
किसानों की आय को बढ़ाएगी शुष्क जमीन पर जौ की खेती Publish Date : 11/10/2025
किसानों की आय को बढ़ाएगी शुष्क जमीन पर जौ की खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेगर, डॉ0 निधि सिंह एवं गरिमा शर्मा
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के द्वारा राज्य में फसल की विविधिरण और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक नया मार्ग प्रशस्त है। पुजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने जौ की एक नई किस्म ‘‘पीएल 942’’ का विकास किया है जो न केवल कम पानी और खाद में अच्छी पैदावार देती है, बल्कि शुष्क और नमक वाली जमीनों पर भी आसानी से उगाई जा सकती है।
नव-विकसित यह किस्म रोगों के प्रति प्रतिरोधी होने के साथ ही किसानों को धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलने का लाभकारी विकल्प भी प्रदान करती है। पीएयू के अनुसार जौ की नई किस्म पीएल-942 में विशेष रूप से ऐसे किसानों के लिए उपयोगी साबित होगी जो कम सिंचाई संसाधनों या कमजोर मिट्टी वाले क्षेत्रों में खेती करते हैं।

यह नई किस्म पीएयू के प्लांट ब्रीडिंग और जेनेटिक विभाग के व्हीट सेक्शन की जौ ब्रीडर डॉ0 सिमरजीत कौर ने अपनी टीम के साथ विकसित किया है। जौ की यह किस्म ड्राई और खारी जमीनों पर भी सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। यह किस्म पंजाब के कृषि परिदृश्य में कम लागत और अधिक लाभ देने वाली खेती की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
नव-विकसित जौ की किस्म ‘‘पीएल-942’’ का औसत उत्पादनं 20.1 क्विंटल प्रति एकड़ की दर तक प्राप्त हुआ है, जो कि राज्य की मौजूदा जौ की किस्मों से अधिक है। जौ की यह किस्म 146 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। जौ की इस किस्म में पीली कुंगी, झुलसा रोग और बंद कंगियारी जैसे रोगों के प्रति मॉडरेट रेजिस्टेंस पाई गई है और इससे फसल गुणवत्ता प्रभावित नहीं होती है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर ‘‘पीएल-942’’ जैसी किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाया गया, तो राज्य में जौ के उत्पादन और किसानों की आय दोनों में ही वृद्धि हो सकेगी।
धान गेहूं फसल चक्र से निकलने का एक नया तरीका
आमतौर पर देखा गया है कि अधिकतर किसान धान-गेहूं फसल चक्र को ही अपनाते हैं। लेकिन यदि आपको जौ का उत्पादन करना है तो आप धान और जौ की खेती का फसल चक्र अपना सकते हैं। जौ की ‘‘पीएल-942’’ जैसी किस्म किसानों के लिए एक वैकल्पिक फसलों की नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। इससे न केवल जल संरक्षण संभव होगा बल्कि कृषि विविधीकरण को भी बल मिलेगा। किसान जौ कि इस प्रजाति को अपनाते हैं तो उन्हें कम लागत में अच्छा मुनाफा प्राप्त होगा।

जौ की नई किस्म ‘‘पीएल-942’’ माल्ट इंडस्ट्री के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। माल्ट का उपयोग बियर और व्हिस्की आदि को बनाने में भी किया जाता है। इस प्रक्रिया में जौ को पानी में भिगोकर उसके अंकुरित हो जाने के बाद गर्म हवा के द्वारा सुखाया जाता है। इसमें हॉट वॉटर एक्सट्रैक्ट 75.4 प्रतिशत और बीटा ग्लूकोन फॉर 4.8 प्रतिशत है जो इस इस किस्म को माल्ट के उत्पादन के लिए उत्तम बनती है। उत्तर भारत में कार्य कर रही माल्ट कंपनियां इस प्रजाति को अब भविष्य में कांट्रेक्ट फार्मिंग के माध्यम से किसानों से सीधे जुड़ सकती है और उत्पादन प्रारंभ कर सकती है, लेकिन धीरे-धीरे जौ की कीमत भी किसानों को अब अच्छी मिलने लगी है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
