
बारानी खेती का प्रबन्धनः उत्पादकता एवं स्थायित्व का एक विकल्प Publish Date : 14/08/2025
बारानी खेती का प्रबन्धनः उत्पादकता एवं स्थायित्व का एक विकल्प
प्रोफेसर आर. एस. सेंगर
विश्व को लगभग 10.5 अरब जनसंख्या की भोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए वर्ष 2010 तक कम से कम भूमि से अधिक से अधिक उपज प्राप्त करना होगा। क्योंकि कृषि क्षेत्र में अधिक से अधिक भूमि का उपयोग कर लिया गया है तथा आगे कृषि क्षेत्रफल को बहुत अधिक बढ़ाना सम्भव नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या मिट्टी, पानी एवं हवा को प्रदूषित किये बिना, पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित, सामाजिक रूप से मान्य तथा आर्थिक दृष्टि से व्यावहारिक तरीकों से लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है।
विश्व के कुल भू भाग का लगभग 40-42% क्षेत्र शुष्क या अर्द्धशुष्क है। इस क्षेत्र में लगभग 70-75 करोड़ लोग निवास करते हैं। विश्व के कुल शुष्क क्षेत्रों का लगभग 60% विकासशील देशों में आता है। विश्व का 75-90% भू-भाग कम वर्षा वाले क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। निकट पूर्व, अफ्रीका एवं एशिया के 20 से अधिक देश इसी क्षेत्र में स्थित है।
संसार में पैदा होने वाली अरहर का 95%, ज्वार का 90%, बाजरे का 80% और मूंगफली का 50% इसी क्षेत्र के किसान पैदा करते हैं। आने वाले वर्षों में विश्व की बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए अधिक से अधिक अन्न इसी क्षेत्र से आयेगा तथा यह क्षेत्र ‘‘भूरी से हरी क्रांति’’ क्रो जन्म देगा।
भारत में 60-65% खेती वर्षा पर निर्भर है। वर्षा आधारित खेती को ही बारानी खेती कहते हैं। कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 44% इन्हीं क्षेत्रों से आता है और देश की कुल आबादी के 40% लोगों की आवश्यकता इससे पूरी होती है। वर्षा पर निर्भर क्षेत्र एक समान नहीं है। वर्षा जल तथा अन्य संसाधनों की उपलब्धता की दृष्टि से इन क्षेत्रों में व्यापक क्षेत्रीय असमानतायें पायी जाती है। देश का लगभग 30% क्षेत्र (10.9 करोड़ हेक्टेयर) सूखे की आशंका वाला है जहाँ 0-750 मि.मि. तक वर्षा होती है जबकि 42% क्षेत्रफल पर वर्षा 750-1150 मि.मि., 20% क्षेत्रफल पर 1150-2000 मि.मि. होती है तथा 8% क्षेत्रफल पर 2000 मि.मि. से अधिक वर्षा होती है।
देश के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पानी की भारी कमी के कारण खेती के लिए सिंचाई भरोसेमन्द नहीं है। इसके अतिरिक्त यहाँ पीने के पानी की भी बहुत कमी रहती है क्योंकि पर्याप्त वर्षा न होने से भूमिजल का स्तर बहुत नीचे एवं खारा होता है जो कि पशुओं एवं मनुष्यों दोनों के स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद होता है। साधारणतया देश में वार्षिक औसत वर्षा लगभग 1200 मि. मि. है तथा वर्ष में होने वाली कुल वर्षा का 75-90% जून से सितम्बर के समय दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के सक्रिय होने से होता है। वर्षा में अत्यधिक भिन्नता होने के कारण एक और शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में सूखे से फसलें प्रभावित होती हैं। तो दूसरी तरफ अधिक वर्षा होने से मिट्टी के कटाव, बाढ़ इत्यादि से फसलें प्रभावित होती है।
स्थायित्व की धारणा
अन्तर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान के सन्दर्भ में गठित सलाहकार समिति (सी.जी.आई.ए. आर.) के अनुसार ‘स्थाई कृषि का अर्थ है, पर्यावरण की गुणवत्ता बनाये रखने या बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रयासों के साथ-साथ बदलती हुई मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संसाधनों का सफल प्रबंध करना।’
इसका मुख्य लक्ष्य ऐसी दीर्घकालीन कृषि प्रक्रियाओं का विकास करना है जो उत्पादक एवं लाभप्रद हों, जिनसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके, पर्यावरण सुरक्षित रहे, उत्पाद में गुणवत्ता रहे तथा स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की दृष्टि से लाभप्रद हों। इन्हें प्राप्त करने का उपाय है कम लागत वाली ऐसी विधियों और कुशल प्रबन्धन की व्यवस्था करना जिनसे प्रबंधन में दक्षता आये और उत्पादन में काम आने वाले आंतरिक संसाधनों (अर्थात कृषि संसाधनों) का उपयोग हो सके। इस प्रकार हम पशुधन के उत्पादन एवं फसल की पैदावार को टिकाऊ और स्वीकार्य स्तर पर ला सकते हैं।
प्रबन्धन एवं उत्पादन के स्थायी उपाय
- फसलों की अदला-बदली करके बुवाई जैसे दलहनी फसलों के बाद धान्य फसलों का बोना।
- अकार्बनिक खादों के स्थान पर कार्बनिक खादों जैसे गोबर की खाद, जैव खाद इत्यादि के उपयोग पर जोर देना या कम से कम 2/3 और 1/3 के अनुपात को अपनाना, भूमि सुरक्षा की दृष्टि से उपयुक्त माना जाता है तथा उत्पादकता में भी, स्थायित्व प्राप्त किया जा सकता है।
- रासायनिक खादों की संतुलित मात्रा प्रयोग करना चाहिए जैसे अनाज वाली फसलों के लिए 4:3:1 के अनुपात में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश की मात्रा देना चाहिए एवं दलहनी फसलों के लिए 1:2:1 या 1:2:2 के अनुपात में नत्रजन, फास्फोरस एंव पोटाश देना चाहिए।
- कम वर्षा वाले क्षेत्रों में वर्षा जल का संरक्षण करना, जैव कीटनाशी, खरपतवारनाशी एवं फंफूदनाशी आदि के प्रयोग करने पर बल देना चाहिए। तालाबों इत्यादि में पानी को एकत्रित करना या फिर खेत में ही ऊंची मेड़ बनाकर पानी को संरक्षित करने से हम बोई गई फसलों की जीवनदायी सिंचाई कर सकते हैं या फिर खेतों में संरक्षित नमी का उचित उपयोग करके फसल पैदावार बढ़ा सकते हैं।
- बारानी क्षेत्रों में फसल बोते समय ही खाद देना चाहिए या फिर जीवनदायी सिंचाई के साथ खाद का प्रयोग करना उचित पाया गया है। साथ ही साथ खरपतवारों का समेकित नियंत्रण करने से फसल की पैदावार अच्छी होती है।
- उचित फसल प्रणाली अपनाना जैसे बरानी क्षेत्रों में एक फसल लेना या फिर अन्तर फसली प्रणाली अपनाना, प्रति ईकाई उत्पादन को बढ़ा देता है।
- फसल उत्पादन के साथ-साथ गाय, भैंस एवं मुर्गी-पालन आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद होता है।
- समस्याग्रस्त भूमियों (लवणीय मृदा आदि) पर फलदार वृक्षों को लगाना या फिर जंगली वृक्षों को लगाना जिससे ईंधन, चारा एवं खाद्य पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है। साथ ही साथ इन जमीनों का उचित प्रबन्धन करके फसल उत्पादन भी लिया जा सकता है।
स्थायी संसाधन प्रबंधन
भूमि, जल, जलवायु, पेड़-पौधे और वनस्पतियां कृषि के विकास में काम आने वाले ऐसे मूलभूत प्राकृतिक संसाधन है जिन पर कई बातों का विपरीत असर पड़ता है। कृषि के उचित विकास के लिए इनका संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है। स्थायी तौर पर संसाधन प्रबंधन का मतलब है कि वर्तमान आवश्यकताएं भी पूरी हों तथा भविष्य में इनके विकास पर कोई प्रभाव न पड़े। हमें प्राकृतिक संसाधनों को भविष्य के लिए संरक्षित करके, आर्थिक उपयुक्तता लाकर, उत्पादन प्रणाली को सामाजिक रूप से स्वीकार्य बनाकर और पर्यावरण को बचाकर दीर्घकालीन आधार पर उत्पादक कृषि के क्षेत्र में वास्तविक स्थायित्व लाना होगा।
पर्यावरण के अनुकूल ऐसी खेती करना होगा जिससे कि परिस्थितिकीय संतुलन बना रहे और निवेशों के कुशलतापूर्वक उपयोग से आर्थिक लाभप्रदता बनाये रखने में मदद मिले। कार्बन डाई ऑक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन और मीथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसों के निकलने में कमी लाकर धरती के तापमान में वृद्धि और ओजोन परत के क्षीण होने पर रोक लगानी होगी। हमें ऐसी तकनीकियों को अपनाना होगा जिससे कृषि उत्पादन और अनाज की गुणवत्ता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और साथ ही साथ जमीन, पानी एवं जैव विविधता भी असंतुलित न हो।
ऊर्जा की आवश्यकता पूरी करने और खेती से जैव सामग्री का उत्पादन बढ़ाने के लिए सौर ऊर्जा के प्रयोग के सही तरीके खोजने होंगे। पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने और वायु, जल तथा खाद्य पदार्थों की शुद्धता बनाये रखने के लिए हमें खेती में रसायनों का इस्तेमाल कम से कम करना होगा और रासायनिक कृषि की जगह खेतों की उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए कार्बनिक खादों का उपयोग करके प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना होगा।
भारत में पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ कृषि के लिए उपयुक्त प्रसार प्रणाली अपनानी होगी जिससे कम लागत में सुरक्षित विधियों की जानकारी किसानों तक पहुँचाया जा सके। इसके लिए कृषि नीति में व्यापक बदलाव लाने होंगे।
भूमि का उचित प्रबन्धन
शुष्क कृषि के स्थायित्व में सुधार लाने के लिए भूमि की उत्पादकता में वृद्धि अत्यंत आवश्यक है। इस समय शुष्क कृषि की फसल उत्पादकता लगभग 8-10 क्विटल/हेक्टेयर है जो कि बहुत कम है। उत्पादकता का मापन किसी विशेष भूमि पर उत्पादन के घटकों के संदर्भ में फसल की उपज से किया जाता है। लेकिन अधिकतर भूमि कारक जैसे मिट्टी का कटाव, पोषक तत्वों का बरसाती पानी के साथ बह जाना, पोषक तत्वों का जमीन के नीचे बह जाना, पानी का जमाव, मरूस्थलीकरण, कार्बनिक पदार्थों का क्षरण, खारापन, विषाक्त पदार्थों का जमा होना इत्यादि को उपेक्षित कर दिया जाता है जबकि इन कारकों से भूमि की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है।
जबकि यदि हम मृदा अवशिष्ट प्रबन्धन, जल संरक्षण, कंटूर का निर्माण, संतुलित रासायनिक उर्वरक प्रबन्धन, कार्बनिक रिसायक्लिंग, लवणों को पानी के साथ निकालना, उचित जल निकास, उचित फसल चक्र, अधिक उपज देने वाली प्रजातियों आदि का मिट्टी, जलवायु व फसल के साथ तालमेल करके कृषि प्रणाली में सुधार से भूमि उत्पादकता में वृद्धि कर सकते हैं।
आमतौर पर शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव जो कि पोषक तत्वों के क्षरण के लिए जिम्मेदार होता है तथा कार्बनिक पदार्थों का समाप्त होना साथ ही साथ भूमि का लवणीय हो जाना इत्यादि मुख्य रूप से जमीन को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाले कारक होते हैं। इन सभी कारकों को व्यवस्थित करके भूमि की उत्पादकता को अच्छा बनाया जा सकता है।
कार्बनिक पदार्थों का जैसे घर का कूड़ा करकट, पशु-शाला का बिछावन, पशुओं का छोड़ा गया चारा, पशुओं का मलमूत्र, फसलों का अवशिष्ट, शहर का मलवा इत्यादि का जमीन में उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादकता बनाये रखने, जल तथा वायु से इसके कटाव रोकने आदि में बड़ी मदद मिलती है। इसी तरह लवणता ग्रस्त क्षेत्रों के प्रबन्धन के लिए रासायनिक एवं जैव उपाय अपनाने से भूमि के स्वास्थ्य में सुधार करके उसकी उत्पादकता को बढ़ाया जा सकता है।
जल का उचित प्रबन्धन
बरानी क्षेत्रों में जल का संरक्षण एवं इसका सही उपयोग एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। इन क्षेत्रों में प्राकृतिक जल ग्रहण क्षेत्रों के समुचित प्रबन्धन एवं पानी के समन्वित रूप से उपयोग को बढ़ावा दिया जाना आवश्यक है। इन क्षेत्रों में यदि प्राकृतिक जल ग्रहण क्षेत्र उपलब्ध नहीं है तो वर्षा का पानी या तो खेत में ही ऊँची मेड़ बनाकर रोका जाना चाहिए या फिर अलग से तालाब इत्यादि बनाकर उसमें जल एकत्र करके उसका फसलों के वृद्धि एवं विकास के लिए उपयोग करना चाहिए।
वर्षा के पानी को अधिक से अधिक खेत में रोकने से भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाती है और जमीन में अधिक समय तक नमी बनी रहती है। पानी को अलग से बने तालाबों आदि में संरक्षण से फसल के लिए जीवनदायी सिंचाई, पशुओं के लिए पानी साथ ही साथ भूमि जलस्तर में भी बढ़ोत्तरी की जा सकती है।
इन क्षेत्रों में दबाव पर आधारित सिंचाई प्रणालियों जैसे ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर और अन्य सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों के कार्य निष्पादन का मूल्यांकन किया जा चुका है, और यह पाया गया है कि इनसे पानी के कमी वाले क्षेत्रों में सब्जियों तथा बागवानी वाली फसलों की सिंचाई में 20-50% तक पानी की बचत की जा सकती है। सिंचाई की मेड़ एवं कूड़ प्रणाली अपनाकर कपास और बाजरे जैसी फसलों को उगाकर काफी मात्रा में पानी की बचत की जा सकती है।
आजकल गेहूँ की खेती करने के लिए कुंड़ सिंचित उभरी पट्टी (फसल) प्रणाली अपनाने से कम से कम 25% पानी, 25% बीज एवं 25% खाद की बचत की जा सकती है। जिन बरानी क्षेत्रों में बलुई दोमट मिट्टी पायी जाती है वहाँ वर्षा से पहले जुताई कर ली जानी चाहिए तथा ढलान के विपरीत दिशा में चारों तरफ से ऊँची (लगभग 50 से.मी.) मेड़ बना लेना चाहिए, इससे वर्षा जल जमीन में शीघ्रता से सोख लेता है फलस्वरूप जल संरक्षण में मदद मिलती है।
कम वर्षा वाले क्षेत्र में भी मिट्टी में नमी बनायी रखी जा सकती है। मानसून से पहले गहरी (25 से.मी.) जुताई से जमीन में वर्षा जल का अधिकतम संरक्षण किया जा सकता है। आजकल भारत सरकार की तरफ से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा प्रतिपादित जल आच्छादित कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं जो बरानी क्षेत्रों में काफी उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं। बरानी क्षेत्रों में सिंचाई का उचित प्रबन्धन वहाँ की उत्पादकता को दुगनी कर सकता है।
वर्षा जल के संरक्षण की दृष्टि से जल ग्रहण क्षेत्र एक प्राकृतिक जल, वैज्ञानिक इकाई है। जल ग्रहण क्षेत्र के उचित प्रबन्धन से परिस्थितिकीय प्रणाली में गिरावट को रोकने के साथ-साथ खराब हो चुकी जमीन को भी सुधारा जा सकता है। अतः बरानी खेती वाले क्षेत्रों में खेती का तरीका जलग्रहण क्षेत्र के समन्वित प्रबन्धन और कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने पर आधारित होना चाहिए।
वर्षा जल का संतुलित दृष्टिकोण
बरानी क्षेत्रों में सिंचाई का एकमात्र साधन आमतौर पर वर्षा जल ही होता है। अतः किसी भी क्षेत्र में पानी की उपलब्धता की अवधि के निर्धारण के लिए कुल वर्षा, इसका वितरण और वाष्पन से होने वाले नुकसान का आकलन आवश्यक है। इन क्षेत्रों में फसलों के लिए पानी की आवश्यकता तभी पूरी हो सकती है जब वर्षा की मात्रा और वाष्पन से होने वाले नुकसान का अनुपात कम से कम 0.33 होता है।
इस अनुपात को आर्द्रता की उपलब्धता का सूचकांक कहा जाता है। अतः कृषि की समुचित रणनीति बनाने के लिए वर्षा एवं जमीन की जल-संग्रह क्षमता के आँकड़े बहुत ही उपयोगी साबित हो सकते हैं। इसके आधार पर जमीन में नमी की उपलब्धता सुनिश्चत करते हुए फसल बुवाई के समय का निर्धारण किया जा सकता है।
जैसे यदि कहीं औसत वर्षा 760 मि.मि. हो रही है तो बुवाई का समय जमीन में 75ः आर्द्रता स्तर के आधार पर 15-23 सप्ताह हो सकता है। अतः परिस्थितियों के अनुसार फसल एवं इसकीउपयुक्त प्रजाति की बुवाई की जा सकती है।
फसल एवं प्रजाति प्रबन्धन
साधारणतया बरानी क्षेत्रों में दलहनी फसलें जैसे अरहर, चना, मसूर, ग्वार आदि एवं धान्य फसलें जैसे जौ, ज्वार, बाजरा, सांवा, काँदो, मडुआ आदि तथा तिलहनी फसलें जैसे मूंगफली, सरसों, अलसी आदि मुख्य रूप से उगायी जाती हैं। इन फसलों का क्षेत्र उपयुक्त, कम अवधी वाली एवं कम पानी चाहने वाली प्रजातियों का चुनाव करके बोने से प्रति इकाई अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। फसलों को फसल चक्र के सिद्धान्त के अनुसार अदल-बदल कर बोना, नमी के अनुसार प्रति इकाई क्षेत्रफल पर एक फसल लेना या अन्तर फसली प्रणाली का पालन करना आदि से बरानी इलाकों में प्रति इकाई क्षेत्रफल से अधिक लाभ लिया जा सकता है।
पोषक तत्व एवं खरपतवार प्रबन्धन
बरानी क्षेत्रों में पोषक तत्वों का संतुलित प्रयोग साधारणतया नमी की उपलब्धता या जीवनदायी सिंचाई पर निर्भर करता है। साधारणतया सभी पोषक तत्वों को बुवाई के समय ही कुंड में हल के पीछे दे देना या फिर सीड कम फर्टी ड्रिल मशीन द्वारा बीज के साथ उपयुक्त दूरी पर प्रयोग करना अच्छा रहता है। इससे पोषक तत्व आसानी से पौधों को प्राप्त होकर उनके वृद्धि एवं विकास में मदद करते है।
यदि जीवनदायी सिंचाई की उपलब्धता है या फिर संयोग से फसल वृद्धिकाल में वर्षा हो जाती है तो नत्रजन को एक चौथाई मात्रा की टापड्रेसिंग बहुत ही लाभदायक होती है। साधारणतया बरानी क्षेत्रों में पौधों की उपयुक्त संख्या को व्यवस्थित करना बहुत आवश्यक होता है। क्योंकि अधिक पौध संख्या प्रति वर्ग मीटर वाष्पोत्सर्जन को बढ़ावा देते हैं और जल्दी ही नमी खत्म हो जाने से पौधों का वृद्धि एवं विकास प्रभावित होता है, फलस्वरूप उपज प्रभावित होती है।
खरपतवार का प्रारम्भिक अवस्था में हो नियंत्रण इन, क्षेत्रों में फसल के वृद्धि एवं विकास के लिए एक वरदान सिद्ध हो सकता है क्योंकि खरपतवार पानी का सबसे अधिक नुकसान करते हैं। साथ ही साथ पोषक तत्त्वों के साथ प्रतियोगिता करके फसल को बुरी तरीके से नुकसान पहुँचाते हैं। अतः फसल के अनुसार समेकित खरपतवार नियंत्रण भी महत्वपूर्ण क्रिया है।
जैसे दलहनी फसलों में पेन्डीमेथालिन 1-1-25 कि.ग्रा. एवं तिलहनी फसलों में फ्लूक्लोरिन 1-1.5 कि.ग्रा. दवा को 400-600 लोटर पानी में घोल बनाकर क्रमानुसार बुवाई के तुरन्त बाद एवं बुवाई के पहले छिड़काव करने से अधिक से अधिक खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है तथा बाद में 30-40 दिन बाद बचे हुए खरपतवारों को श्रमिकों की सहायता से या खुद उखाड़कर फेंक देने से खरपतवारों से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। इस प्रकार बरानी क्षेत्रों में उचित प्रबन्धन से फसलों की अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।
भूमि का वैकल्पिक उपयोग
शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में केवल खाद्यान्न उत्पादन ही लाभदायक व्यवसाय नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ वर्षा अनिश्चित एवं अनियमित होती है। अनाज, खाद्यान्न, चारे, ईंधन आदि के लिए फसलों के साथ पेड़ उगाकर कृषि को लाभप्रद व्यवसाय बनाया जा सकता है। जैसे फसलों के साथ बेर जैसे फलदार पेड़ लगाये जा सकते हैं। इसी तरह फसलों के साथ पापुलर, कीकर और खेंजड़ी पौधों को उगाना भी फायदेमंद साबित हुआ है। फसलों को उगाने के साथ-साथ पशुपालन एक बहुत ही अच्छा उद्यम इन क्षेत्रों के लिए हो सकता है जो किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
वैकल्पिक भूमि उपयोग प्रणाली से वर्षा जल में सिर्फ एक फसल उगाने वाले क्षेत्रों में खेती के बाद के मौसम में लोगों को मौसमी रोजगार तो मिलता ही है, बल्कि फसलों के बरबाद होने का खतरा भी बहुत कम रहता है। इस प्रणाली से भू-संरक्षण रोकने के एवं परिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखने में सहायता मिलती है। बरानी खेती प्रणाली को अधिक सफल बनाने के लिए क्यारियाँ बनाकर खेती, चरागाह प्रबन्धन, पेड़ लगाना और कृषि वानिकी बहुत ही प्रचलित प्रथाएं हैं।
निष्कर्ष
बरानी खेती वाले क्षेत्रों में स्थिरता लाने के लिए वर्षा के सीमित जल का अधिक से अधिक लाभ उठाना आवश्यक है। इसके लिए जल संरक्षण के उपयुक्त तरीकों को अपनाना तथा भूमि की क्षमता के अनुसार फसलें बोना अति आवश्यक है। इन क्षेत्रों में वर्षा के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों की उत्पादकता का निर्धारण आवश्यक है। जल संरक्षण के लिए उपयुक्त तरीकों एंव जमीन के जैव उपचार की विधियों से फसल की उपज में अनिश्चितता तथा जमीन में गिरावट को रोका जा सकता है।
इससे टिकाऊ उपज सूचकांक की उपयोगिता बढ़ाई जा सकती है। फसलों के लिए वैकल्पिक सिंचाई के साधन जुटाकर, उचित प्रजातियों को चयन करके मौसमी बदलाव स्थिरांक में वृद्धि की जा सकती है। इससे सूखें दुष्परिणामों एवं पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है, साथ ही साथ अकार्बनिक एवं कार्बनिक पोषक तत्वों के स्रोतों का इस्तेमाल युक्तिसंगत बनाया जा सकता है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि बरानी क्षेत्रों का उचित प्रबन्धन उत्पादकता में वृद्धि एवं स्थायित्व के साथ-साथ कृषि में विविधता को सुनिश्चित कर सकता है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।
