अरण्डी के उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकी      Publish Date : 09/07/2025

            अरण्डी के उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीकी

                                                                                                                                          प्रोफेसर आर. सेंगर एवं डॉ0 रेशु चौधरी

अरण्डी का वानस्पतिक नाम ‘रिसिनस कम्युनस’ है। इसका उद्भव स्थल ट्रोपिकल अफ्रिका को माना जाता है। वर्तमान समय में भारत विश्वभर की कुल अरण्डी उत्पादन के शीर्ष स्थान पर (1221 कि.ग्रा./हेक्टेयर) है। वर्ष 2000-01 में अरण्डी के 227 हजार टन तेल व इसके उत्पादों के निर्यात से भारत को 806 करोड़ रूपये की विदेशी पूंजी का आयात किया गया तथा वर्ष 2001-02 में अरण्डी के तेल व इसके उत्पादों के निर्यात की मात्रा बढ़ी है। भारत में कुल अरण्डी उत्पादन का 88 प्रतिशत भाग गुजरात तथा राजस्थान से आता है। अरण्डी उत्पादन क्षेत्र के हिसाब से गुजरात, राजस्थान तथा आन्ध्र प्रदेश कुल अरण्डी उत्पादन क्षेत्र का 60 प्रतिशत हिस्सा उत्पादित करते हैं और इसकी उत्पादकता 1972 कि.ग्रा./हेक्टेयर है।

                                                    

उपरोक्त तीन प्रांतों के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडू, महाराष्ट्र, उड़ीसा, मध्यप्रदेश तथा बिहार में भी अरण्डी की अच्छी खेती की जाती है। अरण्डी के बीजों में 12-16 प्रतिशत प्रोटीन एवं 40-55 प्रतिशत तेल पाया जाता है। अरण्डी के तेल की गुणवत्ता सिसिनोलिक अम्ल की मात्रा पर निर्भर करती है। इस अम्ल की मात्रा बीज में 85-90 प्रतिशत तक होती है। इसके साथ ही बीज में एक एल्केलॉइड रिसिनिन तत्व भी पाया जाता है जो कि जहरीला होता है।

अरण्डी की पत्तियों का मुख्य रूप से रेशम कीट तथा पशुओं के भोजन के रूप में और टहनियां तथा तना ईंधन एवं कागज उद्योग में काम आता है। अरण्डी के तेल का मुख्य रूप से उद्योगों में उपयोग किया जात है।

इससे पेंट, वार्निश इत्यादि बनाने में इस्तेमाल, किया जाता है इसके साथ ही अरण्डी के तेल का औषधीय उपयोग भी है। अभी हाल ही में प्रकाशित एक लेख में अरण्डी से प्राप्त राइसिन का उपयोग कैंसर के इलाज में किया जाता है, जबकि राइसिन (बीज में) एक प्राकृतिक जहर है जो बेहद घातक जैविक हथियार माना जाता है। इसके अलावा अरण्डी का उपयोग पशुओं के लिए खाली के रूप में किया जाता है। अरण्डी की खली नत्रजन तथा मिनरल का अच्छा स्रोत है (खली में 6 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2.5 प्रतिशत फास्फोरस एवं 1.5 प्रतिशत पोटाश पाया जाता है।

मौसम तया भूमि का चुनाव

अरण्डी मुख्य रूप से खरीफ ऋतु की फसल है, इसमें सूखा सहन करने की क्षमता होती है जहाँ पर 50-75 से.मी. वर्षा होती है वहाँ इसकी आसानी से खोती की जा सकती है तथा जहाँ पर अधिक वर्षा होती है वहाँ पर पौधों में कायिक वृद्धि ज्यादा होती है तथा पादप पेरिनियल हैबिट ग्रहण कर लेता है।

अरण्डी की अच्छी फसल के लिए 7200 से 2100 मीटर एल्टीट्युड उपयुक्त रहता है तथा इसके लिए दोमट मिट्टी एवं जल निकास की उचित व्यवस्था वाले खेत का चयन करना उचित है तथा बुवाई से पहले खेत एक-दो बार गहरी जुताई कर दें।

उन्नत किस्में

                                                  

राजस्थान में सिचिंत तथा असिंचित क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त किस्में निम्नलिखित है-

किस्में:- ज्योति, क्रान्ती, 48-1, भाग्या तथा सोभाग्या आदि।

संकर किस्में:- जी.सी.एच.-4, जीसीएच-5, जीसीएच-6, डीसीएच-32, टीएमवीसीएच-1, डीसीएच-7 तथा आरएचसी-1 आदि।

बीज की मात्रा तथा बुवाई की विधि

अरण्डी की बुवाई जुलाई के प्रथम सप्ताह से लेकर अगस्त के प्रथम सप्ताह तक किसी भी समय की जा सकती है। इसकी बुवाई दो तरीकों से की जा सकती है, एक तो देशी हल- पोरा विधि से तथा दूसरा कतार में गठेड़ बनाकर-डिबलिंग विधि से। खरीफ ऋतु में अरण्डी 7-8 दिन में अंकुरित हो जाती है। इसका अंकुरण भूमि तापमान पर निर्भर करता है। जल्दी अंकुरण तथा भूमि तापमान के प्रभाव को समाप्त करने के लिए बुवाई से पहले बीज को 24-48 घंटे पानी में भिगो देना चाहिए।

प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा 7-8 कि.ग्रा. सिंचित क्षेत्र तथा 10-15 कि.ग्रा. बारानी (असिंचित) क्षेत्र के लिए आवश्यक होती है तथा प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या 14000 सिंचित क्षेत्र तथा 18500 पौधे बारानो क्षेत्र में होनी चाहिए। एक अच्छी फसल उत्पादन के लिए पौधे से पौधे के बीच की दूरी तथा लाईन से लाईन के बीच की दूरी 90×45 से.मी. (बारानी क्षेत्र) एवं 90×60 से.मी. (सिंचित क्षेत्र) होनी चाहिए।

बीज उपचार

प्रति किलो बीज में 3 ग्राम थाइरम या कार्बेन्डाजिम लाकर उपचारित कर बोने से बीज जनित बीमारी जैसे अल्टेरनेरिया, पत्तो झुलसा रोग, जड़ गलन तथा नवोद्भिद् झुलसा रोग से मुक्ति पा सकते हैं।

खाद व उर्वरक

प्रति हेक्टेयर 10-12 गाड़ी गोबर की अच्छी सड़ो खाद या कम्पोस्ट खाद डालें। सिंचित अवस्था में 40 कि.ग्रा. नत्रजन, 50 कि.ग्रा. फॉस्फोरस प्रति हेक्टेयर बुवाई के 35-40 दिनोपरान्त छिड़काव करें तथा 20 कि.ग्रा. नत्रजन/हेक्टेयर बुवाई के 90-95 दिन पश्चात् छिड़काव करें। असिंचित फसल में 20 कि.ग्रा. नत्रजन एवं 40 कि.ग्रा. फास्फोरस/हेक्टेयर बुवाई के समय डालें तथा 20 कि.ग्रा. नत्रजन बुवाई के 30-35 दिनों पश्चात् खड़ी फसल पर छिड़काव करें, परन्तु ध्यान रहे कि इस समय फसल व भूमि में नमी रहनी चाहिए।

निराई-गुड़ाई

अरण्डी की फसल खरपतवार के प्रति अति संवेदनशील होती है। बारानी क्षेत्र में दो या तीन निराई-गुड़ाई बुवाई के 25-30 दिनों के बाद बैल से चलने वाले हल या हेरो से करनी चाहिए तथा एक वीडिंग हाथों से करनी चाहिए। खरपतवार को फूल आने से पहले हाथ से उखाड़ देना चाहिए। सिंचाई वाले क्षेत्र में 2 या 3 वीडिंग 15-20 दिनों के अंतराल पर हाथ से करनी चाहिए। इसके अलावा खरपतवारनाशी का प्रयोग जैसे फ्लोरोक्लोरेलिन या ट्राईफ्लूरालीन 1.0 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर बौने से पूर्व करें या फिर 1.25 कि.ग्रा. प्रति हे. एलाक्लोर पौधे उगने से पूर्व प्रयोग करें।

सिंचाई

अरण्डी में प्रारम्भिक कायिक वृद्धि के दौरान ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है यद्यपि ज्यादा लम्बे समय तक सूखा रहने पर प्राथमिक सिट्टा के आने पर एक सिंचाई कर देनी चाहिए। सामान्यतया अरण्डी की फसल को 5-6 तक सिंचाई करनी चाहिए जिससे उत्पादन अच्छा मिलें। अरण्डी की फसल में पहली सिंचाई 55-60 दिन बीजोपरान्त करें तथा इसके बाद 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करें, ताकि नये आने वाले सिट्टों के लिए पौधे को नमी मिलती रहे।

फसल संरक्षण कार्य (रोग तथा बीमारियाँ)

अरण्डी के फसल की मुख्य बीमारियों में उखटा एवं जड़ गलन रोग हैं जो काफी नुकसानदायक होते है। ये दोनों रोग/बीमारी मृदा जनित है अतः किसान को चाहिये कि वह फसल चक्र अपनायें तथा रोग प्रतिरोधक किस्में ही उगायें।

कीट-पतंगे (नाशीकीट)

तैला, सेमीलूपर, बरूथी तथा सफेद मक्खी मुख्य रूप से अरण्डी की फसल को नुकसान पहुँचाने वाले नाशी कीट हैं। तैला व सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए मोनोक्रॉटोफॉस या डायमेथोएट 1 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर खड़ी फसल पर छिड़काव करें। सेमीलूपर की रोकथाम के लिए एण्डोसल्फान 1 मि.ली./लीटर की दर से तथा बरूथी के रोकथाम के लिए डाइकोफोल 1 मि.ली./लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

कटाई व गहाई

अरण्डी प्राकृतिक रूप से बहुशाखित फसल है, यह अपने पूरे जीवन (180-240 दिनों तक) में औसतन एक बार में 4-5 सिट्टे जो करीबन एक-एक महीने बाद पककर तैयार हो जाते हैं। इसका मुख्य सिट्टा बुवाई के 90-120 दिनों बाद पककर तैयार हो जाता है जो कटाई के योग्य होता है। इस प्रकार आगे की कटाई लगभग एक-एक महीने बाद कर लेनी चाहिए, ध्यान रहे कि सिट्टे में कुछ फल हल्के पीले रंग के तथा कुछ फल सूख जायें तब सिट्टे को दरांती से काट लें। सिट्टे के पूर्ण रूप से सूखने की प्रतीक्षा नहीं करें अन्यथा सिट्टा तिड़क जायेगा और बीज जमीन पर बिखर जायेगें तो उपज कम प्राप्त होगी।

सिट्टे इकट्ठे करें और उन्हे सूखने दें तथा सूखने पर हाथ चलित थ्रेसर, बिजली चलित थ्रेसर से या फिर लकड़ी/डंडे से पीटकर बीज निकाल लें और बोरी में भर दीजिए।

अधिक उपज हेतु प्रभावी बिन्दु

                                           

  • हमेशा उच्च गुणवत्ता तथा प्रमाणित बीज (प्रमाणिक संकर किस्म) जो रोगरोधक हो की बुवाई करें। इसके साथ ही उचित फसल चक्र एवं फसल संरक्षण उपाय अपनायें।
  • पौधे निश्चित संख्या एवं दूरी पर रखें।
  • निराई-गुड़ाई अवश्य करें।
  • उर्वरकों का प्रयोग करें। नत्रजन का छिड़काव समय पर करें।
  • सिंचाई भूमि एवं फसल की आवश्यकतानुसार करें।
  • सिट्टो की कटाई समय पर करें।

लेखकः लेखक सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ के प्रोफेसर हैं।