीजा अधिक उपज।
  • पोटाश नाइट्रोजन व फास्फेट वाली रासायनिक खादों से पूरा-पूरा लाभदिलाती है और अतिरिक्त नाइट्रोजन से होने वाले नुकसान को रोकती है। इसके प्रयोग से गेहूं में प्रोटीन व काबर्बोहाइड्रेट्स की मात्रा अधिक होती है। नतीजा-मोटे, चमकदार व वजनी दाने।
  • पोटाश से पौधों में अनेक पदार्थों का परिचलन होता है। पौधों की वृद्धि के लिए बहुत जरूरी है।
  • पोटाश जड़ों के विकास में, उन्हें भरपूर लम्बी, मजबूत और स्वस्थ बनने में मदद करती है। जड़ें घनी और लम्बी होने से पौधे धरती से पानी व खुराक अच्छी तरह लेसकते हैं तथा मजबूती से खड़े रहते हैं।
  • पोटाश गेहूं के पौधों के तनों और रेशों को मजबूत नहीं और न ही दाने झड़ने का करती है। इससे पौधे गिरते डर रहता है।
  • पोटाश पौधों में मजबूती लाकर उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों व बीमारियोंका सामना करने की ताकत देती
  • पोटाश पौधों में पानी के उपयोग को नियमित करती है, जिससे पौधा गर्मी, सूखे और पाले को सह सकता है। इस तरह सूखे क्षेत्रों में बारानी खेती के लिए पोटाश बहुत जरूरी और फायदेमंद है।

नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के बढ़ते अनुपात से पोषक तत्वों में असंतुलन पैदा होता है भूमि के उपजाऊपन में कभी आने लगती है और कारणवश भूमि खेती के लिए अयोग्य हो जाती है, जो एक चिन्ता का विषय है। पोटेशियम की कमी के कारण नाइट्रोजन या नाइट्रोजन-फॉस्फोरस की उपलब्धता भी प्रभावित होती है।

गेहूं की फसल को पोटाश न मिलने का अर्थ है

                                                                       

  • अविकसित पौधे ।
  • अविकसित जड़ें, जिससे पौधों को पूरा खुराक पानी नहीं मिलता।
  • फसलों में बीमारियों, कीड़े-मकोड़ों और सूखा आदि का मुकाबला करने की ताकत कम हो जाती है।
  • फसलें गिरने और सड़ने लगती है।
  • गेहूं के दाने कम, छोटे और बदरंग होते हैं।
  • कम पैदावार।

नुकसान से बचने के लिए पोटाश की कमी के लक्षणों का इंतजार नहीं करना चाहिए- पोटाश के प्रयोग से आमतौर पर परिणाम तत्काल दिखने में नहीं आते। पोटाश की कमी का सबसे आम लक्षण है पुराने पत्तों की नोकों और किनारों का समय से पहले मुरझा कर पीला पड़ जाना। अधिक कमी होने से पत्तों के बीच में पीलापन आ जाता है। बहुत अधिक कमी होने पर नन्हें पत्ते पनपते नहीं और छोटी अवस्था में ही मुरझाकर गिर जाते हैं।

पोटाश का प्रयोग कब और कैसे करें?- हाल ही में किये अनुसंधान के नतीजों से पता चलता है कि उर्वरक और खासकर पोटाशियम वाले उर्वरक इस्तेमाल करने के परम्परागत ढंग से परिवर्तन की आवश्यकता है। यह सिद्ध हो गया है कि फसल पर पोटाश के एक बार इस्तेमाल के बजाये उसका अलग-अलग दो-तीन बार प्रयोग करना लाभदायक है क्योंकि फसलों को पूरे समय पोटाशियम की निरन्तर क्रम से आवश्यकता होती है।

इसलिए इंडियन पोटाश लिमिटेड (आई.पी.एल.) के पोटाश का सही समय पर सही मात्रा में प्रयोग करके ही सुनिश्चित किया जा सकता है कि पौधों को पोषक तत्वों की पूर्ति हो रही है। इस प्रबंध से ही फसलों से अधिकतम निकासी एवं लाभ लिया जा सकता है।

पोटाश की सारी मात्रा, यूरिया की आधी मात्रा और फास्फेट की पूरी मात्रा के साथ बुआई के समय डाली जा सकती है, लेकिन पोटाश को यूरिया के साथ 1:1 के अनुपात में 2-3 भागों में बांट कर इस्तेमाल करने से अधिक लाभ होता है। इसके लिए पौधे की पूरी पोटाश खुराक में से 50 प्रतिशत बुआई से पहले, 25 प्रतिशत अंखुए निकलते समय पहली टाप-ड्रेसिंग के रूप में तथा बाकी 25 प्रतिशत बालियां निकलने के समय दूसरी टॉप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए। उर्वरक की मात्रा मिट्टी, जलवायु व क्षेत्र के आधार पर बदल सकती है।

उपज बढ़ाने के गुर- क्षेत्र एवं जलवायु के अनुसार उपयुक्त किस्म को चुनें। बुवाई के लिए उपचारित एवं प्रमाणित बीज प्रयोग करें। प्रत्येक किस्म को उसके उपयुक्त समय पर बोयें। उर्वरक को उचित मात्रा में अलंगाना तरकीब से प्रयोग करें। खरपतवारों को नियंत्रण में रखें। सिंचाई उपयुक्त मात्रा में एवं उचित समय पर दें। बीमारियों/कीटों की रोकथाम के लिए अनुमानित तरीकों को अपनायें।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।