
डायरेक्ट सीड राइस कम लागत में अधिक उत्पादन देगी धान की खेती Publish Date : 23/09/2025
डायरेक्ट सीड राइस कम लागत में अधिक उत्पादन देगी धान की खेती
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर एवं डॉ0 शालिनी गुप्ता
जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित मानसून के चलते धान की खेती करना शुरू से ही मुश्किल भरा रहा है। ऐसे में अब धान उत्पादकों के लिए एक अच्छी खबर है, कृषि वैज्ञानिकों ने ट्रैक्टर चलित ड्राई व वेटलैंड वेदर विकसित किया है, जो धान की खेती में गेम चेंजर साबित हो रहा है।
पारंपरिक तरीके से धान की खेती में पानी की अधिक खपत मेहनत और लागत एक बड़ा बोझ बन चुकी थी। हालांकि सबसे बड़ी चुनौती खरपतवार की थी, जिसे निकालने में बहुत खर्च आता था और इससे धन की कुल लागत काफी अधिक बढ़ जाती थी। वाराणसी में स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान के दक्षिण एशिया क्षेत्र केंद्र के कृषि वैज्ञानिकों ने खरपतवार की समस्या का समाधान अब निकाल लिया है।
वह है धान की सीधी बिजाई अर्थात डीएसआर की विधि के उपयोग ने अत्यधिक पानी की जरूरत को पहले की कम कर दिया था। अब खरपतवार की समस्या दूर होने से लागत कम होगी, जिससे किसान का मुनाफा बेहतर होगा।
इस ट्रैक्टर में पतले टायर नैरो व्हील्स लगे हैं, जो धान के पौधे को बिना नुकसान पहुंचाएं खरपतवार को साफ करते हैं, जिससे किसानों का समय और धन दोनों की अच्छी बचत होती है। धान की बुवाई 25 सेंटीमीटर की दूरी पर की जाती है और यह ट्रैक्टर पंक्तियों के बीच आसानी से चलता है। यह मशीन कम नमी वाली जमीन में भी प्रभावी ढंग से काम करती है और एक घंटे में एक एकड़ खेत कि खरपतवार साफ कर सकती है।

बुवाई के 25 से 30 दिन बाद इस विधि का उपयोग सबसे अधिक प्रभावी होता है, जो खरपतवार को जड़ से उखाड़ देता है। हाल ही में वाराणसी के पनियरा गांव में इस यंत्र का सफल प्रदर्शन किया गया, जिसने किसानों को नई उम्मीद दी है। यह हल्के वजन का ट्रैक्टर न केवल निराई में माहिर है बल्कि जल्द ही इस खाद छिड़काव के लिए भी तैयार किया जाएगा। इससे किसानों की लागत और समय की बचत हो सकेगी।
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर विभागाध्यक्ष डिवीज़न ऑफ़ प्लांट बायोटेक्नोलॉजी ने बताया कि धान की सीधी बुवाई जब की जाती है तो उसमें खरपतवार की समस्या बहुत अधिक होने के कारण किसान इस तकनीकी को अपने में सकते थे लेकिन अब ट्रैक्टर चरित्र ड्राई एंड वेट लैंड विधि के आ जाने के कारण इस समस्या से निदान आसानी से किया जा सकेगा। खरपतवार के कारण धान की पैदावार में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
इस विधि के द्वारा न केवल खरपतवार नियंत्रण करना आसान होगा, बल्कि पौधों को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचता है। खरपतवार पर नियंत्रण करना किसानों के लिए हमेशा से ही एक बड़ी समस्या बना हुआ था।

अब इसमें सुधार होगा तो इस तकनीक को अपनाने वाले किसानों की संख्या में भी पर्याप्त बढ़ोतरी भी होगी। सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में ईरी फिलिपींस सहयोग से चलाई जा रही परियोजना की मुख्य अन्वेषक प्रोफेसर शालिनी गुप्ता ने बताया कि विश्वविद्यालय के क्रॉप रिसर्च स्टेशन पर इस बार धान की सीधी बुवाई तकनीक से धान की विभिन्न चरणों में प्लाजा को लगाया गया था, जिसमें से कई जर्म प्लाज्म अपना बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। भविष्य में पश्चिम उत्तर प्रदेश के वातावरण के अनुकूल धान की नई प्रजाति को विकसित करने में सहयोग मिल सकेगा।
धान की सीधी बुवाई किसानों के लिए है लाभकारी
धान की सीधी बुवाई तकनीकी उन छोटे और मंझोले किसानों के लिए भी किसी वरदान की तरह से ही है जो संसाधनों की कमी से जूझते रहते हैं। यह नए जमाने की धान की खेती को और लाभकारी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम भविष्य में साबित होगा। कम लागत कम समय और अधिक उत्पादन के साथ यह तकनीक किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में मदद करेगी। कृषि की इस पहल से पश्चिमांचल के खेतों में हरियाली के साथ-साथ समृद्धी भी आएगी।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
