
अच्छी पैदावार हेतु गन्ने की फसल में सस्य प्रबंधन Publish Date : 17/10/2025
अच्छी पैदावार हेतु गन्ने की फसल में सस्य प्रबंधन
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी
गन्ना भारत की महत्वपूर्ण औद्योगिक और नगदी फसलों में से एक है। गन्ना भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। गन्ना उत्पादन करने वाले क्षेत्रों में गामीण अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से गन्ने की फसल एवं चीनी या उससे संबद्ध उद्योग से जुड़ी हुई है।
देश की बढ़ती जनसंख्या के फलस्वरूप वर्ष 2030 तक शर्करा पदार्थों की प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष आवश्यकता 35 किग्रा0 तक पहुँच जाने का अनुमान है, जिसमें 20 किग्रा0 चीनी व 15 किग्रा0 गुड़ एवं खण्डसारी सम्मिलित है। अतः इनकी पूर्ति के लिए अधिकतम गन्ना उत्पादन तथा चीनी परता प्राप्त करने की गहन आवश्यकता है।
गन्ना की फसल के लिए उपयुक्त मौसम
गन्ना एक उष्णकटिबन्धीय पौधा है। लगभग 28-32 डिग्री से0 तापमान पर गन्ने की वृद्धि अच्छी होती है।
खेत की तैयारी
गन्ने की खेती करने के लिए खेत की 2-3 बार गहरी जुताई करनी चाहिए। उसके बाद 1 से 2 बार पाटा लगाना चाहिए।
गन्ने की बुआई का समयः
गन्ना की फसल 10 से 18 महीने की होती है और इसकी बुआई का समय मौसम के द्वारा निर्धारित होता है। उपोष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों मंे गन्ने की बुआई का समय शरदकाल (अक्टूबर), बसन्त काल, (फरवरी-मार्च) एवं ग्रीष्म काल (अप्रैल से मई) के महीने का होता है।
गन्ने की बीज दरः
बीज दर लगभग 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है।
बीज उपचारः
बुआई से पहले गन्ने के टुकड़ों को कार्बेन्डाजिम या बाविस्टीन के घोल में लगभग 10 मिनट तक 1 ग्रा0 प्रति लीटर पानी की दर से उपचारित करना चाहिए।
पंक्ति से पंक्ति की दूरीः
गन्ने की बुआई आमतौर पर 90 से0 मी0 की दूरी पर की जाती है। आजकल कुछ गन्ना किसान पंक्ति से पंक्ति की दूरी 120 से0 मी0 भी रखने लगे है।
फसल की बुवाई विधियॉं:
किसी भी विशेष बुवाई विधि का उद्देश्य मिल योग्य गन्ने की वांछित संख्या तथा अधिक लम्बाई, मोटाई व वजन प्राप्त करना होता है। गन्ने की उत्पादकता में मिल योग्य गन्ने की संख्या का योगदान 40 प्रतिशत तक होता है जबकि लम्बाई, मोटाई और इसका वजन का क्रमशः 27, 3 व 30 प्रतिशत योगदान रहता है। इस प्रकार अगर 100 टन प्रति हेक्टेयर गन्ने का उत्पादन लेना है तो मिल योग्य गन्नों की संख्या 1 लाख व हर गन्ने का वजन 1 किलोग्राम होना चाहिए।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हमारे देश में गन्ना बोने की विभिन्न विधियॉ प्रचलन में है, जिसमें समतल विधि सबसे अधिक प्रयोग की जाती है। गन्ने की उपज एवं चीनी परता बढ़ाने के लिए बुआई की कुछ नवीनतम विधियां भी विकसित की गई हैं। गन्ने की बुआई की नई विधियों में ‘‘रिंग-पिटष्का विकास विधि वांछित दोनों उद्देश्यों के लिए सर्वाधिक हुआ है। रिंग-पिट विधि द्वारा गन्ना लगाने से मिल योग्य गन्ना ’मूल प्ररोह’ से ही बनते हैं जो कि लम्बे, मोटे व भारी होते है एवं इनका विकास भी एक जैसा ही होता है जिससे चीनी परता में बढ़ोत्तरी होती है।
नाली विधि में गन्ने के जमाव के उपरान्त फसल के क्रमिक बढ़वार के साथ मेंड़ो की मिट्टी नाली में पौधे की जड़ पर गिराते जाते हैं जिससे देर से निकलने वाली अवांछित कल्लों की संख्या कम होती है और मुख्यरूप से ’मूल प्ररोह’ ही विकसित होकर मिल योग्य गन्ना बनते हैं जिससे चीनी परता में बढ़ोत्तरी होती है।
फर्ब विधि में लगभग 50-60 से0 मी0 का उत्थित क्यारी बनाई जाती है एवं गेहूँ की तीन पंक्तियों को 17 से0 मी0 की दूरी पर नवम्बर या दिसम्बर माह के प्रथम सप्ताह में बुआई करते हैं। गन्ने की बुआई भी नवम्बर महीने में 80 से0 मी0 की दूरी पर स्थित नालियों में गेहूँ की बुआई के तुरन्त बाद की जाती है। इस विधि में लगभग 25 से 30 प्रतिशत पानी की बचत होती है।
गन्ने की उन्नत किस्में:
को0 0238, को0 लख0 94184, को0 पीवि0 08212, को0 पू0 09437, को0 118, को0 जे0 85, को0 89003, को0 एस0 767, को0 एच0 119, बी0 ओ0 91, बी0 ओ0 110, बी0 ओ0 153, बी0ओ0 154, को0पू0 9301, को0 पू0 16437, बी0 ओ0 137, राजेन्द्र गन्ना 1 एवं बी0 ओ0 139 इत्यादि गन्ने की उन्नत किस्में हैं।
गन्ने में पोषक तत्व प्रबन्धनः
गन्ने की फसल काफी मात्रा में पोषक तत्वों का दोहन करती है। अतः गन्ने की उपज व गुणवत्ता दोनो बनाये रखने के लिए विभिन्न पोषक तत्वों का उचित मात्रा व अनुपात में फसल को देना अति आवश्यक है। उत्तर भारत में किसान भाई सामान्यतः नत्रजन, फॉस्फोरस एवं पोटेशियम 150:60:60 या 150:85:60 किग्रा/हे0 के अनुपात में देते हैं।
संस्तुत पोषक तत्वों में से फॉस्फोरस एवं पोटेशियम की पूरी मात्रा एवं नत्रजन की एक तिहाई मात्रा बुआई के समय ही कूड़ में डाल देते हैं।
नत्रजन की शेष मात्रा कल्ले निकलते समय एवं फिर उसके बाद एक माह के अंतराल पर खेत में पौधों की जड़ के पास देते हैं। नत्रजन के साथ-साथ मृदा की जॉंच के आधार पर फॉस्फोरस एवं पोटेशियम का प्रयोग अवश्य किया जाना चाहिए। फॉस्फोरस पौधों में अधिक नत्रजन के कुप्रभाव को संतुलित करता है।
सिंचाई प्रबन्धनः
एक कि.ग्रा. चीनी बनाने के लिए लगभग 1000 से 2000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। अच्छी चीनी परता व उत्पादन के लिये 6-7 सिंचाइयाँ (2 सिंचाई वर्षा उपरान्त) करना लाभप्रद पाया गया है। पानी की सबसे अधिक आवश्यकता कल्ले निकलने एवं बढ़वार के समय होती है।
सीमित सिंचाई साधनों की स्थिति में स्किप फरो एक नाली छोड़कर विधि द्वारा सिंचाई करने से 30 प्रतिशत पानी की बचत होती है एवं गन्ने की पैदावार 10-15 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। बूंद-बूंद (ड्रिप) सिंचाई से पानी की बचत के साथ-साथ गन्ने की पैदावार 20-30 प्रतिशत और चीनी परता 0.2-0.6 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
गन्ने में खरपतवार नियंत्रण
गन्ना फसल में पंक्तियों की अधिक दूरी, 3-4 माह तक कम बढ़वार एवं अधिक खाद का उपयोग होने के कारण अक्सर खरपतवारों का आक्रमण होता है।
गन्ने में अनियंत्रित खरपतवार 40 प्रतिशत सिंचाई जल व 40 प्रतिशत नत्रजन का शोषण करके गन्ने की उपज में 40 प्रतिशत कमी कर देती है एवं गन्ना के साथ प्रकाश, स्थान एवं वायु के लिए प्रतिस्पर्धा करते है, जिसके कारण गन्ने की पैदावार मे कमी आती है। इसके अलावा खरपतवार के प्रकोप से गन्ने में रेशे की मात्रा बढ़ जाती है व रस की गुणवत्ता भी घटती है।
गन्ने की उपज एवं चीनी परता बढ़ाने हेतु खरपतवार नियंत्रण करना अत्यंत आवश्यक है। गन्ने की सिंचाई के बाद पहले बथुआ, मोथा, नूणिया व चौलाई आदि की संख्या बढ़ जाती है, इसके बाद बरसात का मौसम होते ही घास खरपतवार जैसे कि दूब, मकड़ा इत्यादि उगने शुरू हो जाते हैं।
खरपतवार नियंत्रण का समय सही फसल की विजाई के समय पर निर्भर करता है। बसंत कालीन फसल में खरपतवार नियंत्रण फसल की बिजाई के क्रमशः 60 दिन बाद व फसल में 120 दिन तक करना चाहिए।
यदि इस दौरान गन्ने की फसल को खरपतवारों से न बचाया जाये तो बाद की अवधि मे किये गये सभी प्रयास व्यर्थ जाते हैं। गन्ने फसल में खरपतवारों का नियंत्रण रासायनिक पर्दाथों के द्वारा किया जाता है (सारिणी-1)।
सारिणी-1: गन्ने में खरपतवार नियंत्रण
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खरपतवारनाशी |
दर (सक्रिय तत्व कि0 ग्रा0 या लीटर/हे0) |
व्यवहार का समय
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ग्लाइफोसेट (राउण्ड अप) + 2% अमोनियम सल्फेट |
2.0 |
बुआई के पहले |
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ऑक्सीफ्लोरफेन (गोल) |
0.75 |
बुआई के तीन दिन बाद |
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एट्राजिन (आटैक्स) |
2.0-3.0 |
बुआई से 2-3 दिनों के अन्दर |
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मेट्रव्यूजिन (सेन्कॉर) |
1.5-2.0 |
बुआई से 2-3 दिनों के अन्दर |
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2,4 डी0 एस्टर |
0.5-1.25 |
बुआई के 55-60 दिनों बाद |
ईख में लगने वाले कीट
गन्ना उत्पादकों को कीटों के आपात, क्षति के लक्षण एवं उनके पहचान की जानकारी होना अति आवश्यक है। गन्ना की फसल अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक अवधि की होने के कारण कीटों के आक्रमण की सम्भावना भी बढ़ हो जाती है। सामान्यतः इस फसल को विभिन्न अवस्थाओं में एक दर्जन से भी अधिक कीटों का आक्रमण देखा गया है। ईख के हानिकारक कीटों को क्षति के आधार पर इन्हें तीन वर्गा में विभाजित किया गया है। प्रथम छिद्रक कीट, द्वितीय रसचूसक कीट एवं तृतीय भूमिगत कीट।
नियंत्रणः
परजीवी में टेलीनोमस जाति, ट्राइकोग्रामा किलोनिस, कोटेसिया प्लेवीपस, आइसोटिमा जवेन्सिम, स्टुरमियापसिम इनफरेन्स, स्टीनोव्रेकान जाति का छिद्रक कीट, एपीरीकेनिया मेलानोल्यका का पायरिला तथा फेरोएिकमनस हारनी का शक्ल कीट के नियंत्रण में विशेष योगदान है। बुवाई के 45 दिन बाद अण्ड परजीवी ट्रायकोग्रामा किलोनिस की 50,000 अण्डा 10 दिन के अन्तराल पर प्रति हे0 की दर से 4-6 बार खेत में छोडें। भूमिगत कीटों से बचाव के लिए खली एवं पलेवा के साथ निम्विसिडीन 0.5% या नीम केक 2 टन/हे0 का प्रयोग करें। दीमक एवं गड़ार के लिए व्यूभेरिया वेसियाना फफूंद 1×109 OFX/ML/2 से 3 कि.ग्रा./हे. की दर से उपयोग करना चाहिए। रसचुसक कीटों के नियंत्रण के लिए मेट्रीजियम लेकानी या मेटारीजियम एनीसोप्ली फफूंद 1×109 OFX/ML// 2 से 3 कि.ग्रा./हे. के दर से उपयोग करना चाहिए। जी.भी. विषाणु 1.5×1013 ओ.बी./हे. तीन से चार बार कल्ला छिद्रक के रोकथाम हेतु प्रयोग किया जा सकता है।
गन्ने को क्षति करने वाले प्रमुख रोग
भारतवर्ष में गन्ने की फसल में लगभग 100 से ज्यादा बीमारियाँ पाई गई हैं। कठिन मेहनत अधिक पूंजी लगाये जाने एवं उन्नत कृषि क्रियाओं के अपनाने के उपरांत भी अगर गन्ने फसल में रोगों का प्रकोप बढ़ जाता है तो करीब 15-20 प्रतिशत तक चीनी की मात्रा में कमी हो जाती है। अतः फसल को समय रहते रोगों से बचाना अनिवार्य हो जाता है, जिससे की अधिक से अधिक उपज एवं चीनी प्राप्त किया जा सके।
रोकथाम
मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का व्यवहार, नीम, करंज, अंडी या महुआ की खल्ली में से किसी एक खल्ली के 2.5 क्विंटल को चूर्ण कर लें तथा उसमें ट्राइकोडर्मा पाउडर जो एक जैव नियंत्रक है का 2.5 किलोग्राम अच्छी तरह मिला लें।
फिर उसमें हल्का पानी का फुहारा दे कर नम करके किसी छायादार जगह में 4 दिनों के लिए रख दें। खेत की अंतिम जुताई के समय इसे एक हेक्टेयर में मिलाकर जुताई कर पाटा लगा दें।
विषाणुजनित रोगों का प्रसार एक कीट लाही (एफिड) द्वारा होता है। इन रोगों के प्रसार को रोकने हेतु डाइमेथोएट 30 प्रतिशत ई. सी. का 1.5 मि. ली./लीटर जल या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रतिशत एस. एल. का 0.5 मि0 ली./लीटर जल के घोल का ईख फसल पर छिड़काव किया जाना चाहिए।
यदि ईख फसल पर पर्ण धब्बा, गलित शिखा तथा मध्य नाड़ी पर लालसर की उग्रता अधिक हो तो फसल पर कॉपर ऑक्सीक्लोराईड 50 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. का 3 ग्राम/लीटर जल या मैंकोजेब 75 प्रतिशत डब्ल्यू. पी. का 2.5 ग्राम/लीटर जल में घोल बनाकर फसल पर 15 दिन के अंतराल पर तीन छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के लिए 1 हेक्टेयर ईख फसल के लिए 1000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
फसल में मिट्टी चढ़ाना
गन्ने में मिट्टी चढ़ाना एक महत्वपूर्ण सस्य क्रिया है। मानसून शुरू होते ही मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जाता है। मिट्टी चढ़ाने से देर से निकलने वाले कल्लों की संख्या कम हो जाती है। खेत में खरपतवारों का नियंत्रण होता है तथा गन्ना गिरने से बच जाता है। इसके फलस्वरूप मूल प्ररोहों एवं प्राथमिक किल्लों से बनने वाले मिल योग्य गन्नों की संख्या अधिक होती है जिससे चीनी परता में बढ़ोत्तरी होती है।
गन्ने में सहफसली खेती
शरदकालीन गन्ना से बसंत कालीन गन्ने की अपेक्षा 10-15 प्रतिशत अधिक उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ 0.1 से 0.5 इकाई चीनी का परता भी बढ़ जाता है। परन्तु शरदकालीन गन्ने के अन्तर्गत क्षेत्रफल केवल 15-20 प्रतिशत तक ही सीमित है।
शरदकालीन गन्ने में अन्तः फसली खेती से ही इसका क्षेत्रफल बढ़ाया जा सकता है। शरदकालीन गन्ने के साथ आलू, चना, मसूर, राजमा, तोरी, गाजर, लहसून इत्यादि फसल ली जाती हैं एवं बसंत कालीन गन्ने के साथ मूंग दाल, उरद दाल एवं भिन्डी आदि की फसल ली जा सकती है।
इसके लिए अधिक आय एवं कम अवधि वाली फसलों को गन्ने के साथ अन्तः फसल के रूप में लगाकर मृदा की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादन लागत कम करने एवं उत्पादन पद्धति को टिकाऊ बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान सम्भव है।
कटाई प्रबन्धन
उपोष्ण क्षे़त्र में औसत चीनी की परता लगभग 8 से 9 प्रतिशत के मध्य होता है जो कि कम है। चीनी परता कम होने का एक मुख्य कारण उचित ढंग से गन्ने की कटाई का न होना भी है। अतः अधिक चीनी परता के लिये उपयुक्त कटाई क्रम का अपनाना अति आवश्यक है। अगात प्रभेद की कटनी 15 नवम्बर तथा मध्य पिछेती प्रभेदों की कटनी जनवरी के प्रथम सप्ताह से करनी चाहिए।
खूंटी प्रबंधन
राज्य में कुल गन्ना के क्षेत्रफल का लगभग 50 प्रतिशत क्षेत्र खूंटी फसल के अन्तर्गत आता है जबकि इसकी उत्पादकता मुरहन फसल की अपेक्षा काफी कम है। खूंटी फसल की उत्पादकता बढ़ाने हेतु निम्नलिखित तकनीकों की अनुशंसा की जाती है।
फसल एवं प्रभेद का चुनावः स्वस्थ मुरहन फसल जिसमें पर्याप्त पौधे हो तथा कल्ले प्रस्फूटन की अधिक क्षमता हो उसी प्रभेद का चयन करना चाहिए।
उपयुक्त समय पर मुरहन फसल की कटाईः जनवरी के अन्त से 15 मार्च तक काटी गई मुरहन फसल से अच्छी खूंटी फसल प्राप्त होती है।
खूंटी की छंटाई एवं मेड़ तोड़नाः मुरहन फसल की कटाई तेज धार वाले औजार से जमीन की सतह से लगभग 5-7 सें.मी. नीचे से करनी चाहिए। इससे कल्ले स्वस्थ तथा समान रुप से निकलते हैं। मेड़ों को तोड़कर खूंटी को बचाते हुए अच्छी तरह जुताई करने से पुरानी जड़ें कट जाती हैं तथा नयी जड़ों का विकास होता है।
मिट्टी एवं खूंटी उपचारः खूंटी तोड़ने के बाद 20 टन कम्पोस्ट या गंधकीय प्रेसमड समान रुप से छींटकर मिलाना चाहिए। खूंटी के कटे हुए भाग पर झरने या स्प्रेयर द्वारा वेभिस्टीन का 0.1 प्रतिशत (एक ग्राम) के घोल में प्रति लीटर पानी के साथ छिड़काव करने से आरम्भिक अवस्था में गन्ना रोगग्रस्त होने से बच जाते हैं। खूंटी सफाई के तीन सप्ताह बाद रसायनिक उर्वरक के व्यवहार के बाद 15 किलोग्राम फोरेट 10 g/h के दर से उपयोग करने से गन्ने को कीटों से सुरक्षा मिलती है।
खाली जगहों को भरनाः खूंटी फसल के लिए प्रति मीटर की दूरी में तीन झुड़ होना आवश्यक है। यदि झुड़ों की संख्या इससे कम हो तो खाली स्थानों में पौली बैग या बडचिप द्वारा विकसित पौधों से खाली स्थानों को भरना चाहिए।
सिंचाईः साधारणतया 3 सप्ताह के अन्तराल पर मानसून की बरसात के पहले तक सिंचाई करते रहना चाहिए। इस प्रकार कुल 4-5 सिंचाई करना आवश्यक है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
