सिंचित गेहूँ उन्नत उत्पादन तकनीक      Publish Date : 03/10/2025

                    सिंचित गेहूँ उन्नत उत्पादन तकनीक

                                                                                                                                                         प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी  

हमारे देश मे गेहूँ को विभिन्न प्रकार को मुदाओं में उगाया जाता है, परन्तु चिकनी दोमट या दोमट मिट्टी जो कि उच्च जल धारण क्षमता वाली एवं उदासीन होती है, इस प्रकार की मिट्टी गेहूं के लिए सर्वाेत्तम मानी जाती है।

भूमि का तैयारी- सिंचित क्षेत्रों में मिट्टी की प्रकृति के अनुसार 2-3 बार खेत की जुताई हल एवं कल्टीवेटर से करके मिट्टी को भुरभुरा बना लेना चाहिए। खेत में डेले, खरपतवार एवं पिछली फसल के अवशेष आदि को नहीं रहने देना चाहिए। दीमक एवं फफूंद आदि से बीज को बचाने के लिए, एल्ड्रिन 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के पहले खेत में अच्छी तरह बिखेर कर मिला लेना चाहिये।

गेहूँ की उन्नत किस्में- सिंचित क्षेत्रों के लिए पिसी किस्मों में डब्ल्यू, एच. 147, एच.डी. 2236, एच.डी. 267, मंगला, जी. डब्ल्यू, 190, कंचन और जी.डब्ल्यू. 273 आदि सामयिक बोनी के लिए उपयुक्त किस्में है, जबकि कठिया किस्मों में राज 1555, एच.आई. 8381 एवं एच.आई. 8498 आदि प्रमुख किस्में है। सिंचित क्षेत्रों में पिछेती बुवाई के लिए जी.डब्ल्यू. 173, डी.एल. 788-2, लोक-1, एच डी. 2402, एच.डी. 2285, स्वाति और सोनालिका आदि प्रमुख किस्में है।

सिंचाई- चार सिंचाई की उपलब्धता में प्रथम सिंचाई किरीह जड़ बनने की अवस्था में, द्वितीय सिंचाई कल्ले फूटने की अवस्था में, तृतीय गभोट बनने की अवस्था में तथा चतुर्थ सिंचाई दानों के दूध वाली अवस्था में करना चाहिए।

पांच सिंचाई की उपलब्धता में प्रथम सिंचाई किरीह जड़ बनने की अवस्था में, द्वितीय कल्ले फूटने की पूर्ण अवस्था में, तृतीय तनों में गांठ निर्माण की अंतिम अवस्था में, चौथी फूल बनने के समय और पांचवीं तथा अंतिम सिंचाई दानों में दूध की अवस्था में करना उचित रहता है। छह सिंचाई की उपलब्धता में प्रथम सिंचाई किरोह जड़ों के निर्माण के समय, द्वितीय कल्ले फूटने की पूर्ण अवस्था में, तृतीय तनों में गांठें बनने की अंतिम अवस्था में, चतुर्थ फूल बनने की अवस्था में, पांचवीं दाने में दूध की अवस्था में तथा छठवीं सिंचाई दाने भरने की अवस्था में करना उचित है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार- सामान्य अवस्था में गेहूँ के लिए 100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की आवश्यकता होती है। सिंचित पिछेती एवं बारानी दशा में बीज की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती हैं। बीज की अंकुरण क्षमता 85 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिये। गेहूं की फसल को विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए थायरम 2 ग्राम + 1 ग्राम बाविस्टीन से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए। तत्पश्चात् पोषक तत्व उपलब्धता को बढ़ाने के लिए प्रति 40 किलोग्राम बीज को एक-एक पैकेट एजोटोबेक्टर व पी.एस.वी. कल्चर से भी उपचारित करना चाहिए।

सिंचित एवं सामयिक गेहूँ की बुवाई के लिए कतारों की दूरी 20-25 सेमी. रखें, जबकि पिछेती बुवाई में 15-18 सेमी. की दूरी उपयुक्त होती है।

पोषक तत्व प्रबंधन- गेहूँ की अगेती सिंचित बुवाई में नत्रजन 80-120 किलोग्राम, स्फुर 40-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देनी चाहिए। सिंचित पछेती बुवाई में नत्रजन 60-80 किलोग्राम, फास्फोरस 30-40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से देना उचित रहता है। गेहूँ में पोटाश की मात्रा मिट्टी परीक्षण के अनुसार देनी चाहिए। सिंचित दशा में नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर एवं पोटाश की संपूर्ण मात्रा बुवाई के पहले देना चाहिए तथा नत्रजन की शेष मात्रा प्रथम सिंचाई के तुरंत बाद, जब खेत हल चलने लायक हो जाये तब देनी चाहिए।

प्रति 3 साल में एक बार 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट या 5 टन कम्पोस्ट खाद या 2-3 टन केचुआ खाद प्रति हेक्टेयर देने से भी भूमि की उत्पादक एवं उर्वरा शक्ति बनी रहती है।

खरपतवार नियंत्रण- गेहूँ के खरपतवारों में गेहूँ का मामा, बथुआ और हिरनखुरी आदि प्रमुख खरपतवार हैं। इनके नियंत्रण के लिए गेहूँ की बुवाई के 20-25 दिन बाद हाथ से या हैण्ड हो से निंदाई करा सकते हैं। यदि रसायन का प्रयोग आवश्यक हो तो, चिरैया, बाजरा एवं अन्य संकरी पत्ती वाली खरपतवारों के नियंत्रण के लिए आइसोप्रोट्यूरान का उपयोग 1.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई करने के 30-35 दिनों बाद करें।

                                                             

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए 2. 4 डी 0.5 किलोग्राम सक्रिय तत्व या मेट सल्फ्यूरान मिथाइल 6 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 30-35 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए। चौड़ी एवं संकरी पत्ती दोनों खरपतवारों के एक साथ नियंत्रण के लिए सल्फोसल्फ्यूरान 25 ग्राम सक्रिय तत्व या सेंकर नामक दवाई को प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के दवाई का प्रयोग 250 ग्राम प्रति 30-35 दिन बाद करें। नींदानाशकों की बताई गई मात्रा प्रति हेक्टेयर के लिए 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।

रोग नियंत्रण- गेहूँ में गेरुआ, पर्ण ब्लाइट, कंडवा और करनाल वंट आदि प्रमुख रोग हैं। इन रोगों से बचाव के लिए बुवाई पूर्व बीजोपचार आवश्यक रूप से करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोग प्रतिरोधक जातियों के उपयोग को ही प्रदाथमिकता दें। गेरुआ या पर्ण ब्लाइट रोग के आगमन पर डायथेन एम-45 या जिनेब का 0.25 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना उचित रहता है और यदि आवश्यक हो तो 15 दिन के अंतर पर उपरोक्त छिड़काव दोहराया जाना चाहिए।

कीट नियंत्रण- गेहूँ में दीमक, तना छेदक मक्खी और बायर वर्म आदि का प्रकोप होने पर क्लोरोपायरीफास 20 ई.सी. का प्रयोग करना चाहिए। दीमक की उपस्थिति का 2-3 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से जड़ो फसल में छिड़काव करें। इसके साथ-साथ अन्य सभी कीटों के नियंत्रण के लिए 2-3 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से एण्डोसल्फान या क्विनालफास का स्प्रे करें।

उपज- यदि उन्नत उत्पादन तकनीक को अपनाया जाये तो सिंचित अवस्था में 45-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपन प्राप्त की जा सकती है।

सामान्य अवस्था में गेहूं के लिए 100-125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बीज की आवश्यकता होती है। सिंचित पिछेती एवं बारानी दशा में बीज की मात्रा 25 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती हैं। बीज की अंकुरण क्षमता 85 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिये। गेहूँ की फसल को विभिन्न बीमारियों से बचाने के लिए थायरम 2 ग्राम + 1 ग्राम बाविस्टीन से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना उचित रहता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।