नाइजर फसल की वैज्ञानिक खेती      Publish Date : 18/10/2025

                       नाइजर फसल की वैज्ञानिक खेती

                                                                                                                                                                 प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

नाइजर एक  परपरागण वाली फसल के साथ गुणसूत्र की संख्या 2N = 30 होता है। इसे विभिन्न प्रदेशों में अनेकों नामों से जाना जाता है जैसे- रामतिल, जगनी ओट, जटांगी (हिंदी) रामताल (गुजराती), या खुरासानी (मराठी), उहेचल्लू (कन्नड़), पायेल्लु (तमिल), वेरिनुवुलु (तेलुगु), अलशी (उड़िया), सरगुजा (बंगाली), रामतिल (पंजाबी) और सोरगुजा (असमिया) आदि के नाम से भी जाना जाता है।

नाइजर को हालांकि एक छोटी तिलहन फसल माना जाता है। लेकिन इस बीज में 18 से 24 प्रतिशत तम प्रोटीन के साथ 32 से 40 प्रतिशत गुणवत्ता वाले तेल की मात्रा पाई जाती है। नाइजर तेल धीरे-धीरे सूखता है, इसका उपयोग भोजन, पेंट, साबुन और एक प्रकाशक के रूप में किया जाता है। इसका उपयोग जैतून के तेल के विकल्प के रूप में किया जाता है।

इसे रेपसीड, तिल और अलसी के तेल के साथ मिलाया जा सकता है। इसके तेल का उपयोग खाना पकाने में किया जाता है। बीज से प्राप्त तेल का उपयोग जलने के उपचार और खुजली के उपचार में किया जाता है। बीज को भूनकर खाया जाता है और मसाले के रूप में उपयोग किया जाता है।

                                                              

तेल निष्कर्षण से प्राप्त प्रेस केक का उपयोग पशुओं के चारे के लिए किया जाता है। नाइजर तेल में अच्छी गुणवत्ता होती है और इसमें 70 प्रतिशत तक असंतृप्त फैटी एसिड होते हैं जो विषाक्त पदार्थों से मुक्त होते हैं। इसका तेल स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है।

नाइजर फसल पर बीमारियों तथा कीटों के प्रति अच्छी सहनशीलता के साथ-साथ इसे पहाड़ी क्षेत्रों, कम उपजाऊ, विभिन्न प्रकार की मिट्टी पर उगाया जा सकता है। इसके अलावा यह आदिवासी कृषि और अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा है।

इस फसल को आकस्मिक फसल या वर्षा आधारित स्थितियों के लिए आदर्श बनाती है। देश के नाइजर उत्पादन में मुख्य रूप से योगदान देने वाले राज्य मध्य प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ हैं।

इसके अलावा इस फसल की खेती कुछ हद तक आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और पूर्वाेत्तर पहाड़ी क्षेत्र के अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में भी की जाती है।

भूमि का चयन एवं खेतों की तैयारी

इसकी खेती किसी भी भूमि पर किया जा सकता है जो अच्छी जल निकास वाली हो। भूमि की तैयारी दो गहरी जुताई के बाद हैरोइंग और प्लांकिंग करनी चाहिए ताकि मिट्टी भुएभुरी हो जाय।

बुआई का समय एवं दूरीः

नाइजर मुख्य रूप से खरीफ में उगाया जाता है, लेकिन इसे सीमित सिंचाई के साथ रबी और देर से खरीफ मौसमों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

हालांकि यह एक सर्दियों को पसंद करने वाली फसल है और सुरक्षात्मक सिंचाई के साथ रबी मौसम में अच्छी उपज प्राप्त होती है। विशेष रूप से वर्षा आधारित फसल होने के कारण, नाइजर मानसून की शुरुआत के साथ उगाया जाता है। खरीफ मौसम में इसकी बुवाई का समय जुलाई के मध्य से अगस्त के शुरू तक और रबी फसल के लिए सितंबर है।

बीज दरः

बीज दर बुवाई की विधि पर निर्भर करती है। आम तौर पर एकल फसल के लिए 5 किलोग्राम/हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। अंतर फसल प्रणाली के तहत, बीज दर अंतर फसल की दूरी और पंक्ति अनुपात पर निर्भर करती है।

बीज उपचारः

फसल को बीज और मिट्टी जनित रोगों से बचाने के लिए, बुवाई से पहले बीज को कार्बेन्डेंज़िम 5 ग्राम/किग्रा ट्राइकोडर्मा विरिडी 10 ग्राम/किग्रा बीज से उपचारित करना चाहिए। फॉस्फोरस सॉल्युबलाइजिंग बैक्टीरिया (पी एस बी)/ एज़ोटोबैक्टर /एज़ोस्पिरिलम 10 ग्राम/किग्रा बीज से उपचारित करने से बीज की उपज अधिक होती है।

खाद एवं उर्वरको का प्रबंधनः

अधिक उपज प्राप्त करने के लिए 20 किलोग्राम नत्रजन, 20 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से डालना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा तथा फॉस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई के समय डालनी चाहिए। बची हुए नत्रजन की आधी मात्रा को रोपाई के 30  दिन बाद उपरिवेशन के रूप में व्यवहार में लाना चाहिए।

सिंचाईः

नाइजर मुखतः वर्षा कालीन ऋतू में लगाया जाता है इसीलिए सिचांई की आवश्यकता कम पड़ती लेकिन जब पौधे सूखने लगे तो सिचांई अवश्य करना चाहिए।

पतला करनाः

नाइजर के बुवाई के दो सप्ताह बाद या जब पौधे 8-10 सेमी की ऊंचाई प्राप्त करते हैं, तो अतिरिक्त पौधों को उखाड़ देना चाहिए।

निराई-गुड़ाईः

पहली निराई बुवाई के 15-20 दिन बाद की जाती है और साथ ही साथ पतलापन भी किया जाता है। यदि खरपतवार बहुत अधिक हो तो नाइट्रोजन युक्त उर्वरक के टॉप ड्रेसिंग से पहले दूसरी निराई पहली निराई के 15 दिन बाद दोहराई चाहिए। कस्कुटा से संक्रमित नाइजर बीज को 10 प्रतिशत नमकीन घोल (टेबल सॉल्ट) से उपचारित करके कस्कुटा खरपतवार से निजात मिल सकती है।

समन्वित कीट एवं रोग नियंन्त्रणः

                                                            

नाइजर के फसल में बहुत से कीट एवं व्याधि का प्रकोप होता है जो निम्नलिखित हैं:

नाइजर कैटरपिलरः यह कीट हरी अवस्था में पौधों की पतियों को खाते हैं जिससे पौधे की पतियाँ झड़ जाती है। इस रोग की रोकथाम के लिए ट्राईजोफ़ॉस 40 ई.सी. की 1 मिली दवा अथवा क़ुइनल्फ़ोस 25 ई.सी. की 1.5 मिली दवा  प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर कम से कम दो बार छिडकाव करना चाहिए।

भुआ पिलुः इस पिलु तथा उसके अंडे को एकत्र कर नष्ट कर देना चाहिए अथवा असेफेट 75 प्रतिशत एस पी नमक दवा की 1.5 ग्रा० मात्रा का प्रति लीटर पानी दर से घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

नाइजर कैप्सूल फ्लाईः इसकी रोकथाम के लिए क़ुइनल्फ़ोस 25 ई.सी. की 1.5 मिली दवा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

रोग उपचार

अल्टरनेरिया लीफ स्पॉटः इस रोग की रोकथाम के लिए सबसे पहले बीज को उपचारित करना चाहिए, यदि रोग लग जाता है तो डाईथेंन एम- 45(0.25) + बैवैसटीन (0.1 प्रतिशत) नामक दवा को 15 दिनों के अन्तराल पर प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

पौड्रीमिल्दीवः यह रोग पतियों पर उजले रंग की तरह फैला होते हैं। इस रोग की रोकथाम के लिए सल्फर धूल की (0.2 प्रतिशत) या केराथेंन (0.1 प्रतिशत) दवा को प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

कटाई एवं मढ़ाईः

कटाई करने के बाद एक सप्ताह तक फसल का ढेर लगाकर छोड़ देना चाहिए, उसके बाद डंडों से पीटकर फसल की मढ़ाई करें तथा मढ़ाई से निकले दानों को विनोइंग द्वारा साफ किया जाना चाहिए। उसके बाद दानों की सुखाई जब तक करें जब तक कि दानों में नमी की मात्रा 8 प्रतिशत तक नहीं रह जाय। फिर इन दानों को ठीक से भंडारित किया जाना चाहिए।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।