कौंच की व्यावसायिक खेती हैं लाभकारी      Publish Date : 12/07/2025

             कौंच की व्यावसायिक खेती हैं लाभकारी

                                                                                  डॉ. आर. एस. सेंगर, डॉ. शालिनी गुप्ता, डॉ. निधि सिंह, एवं गरिमा शर्मा

देश के ग्रामीण क्षेत्रों में किसी से छेड़-छाड़ करने के लिए कौंच की फली का उपयोग करना एक आम बात है। कौंच का नाम लेते ही शरीर खुजली सी होने लगती है। कौंच की फली में बारीक रेशे होते हैं, जो कि शरीर के सम्पर्क में आने पर शरीर में असहनीय खुजली उत्पन्न करते हैं। यह बेल के रूप में खरपतवार की तरह सारे देश में पाया जाता है। हालांकि अब खुजली रहित कौंच की प्रजातियों का भी विकास हो चुका है, जिसकी कृषि तकनीकी आज के इस लेख में विस्तार से प्रस्तुत की जा रही है।

काँच एक वर्षीय रोमयुक्त लता है। इसका वनस्पतिक नाम मुकूना पुरीटा है। यह पौधा फाबेसी कुल का सदस्य है। इसे हिन्दी में केवांच, कौंच, अंग्रेजी में काउहेज, संस्कृत में ककिच्छुका व मर्करी बंगला में अलकुमी, मराठी में कंचकुरी, तमिल में पुनाय काली कहते हैं। इसकी भारत में अब तक कुल 15 जातियां पाई गई है।

                                                     

कौंच एक वर्षीय, चक्रारोही, रोमयुक्त लता है। यह वर्षा ऋतु में उत्पन्न होकर शरद ऋतु में पुष्प तथा हेमन्त ऋतु में इस फल लगने लगते हैं। इसकी जड़ रक्तवर्ण, तना हरा, शाकीय बेलनाकार तथा अत्यधिक रोमिल होता हैं। इसकी पत्तियां हरी त्रिपत्रक, सयुक्त समचतुर्भजाकार तथा आकृति में विषम कोणीय जो 3-6 इंच लम्बी होती है। इसकी मुख्य शिरा से 6-7 पार्श्विक शिरायें निकलती है। इसकी पत्ती का ऊपरी भाग चिकना जबकि निचला भाग अत्यधिक रोमिल होता है। इनका पर्णवृन्त 6-11 से.मी. लम्बा होता है। इसके पुष्प बैंगनी रंग के होते हैं जो 1-1.5 इंच लम्बा तथा मंजरी की लम्बाई 2 से 8 तक होती है। फल शिम्ब या फली के रूप में लगते हैं।

कौंच की फलियाँ 3-5 गुच्छों में पाई जाती हैं तथा फलियाँ उल्टे एस के आकार में मुड़ी रहती है। जो 2-4 इंच लम्बी होती है यह खाकी चमकीले रंग की तथा धारीदार होती हैं। जिस पर अत्यधिक चमकीले भूरे रोम होते हैं। कौंच की एक ऐसी प्रजाति भी पाई जाती है जिस पर रोम नहीं होते। फली में 5-6 चमकीले, बीज, काले सफेद या चितकबरे होते हैं। इसके बीज अण्डाकार या चपटे होते हैं।

उपयोगिताः- कौंच के बीजों में नमी 9.1 प्रतिशत, प्रोटीन 25.02 प्रतिशत, ईथर एक्ट्रेट 2.96 प्रतिशत, रेशा 6.75 प्रतिशत, खनिज 3.95 प्रतिशत, कैल्शियम 0.16 प्रतिशत, फॉस्फोरस 0.47 प्रतिशत और लोहा 0.02 प्रतिशत के अलावा 0.53 प्रतिशत एल्केलाइड्स भी पाये जाते हैं। जिनमें प्रमुख मुकुनेडीन, मुखुवाडिनीन, नाइकोटिन, प्यूरिनिन, प्यूरीनाइडीन हैं। बीज में 5.9 प्रतिशत गहरे भूरे रंग का तेल भी पाया जाता है जिसमें 22.4 प्रतिशत सेचुरेटेड फेरी अम्ल (स्टीअरिक तथा पालमिटिक) तथा 76.7 प्रतिशत अनसुचेरेटेड फेरी अम्ल (ओलियेक तथा लिनोलिक) पाये जाते हैं। इसका बीज व मूल काफी ‘शक्तिवर्धक’ होता है जिसका उपयोग दवाईयां और टॉनिक आदि के बनाने में किया जाता है।

कौंच के औषधीय गुणः- कौंच के बीज, पत्ते जड़ व तना आदि सबका अपना औषधीय महत्व है। इसका पार्किन्सन नामक जानलेवा बीमारी की चिकित्सा में इसका प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेदिक मतानुसार इसका मुख्य प्रभाव प्रजनन संस्थान पर शुक्रजनक के रूप में पड़ता है। इसकी जड़ उत्तेजक व मूत्र स्रावजनक होती है। फलों से एक विशेष प्रकार का क्षार तत्व मिलता है जो हृदय रोग में उपयोगी होता है।

इसकी जड़ रेचक रक्तवर्ण, शक्तिदायक व मूत्रल होती है। यह ज्वर, जलंधर तथा हैजा जसे रोगों में लाभकारी होती है। पत्ते कामोद्दीपन, पौष्टिक कृमिनाशक और रक्तशोधक होते हैं। यह प्रदाह को नष्ट करते हैं। पत्तों का रस सिरदर्द निवारण एवं खून साफ भी करता है। आयुर्वेद में कौंच बीज एक प्रधान औषधी मानी गई है। इसमें उत्तेजक, स्तम्भक और धातुवर्धक तीनों ही गुण मौजूद होते हैं। इसकी फलियां कीटनाशी होती हैं। इनकी फलियों के रोम अत्यन्त विषैले होते हैं। इससे लीवर व पित्ताशय रोगों की औषधी निर्मित की जाती है।

                                                   

भूमि एवं जलवायुः- इसकी खेती के लिए बलुई, दोमट व चिकनी मिट्टी (पी.एच. 8. 9-9.0) जिसमें जल निकास का उचित प्रबन्ध हो, उपयुक्त रहती है। इसकी खेती के लिए उष्ण एवं नम जलवायु उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारीः- कौंच को खेती के लिए चयनित खेत को अच्छी तरह से 2-3 बार जुताई करके समतल बना लेना चाहिए।

बुवाईः- कौंच की लता को चढ़ाने के लिए सहारा वृक्षों की आवयकता होती है। अतः सहारा वृक्षों का चयन करते समय ध्यान रहे कि वृक्ष अति तीव्र वृद्धि वाला हो। इसके लिए अलग-अलग जलवायु के अनुसार अलग-अलग वृक्षों का चयन करना चाहिए। जैसे अग्रस्ती, जेट्रोफा, सहजन इत्यादि। प्रथम वर्ष चयनित सहारा वृक्षों को कतार में 2 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए।

एक वर्ष तक वृक्षों को बड़ा होने देना चाहिए। दूसरे वर्ष मानसून की प्रथम वर्षा के तुरन्त बाद जून-जुलाई माह में प्रत्येक सहारा वृक्ष के नीचे कौंच के 1 या 2 बीज बो देना चाहिए। पौधे से पौधे के बीच की दूरी 1 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। बीज 3-4 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिए। बीज का अंकुरण चौथे पांचवें दिन के बाद प्रारम्भ हो जाता है। लेकिन प्ररोह लगभग 7-15 दिन बाद ही भूमि के ऊपर आते हैं। एक माह उपरान्त कौंच की लता इन वृक्षों का सहारा लेकर ऊपर चढ़ना शुरू कर देती है।

उर्वरकः- बीजों की बुवाई के 40-45 दिनों के बाद खेत में 35 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 20 कि ग्रा. फास्फोरस/हेक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए। इसके एक माह पश्चात् 75 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 50 कि.ग्रा. पोटाश की दो समान खुराक 30 एवं 60 दिन की फसल हो जाने पर खड़ी फसल में दी जानी चाहिए। उपरोक्त मात्रा भूमि की उर्वरकता क्षमता के अनुसार घट बढ़ सकती है।

सिंचाईः- वर्षा ऋतु काल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती। कौंच की फसल में 5-6 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि वर्षा न हो तो 2-3 बार सिंचाई अप्रैल से जून तक की जानी चाहिए। शेष 3-4 सिंचाई अक्टूबर से कटाई होने तक मौसम के अनुसार की जानी चाहिए।

निराई व गुड़ाईः- कौंच की फसल में दो-तीन बार खरपतवार की स्थिति के अनुसार निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए।

रोग व उनकी रोकथामः- इसकी फसल में कभी-कभी सरकोस्पोरा नामक कवक लग जाता है। जबकि पीला मोजेक नामक रोग से फसल बहुत प्रभावित होती है। कभी-कभी एफिड भी नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी रोकथाम के लिए मैन्कोजेब 2 ग्राम/लीटर का पहला छिड़काव बुवाई के 30 दिनों बाद तथा दूसरा 90 दिनों बाद करना चाहिए।

कटाई व संग्रहणः- नवम्बर-दिसम्बर माह में कौंच पर फलियों का आना आरम्भ हो जाती है। दिसम्बर के अंतिम सप्ताह तक फलियों परिपक्व हो जाती है। कौंच की फलियों को बांस के आगे लोहे को बांधकर तैयार किए गए यंत्र के द्वारा तोड़ते हैं। तत्पश्चात् फलियों को एकत्रित कर लेते हैं। इस प्रकार कौंच के बीज व जड़ दोनों की प्राप्ती हो जाती है।

उत्पादन व उपजः- कौंच की अच्छी फसल से 25-30 क्विं. बीज एवं 4-5 क्विं. जड़/हे.की दर से प्राप्त होती है। कौंच के बीज व जड़ों का वर्तमान बाजार मूल्य क्रमशः 50-60 रू./कि.ग्रा. तक होता है। प्रति हेक्टेयर लगभग 8-10 हजार रूपया खर्च आता है। जबकि बीज व जड़ से लगभग 2 से 3 लाख रूपये प्रति हेक्टेयर की आय हो जाती है।

लेखकः डॉ0 आर. एस. सेंगर, निदेशक ट्रेनिंग और प्लेसमेंट, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय मेरठ।