सरसों की उन्नत खेती      Publish Date : 02/10/2025

                              सरसों की उन्नत खेती

                                                                                                                                                            प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

सरसों की खेती दोमट या बलुई दोमट भूमि जिसकी जल धारण क्षमता तथा जल निकास अच्छा हो उपयुक्त होती है। बुवाई से पूर्व खेत को 2-3 बार अच्छी तरह जुताई कर पाटा चलाकर मिट्टी को भुरभुरा कर लेना चाहिये।

बीज की मात्रा- 4-5 कि.ग्रा. बीज प्रति हेक्टर की दर से बुवाई हेतु प्रयोग करना चाहिये।

बीजोपचार- फफूंद जनक रोगों से बचाव हेतु कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिये।

                                 सरसों की किस्म

क्र0

किस्म का नाम

पकने की अवधि (दिन)

उपज क्विं./हे0

विशेषताएं

1

जे.एम.-1

125-127

20-21

बीज का रंग काला-भूरा असिंचित तथा सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त, फली चटकने के प्रति अवरोधक

2

जे.एम.-2

135-138

15-25

बीज का रंग काला-भूरा असिंचित तथा सिंचित क्षेत्र के लिए उपयुक्त, तेल प्रतिशत 40.0 सफेद गेरूआ रोग प्रतिरोधक

3

जे.एम.-3

130-135

20-25

बीज का रंग काला-भूरा, सफेद गेरूआ रोग प्रतिरोधक

4

पुसा बोल्ड

120-130

16-20

बड़ा दाना फली चटकने के प्रति अवरोधक, तेल प्रतिशत-43.2

5

वरूणा

115-125

15-20

बड़ा दाना तेल प्रतिशत-40.0

6

कांति

130-140

15-22

देर से बुवाई हेतु उपयुक्त, तेल प्रतिशत-40.0

7

रोहिणी

125-127

13-18

बड़ा दाना तेल प्रतिशत-40.0

बुवाई का समय- सितम्बर के द्वितीय सप्ताह से अक्टूबर के अंतिम सप्ताह तक सरसों की बुवाई कर देनी चाहिये। समय पर बुवाई करने से फसल रोग एवं कीटों से कम प्रभावित होती हैं।

बुवाई का तरीका- बुवाई देशी हल से सरता बांधकर कतारों में या सीड-ड्रील द्वारा करना चाहिये। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधों से पौधों कीदूरी 10 से.मी. एवं बीज 2-3 से.मी. की गहराई पर बुवाई करना चाहिये। अधिक गहराई पर बुवाई करने से बीज का अंकुरण कम होता है।

उर्वरक की मात्रा- सरसों की अच्छी पैदावार के लिए उर्वरकों की मात्रा मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर प्रयोग करना चाहिये। सामान्यतः असिंचित अवस्था में उर्वरक की मात्रा 30 कि.ग्रा. नत्रजन, 20 कि. ग्रा. स्फुर, 10 कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हे. तथा सिंचित अवस्था 60 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 कि.ग्रा. स्फुर, कि.ग्रा. पोटाश तथा 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हे. की दर से प्रयोग करना चाहिये।

                                                                   

असिंचित अवस्था में खाद की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा सिंचित अवस्था में नत्रजन की आधी मात्रा तथा स्फुर, पोटाश एवं सल्फर की पूरी मात्रा बुवाई के समय तथा शेष बची हुई नत्रजन की आधी मात्रा बुवाई के 25-30 दिनों के बाद प्रथम सिंचाई के समय देना चाहिए।

सिंचाई- सरसों की फसल में प्रथम सिंचाई बुवाई के 25-30 दिन बाद एवं दूसरी सिंचाई बुवाई के 55-60 दिन बाद करना चाहिये।

खरपतवार नियंत्रण- जिन क्षेत्रों में खरपतवार का अधिक प्रकोप होता हो वहां पर बुवाई के 25-30 दिन बाद निंदाई करना चाहिये या खरपतवार नाशक दवा पेण्डीमिथिलीन 0.75-1.00 कि.ग्रा./हे. सक्रिय तत्व (2.25-3 कि.ग्रा./हे. व्यापारिक मात्रा) का छिड़काव फसल की बुवाई के तुरंत बाद (फसल अंकुरण के पूर्व) भूमि पर छिड़काव करना चाहिये।

बुवाई के 30-35 दिनों पश्चात् खरपतवारों की अधिक समस्या होने पर क्युजालोफॉस दवा 50 ग्राम सक्रिय तत्व की मात्रा प्रति हे. की दर से पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिये।

प्रमुख कीट नियंत्रण

                                                                      

माहू- इस कीट से सरसों में सबसे अधिक हानि होती है। इसकी संख्या में वृद्धि नम एवं बदली वाले मौसम में अधिक होती है। इस कीट के नियंत्रण हेतु डायमेथोएट 30 ई.सी. 1.5-2 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

आरा मक्खीयह प्रारम्भिक अवस्था में फसल की पत्तियों के किनारे खाकर नुकसान पहुंचाती हैं। इस कीट के लार्वा की पहचान यह है कि इसे स्पर्श करने पर शीघ्र ही अपने शरीर की क्वाइल (रिंग) बना लेता हैं। इस कीट के नियंत्रण हेतु क्विजालोफॉस 36 ई.सी. 2 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी की दर से पौधों पर छिड़काव करें।

पेन्टेड बग (कदरा कीट)- इस कीट के नियंत्रण हेतु क्विनालफॉस 36 ई.सी. या क्लोरपायरीफॉस 2 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी की दर से पौधों पर छिड़काव करें।

प्रमुख रोग नियंत्रण-

पावडरी मिल्ड्यू रोग: इस रोग से पौधों की आखिरी अवस्था में तने, पत्तियों एवं हरी फलियों पर सफेद चूर्ण जैसी फफूंद दिखती है, जिसे पावडरी मिल्ड्यू रोग के नाम से जाना जाता है। इस रोग के नियंत्रण हेतु घुलनशील गंधक 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

आल्टरनेरिया ब्लाइटः इसे झुलसा रोग के नाम से भी जाना जाता है। इस रोग से राई-सरसों की उपज में कमी के साथ-साथ दाने में तेल की मात्रा भी कम हो जाती है। इस रोग के नियंत्रण हेतु डायथेन एम-45 की 2 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

सफेद रतुआ रोगः सामान्यतः इस रोग के लक्षण राई-सरसों की पत्तियों की नीचली सतह से शुरू होते हैं। बाद में फफोले तने तथा फल्लियों पर भी सफेद रंग के दिखाई देते हैं। ये धब्बे गर्म-नम एवं अधिक आर्द्रता वाले अनुकूल मौसम पाकर बड़े होते जाते हैं और पत्तियों का काफी भाग नष्ट कर देते हैं। इनके नियंत्रण हेतु डायथेन एम.45 की 2 ग्राम दवा का 1 प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव 10-15 दिन पर किया जाना चाहिये।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।