बारानी खेती का प्रबन्धनः उत्पादकता एवं स्थायित्व के लिए एक उत्तम विकल्प      Publish Date : 05/10/2025

बारानी खेती का प्रबन्धनः उत्पादकता एवं स्थायित्व के लिए एक उत्तम विकल्प

                                                                                                                                                  प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

विश्व की लगभग 10.5 अरब जनसंख्या की भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए हमें वर्ष 2050 तक कम से कम भूमि से अधिक से अधिक उपज प्राप्त करने के प्रयास करने होंगे। क्योंकि कृषि क्षेत्र में अधिक से अधिक भूमि का उपयोग किया जा चुका है और अब आगे कृषि क्षेत्रफल को बहुत अधिक बढ़ाना सम्भव ही नहीं है, लेकिन अब प्रश्न यह है कि क्या मिट्टी, पानी एवं हवा को प्रदूषित किये बिना, पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित, सामाजिक रूप से मान्य तथा आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक तरीकों से लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।

विश्व के कुल भू-भाग का लगभग 40-42 प्रतिशत क्षेत्र शुष्क या अर्द्धशुष्क है। इस क्षेत्र में लगभग 70-75 करोड़ लोग निवास करते हैं। विश्व के कुल शुष्क क्षेत्रों का लगभग 60 प्रतिशत भाग विकासशील देशों के हिस्से में आता है। विश्व का 75-90 प्रतिशत भू-भाग कम वर्षा वाले क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। निकट पूर्व, अफ्रीका एवं एशिया के 20 से अधिक देश इसी क्षेत्र में स्थित है।

संसार में पैदा होने वाली अरहर का लगभग 95 प्रतिशत, ज्वार का 90 प्रतिशत, बाजरे का 80 प्रतिशत और मूंगफली का 50 प्रतिशत भाग इसी क्षेत्र के किसान पैदा करते हैं। आने वाले वर्षों में विश्व की बढ़ती जनसंख्या की खाद्य सम्बन्धी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए अधिक से अधिक अन्न इसी क्षेत्र से आयेगा तथा यह क्षेत्र ‘भूरी से हरी क्रांति’ को भी जन्म देगा। भारत में 60-65 प्रतिशत खेती वर्षा पर निर्भर है। वर्षा आधारित खेती को ही बारानी खेती कहते हैं। कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 44 प्रतिशत भाग इन्हीं क्षेत्रों से आता है और देश की कुल आबादी के 40 प्रतिशत लोगों की आवश्यकता इसी क्षेत्र से पूरी होती है। हालांकि वर्षा पर निर्भर क्षेत्र भी एक समान नहीं है। वर्षा जल तथा अन्य संसाधनों की उपलब्धता की दृष्टि से इन क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से क्षेत्रीय असमानतायें पायी जाती है।

                                                             

देश का लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्र (10.9 करोड़ हेक्टेयर) सूखे की आशंका वाला है, जहाँ 0-750 मि.मि. तक वर्षा होती है जबकि 42 प्रतिशत क्षेत्रफल पर वर्षा 750-1150 मि.मि., 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर 1150-2000 मि.मि. वर्षा होती है तथा 8 प्रतिशत क्षेत्रफल पर 2000 मि.मि. से अधिक वर्षा होती है। देश के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी की भारी कमी के कारण खेती के लिए सिंचाई की स्थिति भरोसेमन्द नहीं है। इसके अतिरिक्त यहाँ पीने के योग्य पानी की भी बहुत अधिक कमी बनी रहती है, क्योंकि पर्याप्त वर्षा न होने के कारण भूमिजल का स्तर बहुत नीचे एवं खारा होता है जो कि पशुओं एवं मनुष्यों दोनों के स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होता है।

साधारणतया देश में वार्षिक औसत वर्षा लगभग 1200 मि. मि. है तथा वर्ष में होने वाली कुल वर्षा का 75-90 प्रतिशत हिस्सा जून से सितम्बर के समय दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के सक्रिय होने से होता है। वर्षा में अत्यधिक भिन्नता होने के कारण एक और शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में सूखे से फसलें प्रभावित होती हैं, तो दूसरी ओर अधिक वर्षा होने के कारण मिट्टी के कटाव, बाढ़ इत्यादि के चलते भी फसलें बहुत अधिक प्रभावित होती है।

स्थायित्व की धारणा

अन्तर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान के सन्दर्भ में गठित सलाहकार समिति (सी.जी.आई.ए. आर.) के अनुसार ‘‘स्थाई कृषि का अर्थ है, पर्यावरण की गुणवत्ता बनाये रखने या बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रयासों के साथ-साथ बदलती हुई मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधनों का सफल प्रबंध करना।’’ इसका मुख्य लक्ष्य ऐसी दीर्घकालीन कृषि प्रक्रियाओं का विकास करना है जो उत्पादक एवं लाभप्रद हों, जिनसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके, पर्यावरण सुरक्षित रहे और कृषि उत्पादों की गुणवत्ता भी बनी रहे तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी यह लाभप्रद हों।

इन सभी लक्ष्यों को प्राप्त करने का उपाय है कम लागत वाली ऐसी विधियों और कुशल प्रबन्धन की व्यवस्था करना जिनसे प्रबंधन में दक्षता आये और उत्पादन में काम आने वाले आंतरिक संसाधनों (अर्थात कृषि संसाधनों) का उपयोग हो सके। इस प्रकार हम पशुधन के उत्पादन एवं फसल की पैदावार को टिकाऊ और स्वीकार्य स्तर पर ला सकते हैं।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।